संपादकीय: “नेपाल तक पहुंचा भ्रष्टाचार—बिहार में सरकार सो रही है या शामिल है?”

बी के झा

NSK

पटना, 28 मार्च

बिहार की व्यवस्था पर अब सवाल नहीं, आरोप खड़े हो रहे हैं।और ये आरोप किसी विपक्षी मंच से नहीं, बल्कि खुद जांच एजेंसियों की कार्रवाई से निकलकर सामने आ रहे हैं।Economic Offences Unit Bihar द्वारा एक इंजीनियर के खिलाफ जांच और Interpol से मदद की मांग यह बताने के लिए काफी है कि मामला छोटा नहीं—सिस्टम की जड़ तक सड़ा हुआ है।

इंजीनियर या “सिस्टम का सिंडिकेट”?

एक सरकारी इंजीनियर,सरकारी वेतन,और संपत्ति—वह भी देश की सीमा पार Kathmandu और Sunsari में?यह केवल “आय से अधिक संपत्ति” का मामला नहीं है।यह उस संगठित तंत्र की झलक है जहाँ: अधिकारी ठेकेदारों राजनीतिक संरक्षण मिलकर लूट का एक स्थायी मॉडल बना चुके हैं।

सवाल सीधा है—क्या यह अकेला इंजीनियर इतना बड़ा खेल खेल सकता है?

सरकार की चुप्पी: लाचारी या मिलीभगत?

जब भ्रष्टाचार स्थानीय स्तर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों तक पहुंच जाए,तो यह मान लेना चाहिए कि:या तो सरकार अंधी है या फिर सब कुछ जानते हुए भी खामोश है यह वही स्थिति है जिसे लोग “आंखों पर पट्टी बांधकर शासन” कहते हैं।

ठेकेदार राज: विकास नहीं, विनाश का ठेका

बिहार में अब विकास योजनाएं नहीं चलतीं—ठेके चलते हैं।और इन ठेकों में:काम कम, कमीशन ज्यादा

गुणवत्ता कम, कागजी खर्च ज्यादाऔर जवाबदेही—शून्य एक सेवानिवृत्त अधिकारी की बात कड़वी है, लेकिन सच्चाई के करीब लगती है:“अगर सिंचाई, सड़क और जल संसाधन विभाग की निष्पक्ष जांच हो जाए, तो बिहार का असली आर्थिक कंकाल बाहर आ जाएगा।

”दूसरी तरफ: जनता पर दोहरी मार

एक तरफ भ्रष्टाचार,दूसरी तरफ वैश्विक संकट।Sudha Dairy और NTPC जैसी इकाइयाँ डीजल संकट की आशंका जता रही हैं।और उसी समय: Jalandhar से मजदूर लौट रहे हैं क्योंकि:गैस महंगी

काम कमऔर बचत शून्ययह केवल आर्थिक संकट नहीं—यह नीति की विफलता और प्राथमिकताओं की गड़बड़ी है।सवाल जो सरकार से पूछे जाने चाहिए

क्या हर विभाग में इसी तरह का “नेपाल मॉडल” चल रहा है?

कितने अधिकारियों की संपत्ति विदेशों में है?

ठेकेदारों और अधिकारियों के गठजोड़ को तोड़ने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए?

और सबसे बड़ा सवाल—

क्या सरकार वाकई भ्रष्टाचार के खिलाफ है, या केवल बयान दे रही है?

राजनीतिक विश्लेषण: “सुशासन” का मिथक टूट रहा है?

बिहार लंबे समय से “सुशासन” के दावे पर खड़ा रहा है।लेकिन जब:इंटरपोल की जरूरत पड़ जाएऔर भ्रष्टाचार सीमा पार कर जाए तो यह दावा खुद-ब-खुद संदेह के घेरे में आ जाता है।

निष्कर्ष:

अब या तो कार्रवाई होगी, या भरोसा खत्म होगा

Economic Offences Unit Bihar की कार्रवाई एक शुरुआत हो सकती है—लेकिन अगर यह भी बाकी मामलों की तरह “फाइलों में दफन” हो गई,तो यह केवल एक केस नहीं,पूरे सिस्टम की अंतिम चेतावनी साबित होगा

संपादकीय

एक इंजीनियर की संपत्ति नेपाल तक पहुंच जाए,तो यह उसकी चतुराई नहीं—सिस्टम की विफलता का प्रमाण है।

और जब सरकार केवल देखती रहे,तो सवाल उठता है—

क्या यह लूट “बिना अनुमति” हो रही है या “सहमति” से?

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