रूसी तेल पर ‘इजाजत’ की राजनीति को भारत का करारा जवाब, ऊर्जा सुरक्षा पर नहीं होगा कोई समझौता

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 8 मार्च

वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा बाजार की हलचल के बीच भारत ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि उसकी ऊर्जा नीति किसी बाहरी दबाव या अस्थायी छूट पर निर्भर नहीं है। अमेरिका की ओर से यह दावा किए जाने के बाद कि भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिन की छूट दी गई है, भारत सरकार ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट कहा कि नई दिल्ली कभी भी किसी देश की अनुमति पर निर्भर नहीं रही है और भविष्य में भी नहीं रहेगी।भारत सरकार के प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो की ओर से जारी बयान में कहा गया कि रूस से कच्चे तेल का आयात भारत की रणनीतिक और आर्थिक जरूरतों का हिस्सा है। बयान में यह भी स्पष्ट किया गया कि फरवरी 2026 में भी रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बना हुआ है और भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए व्यावहारिक और स्वतंत्र निर्णय लेता रहेगा।दरअसल, वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय भारी उथल-पुथल से गुजर रहा है। ईरान और इजरायल के बीच तनाव, साथ ही ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से जहाजों की आवाजाही रोकने की चेतावनी ने दुनिया भर के तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। ऐसे माहौल में भारत का यह बयान न केवल ऊर्जा सुरक्षा बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता का भी संकेत माना जा रहा है।

ऊर्जा सुरक्षा पर भारत की स्पष्ट नीति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत का यह रुख वैश्विक मंच पर उसकी स्वतंत्र विदेश नीति की निरंतरता को दर्शाता है।वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अरुणेश त्रिपाठी कहते हैं कि“भारत आज दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी तेल उपभोक्ता अर्थव्यवस्था है। ऐसे में उसकी ऊर्जा नीति का आधार किसी देश की छूट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित और आर्थिक विवेक होना चाहिए। सरकार का यह बयान उसी दिशा का संकेत है।”उनके अनुसार भारत पिछले कुछ वर्षों से रूस, मध्य-पूर्व और अन्य स्रोतों से संतुलित तरीके से तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर रहा है।

शिक्षाविदों की नजर में ‘रणनीतिक स्वायत्तता’

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ और शिक्षाविद प्रो. नीरज कुमार मानते हैं कि भारत की यह प्रतिक्रिया वैश्विक कूटनीति में उसके आत्मविश्वास को दर्शाती है।उनका कहना है,“भारत की विदेश नीति ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ पर आधारित रही है। चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध हो या पश्चिमी देशों का दबाव, भारत ने हमेशा अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता दी है। रूस से सस्ता तेल खरीदना भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता दोनों के लिए फायदेमंद है।”वे कहते हैं कि भारत ने यह भी दिखा दिया है कि वह किसी ब्लॉक की राजनीति में बंधकर नहीं, बल्कि संतुलित कूटनीति के आधार पर फैसले करता है।

कानूनविदों की राय: अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई बाधा नहीं

कानून विशेषज्ञों का भी कहना है कि भारत का रुख पूरी तरह वैध है।अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकार वरिष्ठ अधिवक्ता आर.के. मिश्रा के अनुसार,“संयुक्त राष्ट्र की ओर से रूस के तेल व्यापार पर ऐसा कोई सार्वभौमिक प्रतिबंध नहीं है, जो भारत जैसे देशों को उससे तेल खरीदने से रोकता हो। ऐसे में अमेरिका या किसी अन्य देश की ‘छूट’ की अवधारणा कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।”उनके अनुसार भारत का बयान यह स्पष्ट करता है कि राष्ट्रीय संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में रहते हुए वह स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम है।

रक्षा विशेषज्ञों की चेतावनी: ऊर्जा ही रणनीतिक ताकत

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा आज किसी भी देश की रणनीतिक ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल एस.के. चौधरी कहते हैं,“आज की दुनिया में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि ऊर्जा और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भी लड़े जाते हैं। भारत अगर सस्ता और स्थिर तेल स्रोत सुनिश्चित करता है तो यह उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।”वे कहते हैं कि वैश्विक संकट के समय ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता बनाए रखना किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है।

सरकार के समर्थन में सत्तारूढ़ दल

सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने सरकार के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि भारत ने हमेशा राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा है।पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा,“भारत किसी के दबाव में निर्णय लेने वाला देश नहीं है। अगर रूस से तेल सस्ता मिलता है और इससे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, तो उसे जारी रखना पूरी तरह जायज है।”उनके अनुसार सरकार का यह रुख प्रधानमंत्री की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति का उदाहरण है।

विपक्ष ने भी जताया समर्थन, लेकिन उठाए सवाल

हालांकि विपक्षी दलों ने सरकार के बयान का स्वागत करते हुए कुछ सवाल भी उठाए हैं।कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा,“भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार है। लेकिन सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि इस मुद्दे पर भारत-अमेरिका संबंधों में अनावश्यक तनाव न बढ़े।”वहीं कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि सरकार को ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों और घरेलू उत्पादन पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए।

वैश्विक राजनीति में भारत का बढ़ता आत्मविश्वास

विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम ने यह दिखा दिया है कि आज भारत वैश्विक राजनीति में एक स्वतंत्र और आत्मविश्वासी शक्ति के रूप में उभर रहा है।रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत ने सस्ते रूसी तेल का आयात बढ़ाकर अपनी ऊर्जा लागत को नियंत्रित रखा है। इससे देश में ईंधन कीमतों पर दबाव कम करने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मदद मिली है।

निष्कर्ष

वैश्विक तनाव, ऊर्जा संकट और महाशक्तियों की कूटनीतिक खींचतान के बीच भारत का यह संदेश स्पष्ट है—ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के सवाल पर भारत किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।विश्लेषकों के अनुसार यह केवल तेल खरीद का मामला नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक विवेक और वैश्विक मंच पर बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतीक है।

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