बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 13 मई
भारत-पाकिस्तान संबंधों में वर्षों से चली आ रही तल्खी, आतंकवाद, सीमा तनाव और राजनीतिक अविश्वास के बीच Rashtriya Swayamsevak Sangh की ओर से आया एक बयान अब राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के गलियारों में नई बहस छेड़ रहा है। संघ के सरकार्यवाह Dattatreya Hosabale ने पाकिस्तान के साथ संवाद और लोगों के बीच संपर्क बनाए रखने की वकालत करते हुए कहा है कि “दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं होने चाहिए” और दोनों देशों के बीच गतिरोध तोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम “जन-से-जन संपर्क” हो सकता है।
संघ के शीर्ष पदाधिकारी का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत-पाक संबंध लंबे समय से अविश्वास, सीमा पार आतंकवाद और राजनीतिक कटुता के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में संघ की ओर से बातचीत और सांस्कृतिक रिश्तों पर जोर देना केवल एक सामान्य टिप्पणी नहीं, बल्कि व्यापक रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।“
सुरक्षा भी जरूरी, संवाद भी जरूरी”
समाचार एजेंसी को दिए साक्षात्कार में होसबाले ने स्पष्ट कहा कि भारत की सुरक्षा और आत्मसम्मान सर्वोपरि है तथा केंद्र सरकार को इस दिशा में कठोर रुख बनाए रखना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि संवाद के रास्ते पूरी तरह बंद कर देना समाधान नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा—“किसी भी देश की सुरक्षा और आत्मसम्मान की रक्षा करना आवश्यक है। लेकिन साथ ही हमें अपने दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए। संवाद के लिए हमेशा एक खिड़की खुली रहनी चाहिए।”होसबाले का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक प्रेरणा का प्रमुख स्रोत माना जाता है। ऐसे में संघ के इस रुख को दक्षिण एशिया में भारत की दीर्घकालिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
“पाकिस्तान का नेतृत्व भरोसा खो चुका है
”संघ सरकार्यवाह ने पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व पर तीखा हमला भी बोला। उन्होंने कहा कि बार-बार आतंकवाद को संरक्षण और भारत विरोधी गतिविधियों के कारण वहां का नेतृत्व भारत का विश्वास खो चुका है।उन्होंने 26/11 मुंबई हमले, पुलवामा और पहलगाम जैसे आतंकी हमलों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने कूटनीतिक स्तर पर हरसंभव प्रयास किए, लेकिन पाकिस्तान लगातार “छोटी-छोटी उकसावे वाली हरकतें” करता रहा।हालांकि इसके बावजूद उन्होंने यह भी कहा कि संबंधों को पूरी तरह समाप्त करना भविष्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
“नागरिक समाज ही आखिरी उम्मीद
”होसबाले ने सबसे अधिक जोर नागरिक समाज की भूमिका पर दिया। उनका कहना था कि राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व से इतर शिक्षाविदों, खिलाड़ियों, वैज्ञानिकों, सांस्कृतिक संगठनों और सामाजिक नेतृत्व के माध्यम से संवाद की नई संभावनाएं तैयार की जा सकती हैं।
उन्होंने कहा—“हमारे सांस्कृतिक संबंध हैं। हम कभी एक ही राष्ट्र रहे हैं। अंततः नागरिक समाज के रिश्ते ही काम आएंगे।”संघ के इस बयान ने “ट्रैक-टू डिप्लोमेसी” यानी गैर-सरकारी संवाद प्रक्रिया को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। लंबे समय से कई बुद्धिजीवी, पूर्व राजनयिक और शांति कार्यकर्ता यह तर्क देते रहे हैं कि सरकारों के बीच संवाद रुकने के बावजूद लोगों के स्तर पर संपर्क जारी रहना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों ने क्या कहा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संघ का यह बयान केवल भावनात्मक अपील नहीं बल्कि एक “व्यावहारिक रणनीतिक संकेत” है।विदेश नीति विशेषज्ञों के अनुसार भारत अब यह समझ चुका है कि केवल सैन्य दबाव से पाकिस्तान की नीति में स्थायी बदलाव लाना संभव नहीं है। ऐसे में सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर संपर्क बनाए रखना दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि संघ पहली बार इतने स्पष्ट शब्दों में “संवाद” और “जन-संपर्क” को समाधान के रूप में सामने रख रहा है। इससे यह संकेत भी जाता है कि दक्षिण एशिया में स्थिरता को लेकर सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर भी व्यापक विमर्श चल रहा है।
शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने होसबाले के बयान का स्वागत किया है। उनका मानना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक तनाव चाहे जितना बढ़ जाए, लेकिन सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर संवाद टूटना पूरे क्षेत्र के लिए खतरनाक हो सकता है।दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कई शिक्षकों का कहना है कि दक्षिण एशिया में स्थायी शांति केवल सैन्य संतुलन से नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास निर्माण से संभव होगी।
कुछ शिक्षाविदों ने यह भी कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच अकादमिक आदान-प्रदान, खेल प्रतियोगिताएं, साहित्यिक मंच और सांस्कृतिक कार्यक्रम दोनों देशों के युवाओं में कट्टरता कम करने का माध्यम बन सकते हैं।
विपक्षी दलों ने क्या कहा?
कांग्रेस नेताओं ने संघ के बयान को “देर से आई लेकिन सही सोच” बताया। विपक्षी दलों का कहना है कि यदि संवाद आवश्यक है तो केंद्र सरकार को भी पाकिस्तान नीति पर स्पष्टता लानी चाहिए।कुछ विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार सार्वजनिक मंचों पर कठोर राष्ट्रवाद की राजनीति करती है, लेकिन अंदरखाने बातचीत की जरूरत को स्वीकार करती है।वहीं वामपंथी दलों ने कहा कि दक्षिण एशिया में शांति और विकास के लिए दोनों देशों के बीच तनाव कम होना जरूरी है।
उन्होंने सरकार से “नफरत की राजनीति” छोड़कर क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता देने की अपील की।हालांकि कुछ विपक्षी नेताओं ने यह सवाल भी उठाया कि यदि संघ संवाद की वकालत कर रहा है तो फिर वर्षों से पाकिस्तान विरोधी आक्रामक राजनीतिक भाषा क्यों इस्तेमाल की जाती रही।
बीजेपी की प्रतिक्रिया
Bharatiya Janata Party के नेताओं ने होसबाले के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि भारत हमेशा से “शांति चाहता है, लेकिन कमजोरी नहीं”।भाजपा प्रवक्ताओं ने कहा कि प्रधानमंत्री Narendra Modi की सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति अपनाई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत संवाद के सभी रास्ते बंद कर दे।भाजपा नेताओं का कहना है कि भारत की नीति स्पष्ट है—“
आतंक और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते”, लेकिन मानवीय और सांस्कृतिक संपर्कों को पूरी तरह समाप्त करना भी उचित नहीं होगा।
क्या बदल रही है दक्षिण एशिया की राजनीति?
विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया तेजी से बदल रही है। अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के बीच दक्षिण एशिया में स्थिरता भारत की रणनीतिक जरूरत बनती जा रही है।भारत अब वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और ऐसे में उसके लिए पड़ोसी क्षेत्र में लगातार तनाव बनाए रखना आर्थिक और सामरिक दोनों दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।इसीलिए संघ के इस बयान को केवल “सॉफ्ट लाइन” नहीं, बल्कि भविष्य की एक संभावित रणनीतिक सोच के रूप में देखा जा रहा है—जहां सुरक्षा और संवाद, दोनों को समानांतर रखा जाएगा।
फिलहाल इतना तय है कि दत्तात्रेय होसबाले के इस बयान ने भारत-पाक संबंधों पर राष्ट्रीय विमर्श को नया मोड़ दे दिया है। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि
क्या यह विचार केवल वैचारिक स्तर तक सीमित रहता है या आने वाले समय में भारत की कूटनीतिक नीति में भी इसकी झलक दिखाई देती है।
