बी के झा
NSK

पटना/लखनऊ / न ई दिल्ली,| 1 नवम्बर 2025
बिहार चुनावी माहौल के बीच शराब तस्करों की बड़ी साजिश को लखनऊ एसटीएफ (STF) ने नाकाम कर दिया है। शनिवार देर रात किसानपथ के कल्ली पश्चिम ओमेक्स कट के पास एसटीएफ की टीम ने एक कंटेनर को रोककर जब तलाशी ली तो खाद की बोरियों के नीचे 575 पेटियां अंग्रेजी शराब बरामद हुईं —
जिसकी कीमत करीब 75 लाख रुपये बताई जा रही है।यह खेप बिहार के दरभंगा जिले में चुनाव के दौरान “खपाने” के लिए जा रही थी। पुलिस ने मौके से हरियाणा के झज्जर जिले के बेरी चिमनी गांव निवासी विश्ववेंद्र को गिरफ्तार कर लिया है।
खाद की बोरियों के नीचे छिपी थी शराब की 575 पेटियांडिप्टी एसपी विमल कुमार सिंह के अनुसार, सूचना मिली थी कि बिहार चुनाव से पहले बड़ी मात्रा में शराब की खेप हरियाणा-पंजाब से बिहार भेजी जा रही है।इस पर इंस्पेक्टर महावीर सिंह और दीपक सिंह की टीम को तैनात किया गया। जब संदिग्ध कंटेनर को रोका गया और तलाशी ली गई, तो ऊपरी हिस्से में 210 बोरियां खाद की पाई गईं। लेकिन जैसे ही नीचे की परत खोली गई — अधिकारी भी हैरान रह गए।नीचे की परत में छिपी थी 575 पेटियां अवैध अंग्रेजी शराब की, जो दरभंगा पहुंचाई जानी थी।
गिरोह का नेटवर्क —
हरियाणा से बिहार तकपूछताछ में गिरफ्तार तस्कर विश्ववेंद्र ने खुलासा किया कि यह शराब सोनू राठी गिरोह की थी। गिरोह का नेटवर्क हरियाणा, पंजाब और बिहार तक फैला हुआ है।इस गिरोह में गुरनीत सिंह गोगिया और अतुल नामक तस्कर भी शामिल हैं। यह लोग हरियाणा व पंजाब से अवैध अंग्रेजी शराब कंटेनर में भरकर बिहार भेजते हैं, जहाँ शराबबंदी कानून लागू है।
विश्ववेंद्र ने बताया —चंडीगढ़ से खाद की बोरियां लोड की गई थीं। उसके नीचे शराब की पेटियां रखी गईं। हमें दरभंगा में एक व्यक्ति को डिलीवरी देनी थी, जिसका नाम गिरोह के सरगना ने बताया था।
एक खेप पर मिलता था 1 लाख रुपयेचालक विश्ववेंद्र ने खुलासा किया कि एक खेप को सुरक्षित बिहार पहुंचाने पर उसे एक लाख रुपये मिलते थे।वह खुद को सिर्फ “ड्राइवर” बताता है, जबकि शराब की खरीद-फरोख्त और वितरण का पूरा काम गिरोह के मुख्य सरगना और सप्लाई नेटवर्क संभालते हैं।
डिप्टी एसपी ने बताया कि गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश में एसटीएफ की टीमें लगातार दबिश दे रही हैं।
बिहार चुनावी माहौल और शराबबंदी की पोलयह घटना सिर्फ अवैध तस्करी का मामला नहीं, बल्कि चुनावी बिहार की “सच्चाई” पर भी सवाल खड़ा करती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है —
दरभंगा में शराबबंदी लागू है, लेकिन 75 लाख की खेप अगर इतनी आसानी से बिहार पहुंचाई जा रही थी, तो सवाल उठता है कि आखिर इतनी बड़ी आपूर्ति कौन और किसके संरक्षण में कर रहा था?
क्या यह बिना सत्ताधारी तंत्र की जानकारी के संभव है?
एक स्थानीय राजनीतिक पर्यवेक्षक ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा —
यह कोई पहली घटना नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार यूपी एसटीएफ ने पकड़ लिया, नहीं तो बिहार पुलिस को भनक तक नहीं लगती। यह मामला वहीं दफ्न हो जाएगा जहाँ से उठा है —
क्योंकि यही है बिहार का ‘सुशासन मॉडल’।”
चुनावी दौर में बढ़ी शराब तस्करी की सक्रियताएसटीएफ सूत्रों के मुताबिक, बिहार चुनावी मौसम में शराब तस्करी सबसे ज्यादा होती है। कई गिरोह राजनीतिक सरगनाओं की मदद से सीमावर्ती जिलों के रास्ते से अवैध शराब बिहार पहुंचाते हैं।दरभंगा, सीवान, सारण, भागलपुर, और बांका जैसे जिले इस तस्करी के बड़े ठिकाने माने जाते हैं।
कानून सख्त, लेकिन अमल कमजोरबिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून 2016 से लागू है। इसके बावजूद हर साल हजारों लीटर अवैध शराब जब्त की जाती है।विपक्ष बार-बार आरोप लगाता रहा है कि “शराबबंदी अब सिर्फ दिखावा रह गई है, जबकि असल में यह तंत्र का रेवेन्यू मॉडल बन चुका है।”
निष्कर्ष
लखनऊ एसटीएफ की यह कार्रवाई जहां चुनावी माहौल में एक बड़ी सफलता मानी जा रही है, वहीं इसने बिहार की शराबबंदी व्यवस्था पर गहरा सवाल भी खड़ा कर दिया है।अब देखना यह होगा कि इस मामले में केवल ड्राइवर पर कार्रवाई होती है, या फिर पुलिस इस नेटवर्क की असली जड़ों तक पहुँचती है — जहाँ से ‘राजनीति और अपराध’ की डोरें आपस में जुड़ती हैं।
