बी के झा
NSK

सतारा (महाराष्ट्र) / नई दिल्ली, 25
महाराष्ट्र के सतारा ज़िले से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने राज्य भर में हड़कंप मचा दिया है।फलटण उपजिला अस्पताल में कार्यरत 26 वर्षीय महिला डॉक्टर ने आत्महत्या कर ली — लेकिन उससे पहले उसने अपने हाथ पर लिखा,PSI गोपाल बदने ने मेरा कई बार रेप किया… अब मैं और नहीं सह सकती।”इस सुसाइड नोट ने पुलिस विभाग से लेकर सियासी गलियारों तक भूचाल ला दिया है।
हथेली पर सुसाइड नोट और चार पन्नों की डायरी ने खोले राज डॉक्टर की हथेली के अलावा, पुलिस को कमरे से चार पन्नों का सुसाइड नोट भी बरामद हुआ है।नोट में डॉक्टर ने लिखा है कि आरोपी सब-इंस्पेक्टर गोपाल बदने ने उसके साथ चार बार दुष्कर्म किया और उसे पाँच महीने से अधिक समय तक मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया।डॉक्टर ने यह भी लिखा कि उसे कई बार “फर्जी फिटनेस सर्टिफिकेट” जारी करने के लिए दबाव डाला गया ताकि पुलिस आरोपी को बचा सके।
उसने साफ कहा —मैं कानून की पढ़ाई नहीं, चिकित्सा की पढ़ाई की हूँ… लेकिन मुझसे पुलिस झूठे केसों में मदद चाहती है।”डॉक्टर ने यह भी आरोप लगाया कि उसे दबाव केवल पुलिस वालों से ही नहीं, बल्कि एक सांसद और उसके दो निजी सहायकों से भी झेलना पड़ा।
आखिरी ड्यूटी के बाद मौत का सफर
डॉ. संपदा (परिवर्तित नाम) पिछले करीब दो साल से फलटण उपजिला अस्पताल में कार्यरत थीं।उनकी “बॉन्ड सर्विस” खत्म होने में बस एक महीना बाकी था, जिसके बाद वह पीजी की पढ़ाई करना चाहती थीं।ड्यूटी खत्म करने के बाद शुक्रवार की शाम वह अपने किराए के कमरे से निकलीं — और कुछ घंटे बाद उनकी लाश होटल के कमरे में मिली।हाथ पर सुसाइड नोट लिखा था, और मेज़ पर चार पन्नों की डायरी रखी थी।
आरोपी पुलिस अधिकारी और पीड़िता का संबंध जांच में सामने आया है कि आरोपी गोपाल बदने और मृतक डॉक्टर दोनों बीड ज़िले के रहने वाले थे और एक ही बंजारा जाति से थे।बदने पहले फलटण ग्रामीण थाने में बतौर कॉन्स्टेबल तैनात था और बाद में प्रमोशन पाकर PSI बना।वह पिछले दो साल से इसी थाने में कार्यरत था।दूसरा आरोपी प्रशांत बनकर, उस घर का बेटा है जिसमें डॉक्टर किराए पर रहती थीं। डॉक्टर ने सुसाइड नोट में उस पर भी मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाया है।
हत्या या आत्महत्या?
पुलिस जांच में कई उलझनें पुलिस के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि —क्या यह आत्महत्या है या हत्या का खेल?होटल का डीवीआर फुटेज जब्त कर लिया गया है।डॉक्टर और पुलिस अधिकारी के बीच हुई पिछली शिकायतों की फाइलें खंगाली जा रही हैं।
हैंडराइटिंग एक्सपर्ट और फॉरेंसिक टीम जांच कर रही है कि क्या हथेली पर लिखा नोट वास्तव में डॉक्टर का ही है।प्राथमिक जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ दिन पहले डॉक्टर ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट बदलने के दबाव के खिलाफ शिकायत दी थी।लेकिन तब उसे कोई ठोस सुरक्षा नहीं मिली।
परिवार का दर्द: “वो पहले ही कह रही थी कि दबाव बढ़ रहा है”
डॉक्टर संपदा के चाचा ने कहा —वो कई दिनों से कह रही थी कि पुलिस और नेताओं का दबाव बढ़ रहा है।उसे कहा गया कि अगर उसने फर्जी रिपोर्ट नहीं बनाई तो उसका करियर खत्म कर देंगे।उसने कई बार कहा था कि वो अब यह सब नहीं सह पाएगी… और आत्महत्या कर लेगी।”परिवार ने सरकार से मांग की है कि आरोपी पुलिसकर्मी और उससे जुड़े सभी लोगों पर हत्या और बलात्कार का केस चलाया जाए।
महिला आयोग हुआ सक्रिय, सरकार पर उठे सवाल राज्य महिला आयोग ने मामले का संज्ञान लेते हुए सतारा पुलिस अधीक्षक को नोटिस जारी किया है।
आयोग ने सवाल उठाया कि —अगर पीड़िता ने पहले शिकायत की थी, तो उसे सुरक्षा क्यों नहीं दी गई?”फिलहाल आरोपी पुलिस अधिकारी गोपाल बदने और सह आरोपी प्रशांत बनकर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 64(2)(N) और 108 के तहत मामला दर्ज किया गया है।दोनों की गिरफ्तारी की तैयारी जारी है।
सियासी संग्राम: “
जब रक्षक ही भक्षक बन जाए…”घटना पर राजनीति भी गर्मा गई है।शिवसेना (UBT) नेता संजय राऊत ने केंद्र और राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला।
उन्होंने कहा —> “प्रधानमंत्री मोदी हर मंच पर बेटी की सुरक्षा की बात करते हैं,लेकिन उन्हीं के ‘डबल इंजन’ शासन में एक डॉक्टर बेटी पुलिस के हवस का शिकार होकर मर गई।जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो बेटियाँ कैसे सुरक्षित रहेंगी?”
समाज के लिए एक आईना
यह घटना सिर्फ एक आत्महत्या नहीं,बल्कि प्रणाली की विफलता का प्रतीक है —जहाँ डॉक्टर जैसी शिक्षित महिला भी न्याय की उम्मीद छोड़ देती है।
यह सवाल उठाती है कि जब कानून के रखवाले ही कानून तोड़ने लगें,तो आम नागरिक कहाँ जाए?अब वक्त है जवाबदेही कासतारा का यह मामला बताता है कि “बेटी बचाओ” सिर्फ नारा नहीं,बल्कि सुरक्षा और सम्मान की ठोस व्यवस्था बननी चाहिए।
राज्य सरकार को चाहिए कि पुलिस विभाग मेंजेंडर-सेंसिटिविटी ट्रेनिंग, निगरानी तंत्र और आंतरिक जांच इकाई को और मज़बूत करे।
