बी.के. झा
NSK


पटना / नई दिल्ली, 30 अक्टूबर
बिहार की राजनीति एक बार फिर उबलने लगी है।महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव द्वारा जारी किया गया चुनावी घोषणापत्र — ‘तेजस्वी प्रण’ — अब बटाईदारी (sharecropping) के मुद्दे पर बड़ा राजनीतिक बवंडर बन चुका है।
घोषणापत्र में कहा गया है कि राज्य की नई सरकार बनने परसभी बटाईदार किसानों को पहचान पत्र जारी किए जाएंगे और उन्हें किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सरकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित किया जाएगा।
लेकिन इसी वादे ने सोशल मीडिया और सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है।
बीजेपी से लेकर कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इस घोषणा को “जमीन बांटने की भूमिका” बताते हुए आरोप लगाया है कि महागठबंधन किसानों की जमीन बटाईदारों को देने की तैयारी कर रहा है।
निशिकांत दुबे का हमला: “अब आपकी जमीन दूसरों की हो जाएगी”29 अक्टूबर को बीजेपी सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने X (ट्विटर) पर लिखा —कांग्रेस-राजद के घोषणापत्र के अनुसार अब हमारी-आपकी जमीन दूसरों की हो जाएगी।
बटाईदारी कानून में संशोधन कर इसे लागू किया जाएगा।पुरखों की संपत्ति अब सरकारी संपत्ति बन जाएगी — बाप-दादा सब स्वाहा।
उनका यह बयान वायरल हुआ और भाजपा ने इसे “महागठबंधन का छुपा एजेंडा” बताकर हमला तेज कर दिया।
वरिष्ठ पत्रकारों की चेतावनी:
‘तेजस्वी को महंगा पड़ सकता है यह वादा’बिहार के वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी ने इस घोषणा को राजनीतिक भूल बताया।
उन्होंने लिखा —जिसने तेजस्वी के घोषणापत्र में बटाईदारी का मुद्दा डलवाया, वह उनका विरोधी है।लालू यादव और नीतीश कुमार भी इस मुद्दे से पीछे हट चुके थे।
यह राजनीतिक आत्मघाती कदम है — खरहा की तरह तेज दौड़कर हारने का खतरा।”
वहीं वरिष्ठ पत्रकार बी.के. झा ने इस घोषणा को “राजनीतिक आत्मघात” करार दिया।
उन्होंने कहा —तेजस्वी यादव और राहुल गांधी अपने ही राजनीतिक भविष्य पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं।
यह वही गलती है जो लालू यादव ने 90 के दशक में जातीय संघर्ष को हवा देकर की थी,
जिसका परिणाम आज तक आरजेडी भुगत रही है। बटाईदारी को चुनावी हथियार बनाना बिहार में सामाजिक तनाव और वर्ग संघर्ष की वापसी का संकेत है।
झा ने आगे जोड़ा —तेजस्वी और राहुल गांधी के इस घोषणापत्र ने महागठबंधन की मंशा उजागर कर दी है।लगता है, सत्ता की भूख ने उन्हें बिहार की सामाजिक शांति से खिलवाड़ करने पर मजबूर कर दिया है।”
मनोज मुकुल की राय:
शाहाबाद-मगध में नुकसान तयटीवी पत्रकार मनोज मुकुल का कहना है कि इस वादे से महागठबंधन को शाहाबाद और मगध क्षेत्रों में भारी नुकसान झेलना पड़ेगा।
राज्य में करीब 35 लाख बटाईदार हैं, लेकिन जमीन मालिकों की संख्या इससे कई गुना अधिक है।
इस मुद्दे ने उन्हें असुरक्षित महसूस कराया है।
क्या सचमुच जमीन छीनी जाएगी? घोषणापत्र में लिखा क्या हैघोषणापत्र के पेज-17 पर ‘कृषि, किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था’ शीर्षक के अंतर्गत लिखा गया है —
सभी बटाईदार किसानों को पहचान पत्र जारी किए जाएंगे और उन्हें एमएसपी, केसीसी तथा अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा।
”वहीं पॉइंट-21 और 22 में भूमि सर्वेक्षण प्रणाली को सुदृढ़ बनाने और भूमि सुधार की प्रक्रिया तेज करने की बात कही गई है। यही दो बिंदु अब विवाद की जड़ बन गए हैं।
पृष्ठभूमि:
विधानसभा समिति ने 2024 में दी थी ऐसी सिफारि शफरवरी 2024 में विधानसभा की कृषि उद्योग विकास समिति — जिसकी अध्यक्षता सीपीआई(एम-एल) के विधायक सुदामा प्रसाद कर रहे थे — ने सुझाव दिया था किबटाईदारों को पहचान पत्र दिया जाए और उन्हें कृषि योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए।समिति ने यह भी कहा था कि भूमि मालिकों की मनमानी पर रोक लगाई जाए और बटाईदारी की दर तय हो।
यानी यह विचार नया नहीं है, लेकिन चुनावी घोषणा के रूप में इसका प्रयोग पहली बार हुआ है।“
पट्टा” का मतलब मालिकाना हक नहीं —
विशेषज्ञों ने दी सफाई
सीपीआई के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद शत्रुघ्न प्रसाद सिंह ने कहा —
यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि बटाईदारों को जमीन दे दी जाएगी।ऐसा कुछ नहीं है।‘पट्टा’ का अर्थ सिर्फ इतना है कि बटाईदार और जमीन मालिक के बीच करार का लिखित दस्तावेज बनेगा।मालिकाना हक तो रजिस्ट्री से तय होता है, न कि बटाईदारी से।
उन्होंने कहा —महागठबंधन का वादा सिर्फ इतना है कि जो खेत जोत रहा है, उसे सरकारी योजनाओं का लाभ मिले।इसमें जमीन छीनने की कोई बात नहीं है।”स्थानीय शिक्षाविदों और विश्लेषकों की चेतावनी —
“राजनीतिक आग से मत खेलिए”
एक स्थानीय शिक्षाविद ने कहा —
तेजस्वी यादव सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं —
आखिर उनके रगों में लालू का ही खून दौड़ रहा है।लेकिन इस तरह के वादे से बिहार में जातीय और वर्गीय हिंसा की जमीन तैयार होगी।
उन्होंने आगे जोड़ा —थोड़ा बहुत राजनीतिक लाभ मिल सकता है, लेकिन इसने समाज में जमीन को लेकर असुरक्षा और अविश्वास की भावना बढ़ा दी है।”
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने कहा —
अच्छा हुआ यह सब चुनाव से पहले सामने आ गया।तेजस्वी और राहुल गांधी की राजनीति का मकसद अब साफ है —
सत्ता की भूख मिटाने के लिए बिहार में वर्ग संघर्ष और साम्प्रदायिक तनाव भड़काने का खेल।निष्कर्ष: ‘तेजस्वी प्रण’ या ‘राजनीतिक जुआ’?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘तेजस्वी प्रण’ के इस बिंदु नेएक ओर जहां खेत जोतने वाले गरीब किसानों में उम्मीद जगाई है,वहीं दूसरी ओर जमीन मालिक वर्ग में डर और आक्रोश दोनों पैदा कर दिया है।
बिहार की राजनीति में बटाईदारी कानून हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है —और जो भी नेता इस आग से खेलने की कोशिश करता है,वह अक्सर खुद ही उसमें झुलस जाता है।
आगामी चुनाव तय करेंगे कि तेजस्वी यादव का यह ‘बटाईदारी कार्ड’ राजनीतिक तुरुप साबित होगा या विनाश का ‘ब्लंडर’।
