बी के झा
NSK

पटना / नई दिल्ली, 25 अक्टूबर
बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे अपने चरम पर पहुंच रहा है, वैसे-वैसे सियासी बयानबाज़ी भी तेज़ होती जा रही है। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महागठबंधन पर ‘जंगलराज’ का तंज कसते हुए एनडीए को फिर से सत्ता में लाने की अपील की है,
वहीं दूसरी ओर जनसुराज अभियान के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति में ‘तीसरे विकल्प’ की जोरदार दावेदारी पेश की है।
मोतिहारी में आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए प्रशांत किशोर ने कहा —बिहार के लोगों को अब डर और मजबूरी की राजनीति से ऊपर उठना होगा। अब आपके पास तीसरा विकल्प मौजूद है।
लालू के डर से नीतीश को और नीतीश से नाराज़ होकर लालू को वोट देने की ज़रूरत नहीं है। इस बार बिहार को नई दिशा देने का समय है।”
उन्होंने आगे कहा कि पिछले तीन दशकों से बिहार की राजनीति दो ध्रुवों – राजद और जदयू-भाजपा गठबंधन – के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन दोनों ही व्यवस्थाओं ने बिहार को वह प्रगति नहीं दी जिसकी उम्मीद थी।बिहार आज भी शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मामलों में पिछड़ा हुआ है। जिनसे सुधार की उम्मीद थी, उन्होंने सिर्फ़ सत्ता का खेल खेला,”
प्रशांत किशोर ने कहा।
जनसुराज का संदेश:प्रशांत किशोर ने अपने जनसुराज अभियान को ‘जनता की आवाज़’ बताया और कहा कि उनकी राजनीति किसी जाति या धर्म नहीं बल्कि ‘काम और ईमान’ के मुद्दे पर आधारित है। उन्होंने कहा कि जनसुराज के उम्मीदवार जनता के बीच से चुने जा रहे हैं और उनका मकसद सिर्फ़ चुनाव जीतना नहीं बल्कि शासन का नया मॉडल खड़ा करना है।
राजनीतिक विश्लेषण:
विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर की यह बयानबाज़ी नीतीश कुमार और लालू यादव दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण है। अगर जनसुराज अभियान ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ बना लेता है, तो यह पारंपरिक वोट समीकरणों को बदल सकता है।
निष्कर्ष:
बिहार की सियासत फिलहाल त्रिकोणीय होती नज़र आ रही है — एनडीए, महागठबंधन और जनसुराज।
ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या प्रशांत किशोर का ‘तीसरा विकल्प’ वाकई मतदाताओं के मन में जगह बना पाएगा या नहीं।
