बी के झा
नई दिल्ली, 28 मई
देश की राजनीति इस समय दो अलग-अलग राज्यों से उठे दो बड़े घटनाक्रमों की वजह से उबाल पर है। एक तरफ पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की वरिष्ठ सांसद डॉ. काकोली घोष दस्तीदार के इस्तीफे ने ममता बनर्जी की पार्टी के भीतर सुलग रही बगावत को सार्वजनिक कर दिया है, तो दूसरी तरफ कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने संभावित इस्तीफे से ठीक पहले जातिगत जनगणना रिपोर्ट स्वीकार कर ऐसा सियासी दांव चला है, जिसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देने लगी है।
दोनों घटनाएं केवल क्षेत्रीय राजनीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता, सामाजिक न्याय, महिला सुरक्षा और राजनीतिक नैतिकता की नई बहस को जन्म दे रही हैं।
TMC में अंदरूनी विस्फोट: काकोली घोष का इस्तीफा क्यों बना राजनीतिक भूकंप?
तृणमूल कांग्रेस की वरिष्ठ सांसद और अखिल भारतीय तृणमूल महिला कांग्रेस की अध्यक्ष डॉ. काकोली घोष दस्तीदार ने अपने पद से इस्तीफा देकर बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने अपने त्यागपत्र में पार्टी के ही एक “शिक्षित सांसद” पर महिला सांसदों के प्रति महिला विरोधी व्यवहार का आरोप लगाया है।उनका यह बयान केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे TMC की आंतरिक संस्कृति और नेतृत्व शैली पर सीधा हमला समझा जा रहा है।
RG कर कांड से लेकर भर्ती घोटाले तक
काकोली घोष ने अपने पत्र में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर की संदिग्ध मौत और कथित सबूतों से छेड़छाड़ का जिक्र करते हुए लिखा कि इन घटनाओं ने उनकी अंतरात्मा को झकझोर दिया।इसके अलावा उन्होंने राशन वितरण घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर भी खुलकर नाराजगी जाहिर की। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पहली बार TMC के अंदर से किसी बड़े नेता ने सार्वजनिक रूप से इतने गंभीर मुद्दों पर नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं।
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अरिंदम चक्रवर्ती कहते हैं,“यह इस्तीफा सिर्फ संगठनात्मक बदलाव नहीं है। यह उस नैतिक संकट का संकेत है, जिससे तृणमूल कांग्रेस इस समय गुजर रही है। जब महिला विंग की प्रमुख ही महिला सम्मान पर सवाल उठाए, तो संदेश बहुत दूर तक जाता है।”
क्या ममता बनर्जी की पकड़ कमजोर पड़ रही है?
हालिया विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार और शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से पार्टी में लगातार असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं। काकोली घोष जैसी वरिष्ठ महिला नेता का इस्तीफा ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक और नैतिक दोनों स्तरों पर बड़ा झटका माना जा रहा है।स्थानीय समाजसेवियों का कहना है कि बंगाल में लंबे समय से भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और राजनीतिक हिंसा को लेकर जनता में गुस्सा बढ़ रहा था। काकोली घोष का इस्तीफा उसी असंतोष की राजनीतिक अभिव्यक्ति है।
हिंदू समाज और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया
बंगाल के कई सामाजिक और हिंदू संगठनों ने इस घटनाक्रम को “राजनीतिक पतन” का संकेत बताया है। कुछ संगठनों का कहना है कि राज्य में लंबे समय से महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार के मुद्दों को दबाने की कोशिश की जाती रही है।एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा,“जब पार्टी के अंदर की महिला नेता खुद असुरक्षित महसूस कर रही हैं, तो आम महिलाओं की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
”हालांकि कुछ प्रगतिशील समूहों ने काकोली घोष के कदम को “नैतिक साहस” करार दिया और कहा कि लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछना जरूरी है।
विपक्ष का हमला
भाजपा ने इस मुद्दे पर ममता बनर्जी और TMC को घेरते हुए कहा कि पार्टी के अंदर लोकतंत्र और महिला सम्मान दोनों खत्म हो चुके हैं। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि RG कर कांड से लेकर भर्ती घोटाले तक हर मामले में सरकार ने सच्चाई दबाने की कोशिश की।वाम दलों और कांग्रेस ने भी TMC पर हमला बोला, लेकिन साथ ही भाजपा पर भी “राजनीतिक अवसरवाद” का आरोप लगाया।
कर्नाटक में सिद्धारमैया का ‘अहिंदा कार्ड’: इस्तीफे से पहले मास्टरस्ट्रोक?
