रिकॉर्ड कमाई, बढ़ते सवाल: बिहार की बिजली कंपनियों की चमक के पीछे छिपे साए, विकास, राजस्व और भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच संतुलन खोजती एक जमीनी हकीकत

बी के झा

NSK

पटना/ मधुबनी, 2 अप्रैल

बिहार में ऊर्जा क्षेत्र ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। राज्य की बिजली वितरण कंपनियों—NBPDCL और SBPDCL—ने मिलकर 19 हजार करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व अर्जित किया है। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत (1916 करोड़ रुपये) की वृद्धि है। जहां NBPDCL ने 8,866 करोड़ रुपये जुटाए, वहीं SBPDCL ने 10,169 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित कर राज्य की अर्थव्यवस्था में मजबूत योगदान दिया।ऊर्जा मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव ने इस उपलब्धि का श्रेय नीतीश कुमार के नेतृत्व, सरकार की जनोन्मुखी नीतियों और उपभोक्ताओं द्वारा समय पर बिल भुगतान को दिया। सरकार का दावा है कि 24×7 गुणवत्तापूर्ण बिजली आपूर्ति और बेहतर सेवा प्रणाली ने उपभोक्ताओं में विश्वास बढ़ाया है, जिसका सीधा असर राजस्व संग्रहण पर पड़ा है।

सरकारी विभागों से 2200 करोड़: ‘सरकार ने खुद चुकाया अपना बकाया’ऊर्जा

सचिव मनोज कुमार सिंह के अनुसार, शिक्षा, स्वास्थ्य, नगर विकास, पंचायती राज, गृह (पुलिस) समेत कई विभागों से कुल 2200 करोड़ रुपये का भुगतान प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त—2263 करोड़ रुपये राजकोष में जमा 2234 करोड़ रुपये वाणिज्यकर (विद्युत शुल्क) के रूप में29 करोड़ रुपये जीएसटी मद में यह आंकड़े दर्शाते हैं कि सरकार ने खुद भी अपने बकाए चुकाने की दिशा में कदम बढ़ाया है, जो पहले अक्सर विवाद का विषय रहा है।

उपभोक्ताओं को राहत: दरों में बदलाव का असर

वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए सरकार ने शहरी और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को राहत देने के उद्देश्य से 100 यूनिट से अधिक खपत पर लगने वाली अतिरिक्त दर को समाप्त कर दिया है। इससे—शहरी घरेलू उपभोक्ता: ₹1.53 प्रति यूनिट तक की बचत ग्रामीण गैर-घरेलू: ₹0.42 प्रति यूनिट शहरी गैर-घरेलू: ₹1.20 प्रति यूनिट साथ ही, मशरूम की खेती को कृषि का दर्जा देना और 10 किलोवाट से अधिक भार वाले उपभोक्ताओं के लिए TOD (टाइम ऑफ डे) टैरिफ लागू करना ऊर्जा क्षेत्र में संरचनात्मक बदलाव की ओर इशारा करता है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू:

जमीनी हकीकत और आरोप जहां एक ओर यह आंकड़े विकास और दक्षता की कहानी कहते हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर से उठती आवाजें इस चमक पर सवाल भी खड़े करती हैं।एक वरिष्ठ शिक्षाविद (नाम गोपनीय) ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा—“जिस तरह केंद्र में निजी बिजली कंपनियों को लेकर आरोप लगते रहे, उसी तरह बिहार में भी अब बिजली कंपनियों की ‘रिकॉर्ड कमाई’ सवालों के घेरे में है—क्या यह पूरी तरह पारदर्शी है या आम उपभोक्ता पर बोझ डालकर हासिल की गई उपलब्धि?

मधुबनी से उठती आवाज: भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी?

मधुबनी जिले के झंझारपुर क्षेत्र से जो आरोप सामने आ रहे हैं, वे प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।कमला तटबंध के भीतर अवैध मिट्टी खनन ट्रैक्टरों के जरिए रोजाना बड़े पैमाने पर कटाई स्थानीय प्रशासन और खनन विभाग पर मिलीभगत के आरोप कमला तटबंध से जुड़े इन आरोपों में यह भी कहा जा रहा है कि बाढ़ नियंत्रण और तटबंध निर्माण के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर वही चक्र दोहराया जाता है—ठेकेदार, अधिकारी और स्थानीय नेटवर्क।

शराबबंदी पर भी सवाल: ‘कागज बनाम हकीकत

’बिहार में लागू शराबबंदी कानून को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि—जमीनी स्तर पर अवैध शराब का कारोबार जारी है स्थानीय पुलिस और माफिया गठजोड़ की चर्चा आम है हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं होती, लेकिन जनमानस में यह धारणा बनती जा रही है कि कानून और व्यवस्था के बीच दूरी बढ़ रही है।

विपक्ष का हमला: “राजस्व बढ़ा, लेकिन व्यवस्था सड़ी”

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस ने इस पूरे मामले पर सरकार को घेरा है।RJD नेताओं का कहना है—“बिजली कंपनियों की कमाई बढ़ी है, लेकिन क्या आम आदमी को उतनी राहत मिली? दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के आरोप यह बताते हैं कि व्यवस्था की जड़ें कमजोर हैं।”कांग्रेस ने इसे “दोहरे मानदंड” करार देते हुए कहा—“एक तरफ विकास के आंकड़े पेश किए जाते हैं, दूसरी तरफ जमीनी भ्रष्टाचार को नजरअंदाज किया जाता है।

”कानूनविदों की राय: ‘राजस्व बनाम जवाबदेही

’कानून विशेषज्ञों का मानना है कि—राजस्व वृद्धि सकारात्मक संकेत हैं लेकिन यदि इसके साथ पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं बढ़ी, तो यह असंतुलन पैदा करेगा उनके अनुसार,“भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही तय करना जरूरी है, तभी विकास का लाभ आम नागरिक तक पहुंचेगा।”

आम जनता के लिए क्या राहत?

इस पूरी तस्वीर में आम नागरिक के लिए कुछ सकारात्मक संकेत भी हैं—

बिजली दरों में आंशिक राहत

बेहतर आपूर्ति की उम्मीद

सरकारी विभागों द्वारा बकाया भुगतान

लेकिन साथ ही, यह भी स्पष्ट है कि—

भ्रष्टाचार के आरोपों पर कार्रवाई जरूरी

स्थानीय प्रशासन की निगरानी बढ़ानी होगी

विकास के लाभ को जमीनी स्तर तक पहुंचाना होगा

निष्कर्ष:

आंकड़ों की चमक या व्यवस्था की सच्चाई?

बिहार की बिजली कंपनियों की रिकॉर्ड कमाई एक बड़ी उपलब्धि है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन विकास की यह कहानी तब पूर्ण होगी, जब इसके साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और जमीनी सुधार भी जुड़े।

क्योंकि अंततः विकास का असली पैमाना सरकारी खजाने की बढ़ोतरी नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में आई वास्तविक राहत होती है।

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