बी के झा
NSK


नई दिल्ली/ कोलकात्ता, 24 मई
पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां सत्ता बदलने के बाद भी असली लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर सत्ता पर काबिज हुई भारतीय जनता पार्टी अब एक नए और बेहद जटिल राजनीतिक संकट से जूझ रही है। संकट सत्ता पाने का नहीं, बल्कि सत्ता को संभालने का है। सवाल यह है कि क्या भाजपा तृणमूल कांग्रेस से टूटकर आने वाले नेताओं के लिए अपने दरवाजे खोल दे, या फिर उन कार्यकर्ताओं की भावनाओं को प्राथमिकता दे जिन्होंने वर्षों तक सड़क से लेकर बूथ तक संघर्ष किया?
बंगाल भाजपा अध्यक्ष Samik Bhattacharya का बयान इस पूरे राजनीतिक द्वंद्व का सबसे तीखा और स्पष्ट संकेत बनकर सामने आया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा—“भाजपा कोई धर्मशाला नहीं है। जिन लोगों ने भाजपा कार्यकर्ताओं पर अत्याचार किए, उनकी हत्या करवाई, उन्हें पार्टी में जगह नहीं दी जा सकती।”यह सिर्फ बयान नहीं, बल्कि बंगाल भाजपा के भीतर चल रही वैचारिक और राजनीतिक खींचतान का सार्वजनिक रूप माना जा रहा है।
सत्ता मिल गई, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू
पश्चिम बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत ने राज्य की राजनीति की दशकों पुरानी धुरी बदल दी है। Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली All India Trinamool Congress को पहली बार इतने बड़े स्तर पर सत्ता से बाहर होना पड़ा। लेकिन हार के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष, भय और राजनीतिक असुरक्षा तेजी से बढ़ती दिख रही है। दिल्ली से लेकर कोलकाता तक सियासी गलियारों में चर्चा है कि तृणमूल के कई बड़े नेता और राज्यसभा सांसद भाजपा के संपर्क में हैं।
सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के कई सांसद और विधायक भविष्य की राजनीति को देखते हुए “सुरक्षित ठिकाना” तलाश रहे हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल वैचारिक बदलाव नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक अस्तित्व बचाने की कवायद है।
भाजपा का सबसे बड़ा डर — अपने ही कार्यकर्ताओं की नाराजगी
भाजपा के सामने सबसे बड़ा संकट विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने संगठन के भीतर से पैदा हो सकता है। बंगाल में हजारों कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक हिंसा, राजनीतिक प्रताड़ना और सामाजिक बहिष्कार का सामना करते हुए पार्टी को मजबूत किया।अब यदि वही नेता, जिन पर भाजपा कार्यकर्ताओं को डराने-धमकाने के आरोप रहे हैं, सीधे भगवा खेमे में शामिल कर लिए जाते हैं, तो जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष पैदा हो सकता है।राजनीतिक विश्लेषक डॉ. सुदीप्तो सेन कहते हैं,“बंगाल भाजपा की सबसे बड़ी पूंजी उसका कैडर है। अगर पार्टी अवसरवादियों को प्राथमिकता देती है तो इससे संगठन का मनोबल टूट सकता है।
”वहीं कोलकाता विश्वविद्यालय की राजनीति विशेषज्ञ प्रोफेसर मधुमिता चक्रवर्ती मानती हैं कि भाजपा इस समय “नैतिकता बनाम राजनीतिक व्यावहारिकता” के बीच फंसी हुई है।“अगर भाजपा दलबदलुओं को रोकती है तो पंचायत और नगर निकाय चुनावों में उसे संगठनात्मक नुकसान हो सकता है। लेकिन अगर उन्हें शामिल करती है तो पार्टी की वैचारिक विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे।
”पंचायत चुनावों की मजबूरी
भले ही भाजपा सार्वजनिक रूप से सख्त रुख दिखा रही हो, लेकिन राजनीतिक रणनीतिकार मानते हैं कि अगले साल होने वाले पंचायत और नगर निकाय चुनावों में तृणमूल से टूटकर आने वाले नेताओं की उपयोगिता को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।ग्रामीण बंगाल में तृणमूल का सांगठनिक नेटवर्क बेहद मजबूत रहा है। बूथ स्तर तक फैले उसके नेता और कार्यकर्ता स्थानीय समीकरणों को गहराई से समझते हैं। ऐसे में भाजपा के भीतर एक वर्ग मानता है कि यदि बंगाल में लंबे समय तक सत्ता कायम रखनी है तो राजनीतिक विस्तार के लिए “व्यावहारिक राजनीति” जरूरी होगी।
शुभेंदु मॉडल की चर्चा
राजनीतिक गलियारों में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा Suvendu Adhikari के “मॉडल” की हो रही है। कभी तृणमूल के सबसे भरोसेमंद नेताओं में शामिल रहे शुभेंदु अधिकारी ने भाजपा में शामिल होकर न केवल ममता बनर्जी को भवानीपुर जैसी सुरक्षित सीट पर हराया, बल्कि बंगाल में भाजपा के उभार का सबसे बड़ा चेहरा बन गए।उनकी आक्रामक हिंदुत्व राजनीति, घुसपैठ विरोधी अभियान और संगठनात्मक रणनीति ने भाजपा को बंगाल की सत्ता तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई। अब भाजपा के भीतर एक वर्ग यह तर्क दे रहा है कि अगर शुभेंदु जैसे नेताओं को अवसर दिया जा सकता है, तो अन्य नेताओं को क्यों नहीं?
