बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 17 जुन
एशिया में तेजी से बदलते सामरिक समीकरणों के बीच भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति और रक्षा ढांचे पर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। प्रख्यात भू-राजनीतिक विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने भारत की रक्षा व्यवस्था पर महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए कहा है कि चीन जैसी उभरती सैन्य महाशक्ति का सामना करने के लिए भारत को जापान के रक्षा सुधारों से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।चेलानी का मानना है कि विडंबना यह है कि एक ओर परमाणु शक्ति संपन्न भारत है, जबकि दूसरी ओर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शांतिवादी संविधान अपनाने वाला जापान। इसके बावजूद जापान ने बीते दशक में अपनी रक्षा संरचना, निर्णय क्षमता और सैन्य समन्वय को जिस गति से आधुनिक बनाया है, वैसी प्रगति भारत अब तक नहीं कर सका है।
जापान ने बदली सोच, बदली व्यवस्था
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान ने सैन्यवाद की पुनरावृत्ति रोकने के लिए रक्षा मंत्रालय में नौकरशाही को प्रमुख स्थान दिया था। लेकिन चीन और उत्तर कोरिया से बढ़ते खतरों ने टोक्यो को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया।साल 2015 में जापान ने व्यापक रक्षा सुधार लागू किए। इन सुधारों के तहत सैन्य अधिकारियों और नौकरशाहों को निर्णय प्रक्रिया में समान महत्व दिया गया। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) को अधिक प्रभावी बनाया गया और रक्षा, खुफिया तथा राजनीतिक नेतृत्व के बीच समन्वय मजबूत किया गया। परिणामस्वरूप जापान की रक्षा प्रणाली अधिक चुस्त, पेशेवर और त्वरित निर्णय लेने में सक्षम बन गई।
भारत में सुधार की रफ्तार क्यों धीमी?
चेलानी के अनुसार भारत आज भी काफी हद तक उस प्रशासनिक सोच से संचालित हो रहा है जिसकी जड़ें स्वतंत्रता प्राप्ति के शुरुआती वर्षों में हैं। उस दौर में सैन्य तख्तापलट की आशंकाओं के कारण सेना की संस्थागत भूमिका सीमित रखी गई और रक्षा मंत्रालय में नौकरशाही का वर्चस्व स्थापित हुआ।हालांकि वर्ष 2019 में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) का पद सृजित कर तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और संयुक्त युद्ध क्षमता विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया था। लेकिन दिसंबर 2021 में पहले CDS जनरल बिपिन रावत की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु के बाद इस पद की पात्रता शर्तों में बदलाव किए गए, जिससे सेवानिवृत्त अधिकारियों को भी CDS बनने का अवसर मिला।चेलानी का तर्क है कि इस प्रकार के कदम सैन्य नेतृत्व की संस्थागत स्वतंत्रता को सीमित कर सकते हैं और दीर्घकाल में रक्षा सुधारों की गति को प्रभावित कर सकते हैं।
भविष्य का युद्ध 1962 जैसा नहीं होगा
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में भारत और चीन के बीच कोई बड़ा सैन्य संघर्ष होता है तो वह केवल हिमालयी सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा। आधुनिक युद्ध की प्रकृति पूरी तरह बदल चुकी है।भविष्य की लड़ाई एक साथ कई मोर्चों पर लड़ी जाएगी—भूमि, समुद्र, वायु, साइबर स्पेस और अंतरिक्ष। ऐसे बहुआयामी युद्ध में केवल सैनिक शक्ति ही नहीं, बल्कि तेज निर्णय क्षमता, एकीकृत कमान संरचना, आधुनिक तकनीक और उच्च स्तरीय सैन्य समन्वय निर्णायक भूमिका निभाएंगे।यही कारण है कि विश्व की प्रमुख सैन्य शक्तियां अब पारंपरिक नौकरशाही प्रक्रियाओं की बजाय विशेषज्ञता आधारित सुरक्षा ढांचे को प्राथमिकता दे रही हैं।
लोकतंत्र और सैन्य पेशेवरता विरोधी नहीं
ब्रह्मा चेलानी का सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह है कि लोकतांत्रिक नियंत्रण और सैन्य पेशेवरता एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। जापान ने यह समझ लिया है कि प्रभावी नागरिक नियंत्रण का अर्थ नौकरशाही का पूर्ण वर्चस्व नहीं, बल्कि विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित संतुलित निर्णय प्रक्रिया है।भारत की सेना का लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति समर्पण विश्वभर में सम्मानित माना जाता है। ऐसे में रक्षा ढांचे को अधिक आधुनिक, एकीकृत और विशेषज्ञता-आधारित बनाने से लोकतांत्रिक मूल्यों को कोई खतरा नहीं होगा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अधिक मजबूत होगी।
भारत के लिए बड़ा संदेश
चीन लगातार अपनी सैन्य क्षमता, नौसैनिक शक्ति, साइबर युद्धक क्षमता और अंतरिक्ष कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है। ऐसे समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल हथियार खरीदना नहीं, बल्कि अपनी निर्णय प्रक्रिया और रक्षा संस्थानों को 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालना है।
ब्रह्मा चेलानी का संदेश स्पष्ट है—यदि भारत को भविष्य की चुनौतियों का प्रभावी सामना करना है, तो उसे अतीत की प्रशासनिक सोच से आगे बढ़कर आधुनिक सैन्य संरचना, तेज निर्णय प्रणाली और विशेषज्ञता आधारित रक्षा प्रबंधन को अपनाना होगा।
जापान का अनुभव इस दिशा में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक साबित हो सकता है।