जहां बंगाल में नैतिकता और संगठन संकट की चर्चा है, वहीं कर्नाटक में जातिगत राजनीति नया मोड़ ले चुकी है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने संभावित इस्तीफे से ठीक पहले राज्य की जातिगत जनगणना रिपोर्ट स्वीकार कर राजनीतिक हलकों में बड़ा संदेश दे दिया है।यह रिपोर्ट “सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण” के नाम से जानी जाती है, लेकिन आम जनता इसे “कर्नाटक जाति जनगणना” के तौर पर देख रही है।
आखिर क्या है AHINDA राजनीति?
सिद्धारमैया लंबे समय से “AHINDA” राजनीति के सबसे बड़े चेहरे माने जाते हैं।
AHINDA का अर्थ है:अल्पसंख्यक (Minorities)पिछड़ा वर्ग (Backward Classes)दलित (Dalits)उनकी राजनीति सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर आधारित रही है। ऐसे समय में जब कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन और डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चाएं तेज हैं, सिद्धारमैया का यह कदम अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की रणनीति माना जा रहा है।
शिक्षाविदों की राय
राजनीतिक शिक्षाविदों का मानना है कि जातिगत जनगणना आने वाले समय में भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन सकती है।समाजशास्त्री डॉ. वीणा राव कहती हैं,“भारत में आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस अब अनुमान नहीं, बल्कि डेटा आधारित राजनीति की ओर बढ़ रही है। कर्नाटक मॉडल आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकता है।”हालांकि कुछ शिक्षाविदों ने चेतावनी दी है कि जातिगत आंकड़ों का राजनीतिक इस्तेमाल सामाजिक ध्रुवीकरण भी बढ़ा सकता है।
कानूनविदों की चिंता
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण या नीति में बड़े बदलाव किए जाते हैं, तो मामला अदालत तक पहुंच सकता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय आरक्षण सीमा और सामाजिक संतुलन को लेकर नई संवैधानिक बहस छिड़ सकती है।वरिष्ठ अधिवक्ता आर. कृष्णमूर्ति के अनुसार,“जातिगत सर्वे का डेटा यदि पारदर्शी और वैज्ञानिक नहीं हुआ, तो उसकी वैधता अदालत में चुनौती झेल सकती है।”
विपक्ष का आरोप
भाजपा और जेडीएस ने सिद्धारमैया पर आरोप लगाया है कि वे कांग्रेस के अंदरूनी सत्ता संघर्ष से ध्यान हटाने के लिए जातिगत राजनीति को हवा दे रहे हैं।विपक्ष के नेता आर. अशोक ने कहा कि कांग्रेस समाज को जातियों में बांटकर राजनीतिक लाभ लेना चाहती है।
वहीं जेडीएस नेताओं ने दावा किया कि यह रिपोर्ट “वैज्ञानिक कम और राजनीतिक ज्यादा” है।
राष्ट्रीय राजनीति पर असर तय
राहुल गांधी लगातार राष्ट्रीय स्तर पर जातीय जनगणना की मांग उठाते रहे हैं। ऐसे में कर्नाटक का यह कदम विपक्षी राजनीति के लिए नया एजेंडा बन सकता है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कर्नाटक मॉडल लागू होता है, तो बिहार, महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी जातिगत सर्वे और आरक्षण समीक्षा की मांग तेज हो सकती है।
राजनीति अब सिर्फ सत्ता नहीं, नैतिकता और पहचान की लड़ाई
बंगाल में काकोली घोष का इस्तीफा और कर्नाटक में सिद्धारमैया का जाति दांव — दोनों घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि भारतीय राजनीति अब केवल चुनावी वादों तक सीमित नहीं रह गई है।एक तरफ महिला सम्मान, भ्रष्टाचार और राजनीतिक नैतिकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और जातिगत पहचान की राजनीति नई दिशा ले रही है।आने वाले समय में यह संघर्ष और तीखा होगा —
क्योंकि देश की राजनीति अब केवल सरकार बनाने की नहीं, बल्कि समाज की वैचारिक संरचना तय करने की लड़ाई बन चुकी है।
NSK


