‘YAMA’ का उदय: ड्रोन युद्ध के दौर में भारत का स्वदेशी जवाब

बी के झा

बेंगलुरु / नई दिल्ली, 5 मार्च

दुनिया का युद्धक्षेत्र बदल चुका है। अब टैंकों की गर्जना से ज्यादा आसमान में भनभनाते ड्रोन रणनीति तय करते हैं। ईरान और इज़रायल के बीच टकराव हो या रूस–यूक्रेन का संघर्ष—हर जगह सस्ते, तेज और सटीक ड्रोन पारंपरिक रक्षा तंत्र को चुनौती दे रहे हैं। ऐसे दौर में बेंगलुरु स्थित Flying Wedge Defence and Aerospace ने भारत के पहले ऑटोनॉमस स्वार्म इंटरसेप्टर FWD ‘YAMA’ का सफल परीक्षण कर एक नई दिशा दिखाई है।

क्यों अहम है ‘YAMA’?

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्ध की सबसे बड़ी चुनौती “लागत बनाम प्रभाव” (Cost vs Impact) का समीकरण है। हाल के वैश्विक संघर्षों में यह खबर चर्चा में रही कि कुछ हजार डॉलर के ड्रोन ने लाखों डॉलर की एंटी-मिसाइल प्रणाली को चकमा दिया। यानी सस्ते ड्रोन महंगे इंटरसेप्टर पर भारी पड़ सकते हैं।यहीं ‘YAMA’ का प्रवेश होता है।

अनुमानित लागत: लगभग 10,000 डॉलर प्रति यूनिट लक्ष्य:

ड्रोन झुंड (Swarm) और फ्लाइंग वारहेड्सप्रकृति: पूर्णतः ऑटोनॉमस, यानी मानव हस्तक्षेप न्यूनतमरणनीति: झुंड बनाकर हमला करने वाले ड्रोन को उसी शैली में जवाब रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यदि एक सस्ता इंटरसेप्टर सैकड़ों गुना महंगे लक्ष्य को निष्क्रिय कर दे, तो युद्ध का आर्थिक समीकरण ही बदल सकता है।

तकनीकी बढ़त या सामरिक संदेश?

‘YAMA’ सिर्फ एक ड्रोन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश है—भारत स्वदेशी एंटी-ड्रोन इकोसिस्टम की ओर बढ़ चुका है।विशेषज्ञ मानते हैं कि स्वार्म टेक्नोलॉजी (झुंड में काम करने वाले ड्रोन) भविष्य का युद्ध तय करेगी। यदि दुश्मन 50–100 ड्रोन एक साथ भेजे, तो पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ता है। ‘YAMA’ जैसे स्वार्म इंटरसेप्टर उसी संख्या और गति से जवाब दे सकते हैं।

सरकार की प्रतिक्रिया: आत्मनिर्भर रक्षा की दिशा में कदम

केंद्र सरकार के सूत्रों के अनुसार, यह परीक्षण “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के रक्षा आयाम को मजबूत करता है। रक्षा मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी अब केवल पूरक नहीं, बल्कि मुख्य भूमिका में है।सरकार का तर्क है:स्टार्टअप आधारित रक्षा नवाचार को बढ़ावाआयात निर्भरता में कभी निर्यात की संभावनाएं रक्षा मंत्रालय के करीबी सूत्रों का कहना है कि यदि आगे के परीक्षण सफल रहते हैं, तो इसे सीमावर्ती इलाकों में तैनात करने पर विचार हो सकता है।

विपक्ष का सवाल: पारदर्शिता और परीक्षण की विश्वसनीयता

विपक्षी दलों ने इस उपलब्धि का स्वागत तो किया है, लेकिन कुछ अहम सवाल भी उठाए हैं:क्या यह सिस्टम बड़े पैमाने पर प्रमाणित परीक्षण से गुजरा है?क्या इसकी रेंज और रिएक्शन टाइम सेना की जरूरतों के अनुरूप है?क्या निजी कंपनियों को दिए जा रहे रक्षा अनुबंधों में पारदर्शिता सुनिश्चित है? कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता सराहनीय है, लेकिन “सुरक्षा से समझौता” नहीं होना चाहिए। उनका आग्रह है कि संसद की स्थायी समिति को इस तरह की परियोजनाओं पर विस्तृत जानकारी दी जाए।

सामरिक प्रभाव: सीमाओं पर बदलेगा खेल?

भारत की पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर ड्रोन गतिविधियों में वृद्धि की रिपोर्टें पहले भी आती रही हैं। छोटे ड्रोन के जरिए हथियार और नशीले पदार्थ गिराने की घटनाएं सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय रही हैं।रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि:‘YAMA’ जैसे इंटरसेप्टर सीमाई निगरानी को सशक्त कर सकते हैं।यह पारंपरिक रडार-आधारित एयर डिफेंस का पूरक बन सकता है।भविष्य में AI आधारित निर्णय-क्षमता इसे और घातक बना सकती है।वैश्विक संदर्भ में भारतअमेरिका, इज़रायल और चीन पहले से ही स्वार्म टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं। भारत का यह कदम संकेत देता है कि वह तकनीकी प्रतिस्पर्धा में पीछे नहीं रहना चाहता।रक्षा निर्यात के लिहाज से भी यह उत्पाद दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका के देशों के लिए आकर्षक हो सकता है, जहां सस्ती लेकिन प्रभावी एंटी-ड्रोन प्रणाली की मांग है।

निष्कर्ष:

क्या ‘YAMA’ बनेगा गेम-चेंजर?

‘YAMA’ नाम प्रतीकात्मक है—यमराज, यानी अंत का दूत। यदि यह तकनीक अपने दावों पर खरी उतरती है, तो दुश्मन के ड्रोन झुंडों के लिए सचमुच “अंत” साबित हो सकती है।लेकिन अंतिम कसौटी होगी—

मैदान में प्रदर्शन, विश्वसनीयता और दीर्घकालिक स्थायित्व।भारत ने एक साहसी कदम उठाया है। अब देखना यह है कि यह प्रयोगशाला की सफलता से आगे बढ़कर सीमाओं की सुरक्षा का अभेद कवच बन पाता है या नहीं।

NSK

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