बी के झा
NSK



झंझारपुर, मधुबनी/ पटना/ नई दिल्ली, 19 अक्टूबर
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सरगर्मी के बीच मिथिला की राजनीति का धड़कता दिल — झंझारपुर विधानसभा क्षेत्र — एक बार फिर सुर्खियों में है।
यह वही धरती है जिसने तीन-तीन मुख्यमंत्री दिए, लेकिन विडंबना यह कि आज तक खुद जिला बनने का सपना नहीं देख पाई।
यहां की राजनीति अब दो परिवारों के बीच “राजनीतिक विरासत बनाम सामाजिक समीकरण” की दिलचस्प लड़ाई में बदल चुकी है —मिश्र परिवार बनाम यादव परिवार।
कांग्रेस का गढ़, भाजपा का किला — और जनता का भरोसा?झंझारपुर की सियासत की शुरुआत 1951 में हुई, जब कांग्रेस का बोलबाला था।
यहीं से डॉ. जगन्नाथ मिश्रा ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की और तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री बने।1972 से 1990 तक वे लगातार इस सीट से विधायक रहे — और झंझारपुर का नाम “मुख्यमंत्री की धरती” कहलाया।
लेकिन समय बदला।कांग्रेस का सूरज ढला और उसी धरती से डॉ. मिश्रा के छोटे पुत्र नीतीश मिश्रा ने सियासत की बागडोर संभाली।
2005 और 2010 में जदयू टिकट पर उन्होंने जीत हासिल की, और 2020 में भाजपा के टिकट पर भाकपा उम्मीदवार राम नारायण यादव को 41,788 वोटों से हराया।यह जीत भाजपा के लिए ऐतिहासिक थी, जिसने मिथिला के इस गढ़ में “कमल” खिलाया।
महागठबंधन ने वीआईपी पर जताया भरोसा
झंझारपुर सीट इस बार महागठबंधन ने विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) को सौंप दी है।राजद की जगह वीआईपी के आने से समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी इस सीट पर या तो पूर्व विधायक गुलाब यादव या उनकी बेटी बिंदु गुलाब यादव को उम्मीदवार बना सकते हैं।गुलाब यादव ने 2015 में राजद प्रत्याशी रहते हुए नीतीश मिश्रा को सिर्फ 834 वोटों से पराजित किया था।यदि इस बार उनकी बेटी बिंदु यादव मैदान में उतरती हैं, तो मुकाबला बन जाएगा “
अनुभव बनाम युवा ऊर्जा” — यानी पिता की विरासत बनाम नई पीढ़ी की उम्मीदें।
जातीय समीकरण: यादव, ब्राह्मण और मल्लाहों की निर्णायक भूमिका झंझारपुर की राजनीति सदैव जातीय और सामाजिक समीकरणों की बिसात पर खेली जाती रही है।
यहां यादव, ब्राह्मण, मल्लाह और वैश्य समुदायों का वोट निर्णायक होता है।2020 में यहां कुल 3,17,948 मतदाता थे — जिनमें 14% अनुसूचित जाति और 14.4% मुस्लिम मतदाता थे।
अब मतदाताओं की संख्या बढ़कर 3,26,585 हो चुकी है।ग्रामीण मतदाताओं की संख्या 93% से अधिक है, इसलिए सड़क, बाढ़, शिक्षा और रोजगार जैसे स्थानीय मुद्दे ही चुनावी एजेंडा तय करते हैं।
नीतीश मिश्रा पर जनता की नाराजगी?
भले ही नीतीश मिश्रा इस समय बिहार सरकार में उद्योग मंत्री हैं, लेकिन झंझारपुर के मतदाता अब सवाल पूछ रहे हैं —“उद्योग मंत्री अपने क्षेत्र में एक भी उद्योग क्यों नहीं ला पाए?”