तृणमूल में डर, असंतोष और बिखराव
चुनावी हार के बाद Mamata Banerjee की पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। कई वरिष्ठ नेता हालिया बैठकों से दूरी बना चुके हैं। पार्टी के भीतर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का डर भी बड़ा कारण माना जा रहा है।राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि कई नेताओं को आशंका है कि सत्ता से बाहर होने के बाद अब भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामलों में जांच तेज हो सकती है। यही वजह है कि कुछ नेता भाजपा की ओर “राजनीतिक सुरक्षा कवच” के तौर पर देख रहे हैं।
हालांकि ममता बनर्जी ने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की कोशिश करते हुए कहा है कि वह पार्टी का पुनर्निर्माण करेंगी और जरूरत पड़ी तो खुद पार्टी दफ्तरों की पुताई तक करेंगी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि तृणमूल इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजरती दिख रही है।
दूसरी तरफ भाजपा में संगठन विस्तार की हलचल
इधर बंगाल में राजनीतिक हलचल है, तो उधर भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी संगठन को नए सिरे से मजबूत करने में जुटा है।
भाजपा अध्यक्ष Nitin Nabin की नई टीम को लेकर दिल्ली में लगातार बैठकों का दौर जारी है।उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों की नई टीमों और प्रदेश अध्यक्षों को लेकर मंथन तेज हो गया है। पार्टी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी अभी से शुरू करना चाहती है।सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा नेतृत्व के बीच संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर लगातार समन्वय चल रहा है। उत्तर प्रदेश भाजपा की नई टीम का खाका लगभग तैयार माना जा रहा है और जल्द इसकी औपचारिक घोषणा हो सकती है।
“सत्ता नहीं, राष्ट्र सेवा हमारी राजनीति
”अपने जन्मदिन पर पटना में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में Nitin Nabin ने भाजपा की वैचारिक दिशा को रेखांकित करते हुए कहा कि पार्टी की राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति तक सीमित नहीं है।उन्होंने कहा,“भाजपा की यात्रा राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक चेतना, सेवा और संघर्ष की यात्रा है। हमारा लक्ष्य केवल सत्ता नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाना है।
”बंगाल की राजनीति का अगला अध्याय
फिलहाल भाजपा “वेट एंड वॉच” की रणनीति पर आगे बढ़ती दिख रही है। पार्टी जानती है कि बंगाल में उसकी सबसे बड़ी ताकत वैचारिक कार्यकर्ता हैं, लेकिन यह भी सच है कि लंबे समय तक सत्ता बनाए रखने के लिए उसे राजनीतिक विस्तार की जरूरत होगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या भाजपा अपने सिद्धांतों को प्राथमिकता देगी या चुनावी मजबूरियों के आगे व्यावहारिक राजनीति को अपनाएगी?
क्योंकि बंगाल की राजनीति में इस समय केवल दल नहीं बदल रहे, बल्कि पूरे राजनीतिक चरित्र का पुनर्लेखन होता दिखाई दे रहा है।
