बी के झा
NSK

पटना, 24 मई
बिहार की राजनीति में प्रतीकात्मक फैसले अक्सर दूरगामी संदेश देते हैं। इसी कड़ी में मुख्यमंत्री Samrat Choudhary द्वारा जेडीयू विधायक Chetan Anand को राज्य स्तरीय कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति का सदस्य बनाए जाने को महज प्रशासनिक नियुक्ति नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन और राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।यह फैसला ऐसे समय आया है, जब पूर्व सांसद Anand Mohan ने सार्वजनिक तौर पर अपने बेटे चेतन आनंद को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने पर नाराजगी जाहिर की थी।
आनंद मोहन का बयान एनडीए सरकार के भीतर दबाव की राजनीति और सामाजिक समीकरणों की बेचैनी को उजागर करने वाला माना गया था। अब सरकार ने चेतन आनंद को राज्य स्तरीय कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति में शामिल कर एक तरह से यह संकेत दिया है कि सत्ता पक्ष अपने प्रभावशाली सहयोगियों और सामाजिक आधार को नाराज नहीं रखना चाहता।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी इस समिति के अध्यक्ष होंगे, जबकि उपमुख्यमंत्री Vijay Kumar Chaudhary को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष Sanjay Saraogi और जेडीयू प्रदेश अध्यक्ष Umesh Singh Kushwaha को उपाध्यक्ष बनाया गया है। समिति में कुल 12 सदस्यों को शामिल किया गया है, जिन्हें उप मंत्री का दर्जा मिलेगा।इस सूची में चेतन आनंद के अलावा संगीता कुमारी, भरत बिंद, मुरारी प्रसाद गौतम, सिद्धार्थ सौरव और मोकामा की राजनीति में प्रभाव रखने वाली Neelam Devi का नाम भी शामिल है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सरकार ने जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश की है, ताकि आगामी चुनावी लड़ाई से पहले कोई वर्ग खुद को उपेक्षित महसूस न करे।
विपक्ष ने उठाए सवाल
महागठबंधन के नेताओं ने इस नियुक्ति को “राजनीतिक संतुलन बचाने की कवायद” बताया है। राजद नेताओं का कहना है कि सरकार के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा है और अब समितियों व पदों के जरिए नाराज चेहरों को शांत करने की कोशिश हो रही है। विपक्ष का आरोप है कि बिहार में बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर सरकार गंभीर नहीं है, लेकिन राजनीतिक प्रबंधन में पूरी ताकत झोंकी जा रही है।
कांग्रेस नेताओं ने भी तंज कसते हुए कहा कि “जब सरकार में मंत्री पद सीमित हो जाएं, तब उप मंत्री दर्जे वाली समितियां सत्ता संतुलन का माध्यम बन जाती हैं।” वाम दलों ने इस फैसले को “राजनीतिक पुनर्वास मॉडल” करार दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह फैसला कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पहला, आनंद मोहन अब भी बिहार के एक बड़े सामाजिक वर्ग पर प्रभाव रखते हैं। दूसरा, चेतन आनंद युवा चेहरा होने के साथ मिथिलांचल और कोसी क्षेत्र में राजनीतिक पहचान बना रहे हैं। ऐसे में उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करना एनडीए के लिए जोखिम भरा हो सकता था।पटना के राजनीतिक शिक्षाविदों का मानना है कि सम्राट चौधरी सरकार फिलहाल “सामाजिक प्रतिनिधित्व” और “राजनीतिक संदेश” दोनों को साथ लेकर चलना चाहती है। यही वजह है कि समिति में विभिन्न जातीय समूहों और क्षेत्रों के नेताओं को जगह दी गई है।
सत्ता के भीतर संदेश भी, भविष्य की तैयारी भी
बिहार की राजनीति में समितियों और निगमों की नियुक्तियां हमेशा सत्ता के अंदरूनी समीकरणों का संकेत मानी जाती रही हैं। चेतन आनंद को मिली नई जिम्मेदारी यह दर्शाती है कि एनडीए नेतृत्व किसी भी प्रभावशाली खेमे को असंतुष्ट छोड़ने के मूड में नहीं है।
राजनीतिक गलियारों में अब इस बात की चर्चा तेज है कि क्या यह नियुक्ति भविष्य में बड़े राजनीतिक प्रमोशन की भूमिका तैयार कर रही है, या फिर फिलहाल नाराजगी शांत करने की रणनीति भर है।
लेकिन इतना तय है कि इस फैसले ने बिहार की सत्ता राजनीति में नए संकेत जरूर दे दिए हैं।