स्थानीय लोगों का कहना है कि मिश्रा परिवार ने वर्षों तक सत्ता की चाबी तो अपने पास रखी,लेकिन झंझारपुर को ना जिला बनाया, ना रोजगार का केंद्र।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि “नीतीश मिश्रा और उनके पिता डॉ. जगन्नाथ मिश्रा, दोनों ही अंधराठाढ़ी प्रखंड के ब्राह्मण वोटरों के लिए राजनीतिक रूप से आंखों की किरकिरी बन गए थे।”
नीतीश मिश्रा पर यह भी आरोप है कि उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर अंधराठाढ़ी प्रखंड के लगभग 17 पंचायतों को काटकर राजनगर सुरक्षित सीट में जोड़वा दिया, ताकि विरोधी वोट कमजोर पड़ें।
स्थानीय ब्राह्मण समाज इसे अपने “राजनीतिक भविष्य के साथ विश्वासघात” मान रहा है।
डॉ. जगन्नाथ मिश्रा की विरासत या भ्रष्टाचार की लकीर?
कभी झंझारपुर की शान कहे जाने वाले डॉ. मिश्रा ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई थी, लेकिन चुनाव में बुरी तरह हार गए।वहीं, उनके पुत्र नीतीश मिश्रा पर आरोप है कि उन्होंने अपने पिता की “भ्रष्टाचार वाली विरासत को आगे बढ़ाया”।
स्थानीय ठेकेदारों और निर्माण कार्यों में भाई-भतीजावाद के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं।
कमला नदी की बाढ़ हर साल तबाही मचाती है, लेकिन समाधान आज तक नहीं मिला।
स्थानीय लोग कहते हैं, “मंत्री साहब केवल फाइलों में पुल बनवाते हैं, ज़मीन पर नहीं।”
कुछ प्रबुद्ध स्थानीय लोगों ने यहां तक मंत्री वा बीजेपी प्रत्याशी नीतीश मिश्रा और जेडीयू कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ( जो झंझारपुर के अरड़ियां गांव के रहने वाले हैं ) पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ये दोनों मिलकर अपने पोषित ठेकेदारों को अपने राजनीतिक रसूख से सभी सरकारी ठेके दिलवाकर झंझारपुर के भविष्य को नेस्तनाबूद कर दिया है
भाजपा नेतृत्व पर भी सवाल — “क्या झंझारपुर में कोई स्थानीय चेहरा नहीं?”
बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व पर भी स्थानीय नेताओं ने नाराजगी जताई है।
प्रो. गीता नाथ झा, जिन्होंने जीवन भर भाजपा की विचारधारा को साधा,
कहते हैं —“हम जैसे कार्यकर्ताओं ने पार्टी के लिए अपना जीवन दे दिया, लेकिन टिकट हमेशा पैसे वालों और हेलिकॉप्टर नेताओं को दे दिया जाता है।
”उन्होंने तंज कसते हुए कहा —“नीतीश मिश्रा जैसे बाहरी और रसूखदार नेताओं के कारण ही कांग्रेस की तरह भाजपा का भी यही हाल होने वाला है।”
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि झंझारपुर अब बदलाव के मूड में है —यहां जनता अब न तो कांग्रेस की विरासत देखना चाहती है, न भाजपा की खरीद-फरोख्त वाली राजनीति।
लोग स्थानीय चेहरों और साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं को आगे बढ़ाने का मन बना चुके हैं।
निष्कर्ष:
एक सीट, दो विरासतें, कई सवाल
झंझारपुर की लड़ाई सिर्फ नीतीश मिश्रा बनाम गुलाब यादव नहीं है —यह “राजनीतिक घमंड बनाम जन-सरोकार” की जंग बन चुकी है।
एक तरफ दशकों से सत्ता का सुख भोगने वाला परिवार,दूसरी तरफ वह परिवार जो जनता के बीच संघर्ष कर अपनी जगह बनाना चाहता है।
इतिहास गवाह है — झंझारपुर ने नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन अपने विकास का मुख्यमंत्री नहीं चुना।
अब देखना यह है कि 2025 में झंझारपुर की जनता इतिहास दोहराती है या नया इतिहास रचती है।
नोट:
झंझारपुर विधानसभा क्षेत्र मिथिला की आत्मा है।यहां की जनता सियासी नारे से नहीं, में निष्ठा और नतीजे से वोट करती है।इस बार की लड़ाई में हवा साफ़ है —“अबकी बार झंझारपुर अपने नेता खुद चुनेगा, दिल्ली या पटना से थोपे गए नहीं।
