मोदी-ट्रंप के रिश्तों की नई पटकथा: क्या दुनिया की बदलती राजनीति में बन रहा है नया रणनीतिक ध्रुव?

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/ कोलकाता , 24 मई

भारत और अमेरिका के रिश्तों में एक बार फिर नई गर्माहट दिखाई दे रही है। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio का दिल्ली दौरा केवल एक औपचारिक कूटनीतिक यात्रा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे वैश्विक शक्ति संतुलन के बदलते समीकरणों के बीच उभरती नई रणनीतिक साझेदारी का संकेत माना जा रहा है।दिल्ली में अमेरिकी दूतावास की सपोर्ट एनैक्स बिल्डिंग के उद्घाटन के दौरान रूबियो ने जिस तरह प्रधानमंत्री Narendra Modi और अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के रिश्तों की खुलकर प्रशंसा की, उसने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। रूबियो ने कहा कि मोदी और ट्रंप “सिर्फ आज नहीं, बल्कि आने वाले कई वर्षों को ध्यान में रखकर फैसले लेने वाले नेता हैं।”

यह बयान ऐसे समय आया है जब एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बदला वैश्विक आर्थिक ढांचा और इंडो-पैसिफिक रणनीति दुनिया की बड़ी ताकतों को नए गठजोड़ की ओर धकेल रही है।

केवल दोस्ती नहीं, रणनीतिक मजबूरी भी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत-अमेरिका संबंध अब “भावनात्मक कूटनीति” के दायरे से निकलकर ठोस रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं। विदेश मामलों के जानकारों के अनुसार अमेरिका अब भारत को केवल दक्षिण एशिया की शक्ति नहीं, बल्कि चीन के प्रभाव को संतुलित करने वाले वैश्विक साझेदार के रूप में देख रहा है।दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय राजनीति के शिक्षाविदों का कहना है कि ट्रंप और मोदी की व्यक्तिगत केमिस्ट्री ने दोनों देशों के रिश्तों को राजनीतिक गति दी है।

“Howdy Modi” और “Namaste Trump” जैसे आयोजनों ने दोनों नेताओं की व्यक्तिगत समझ को जन-राजनीतिक संदेश में बदला था। अब रूबियो का बयान इस रिश्ते की निरंतरता का संकेत माना जा रहा है।

रक्षा क्षेत्र में गहराता भरोसा

रक्षा विशेषज्ञों ने रूबियो की यात्रा को बेहद महत्वपूर्ण बताया है। उनका मानना है कि आने वाले महीनों में रक्षा तकनीक, साइबर सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, ड्रोन टेक्नोलॉजी और खुफिया साझेदारी को लेकर बड़े समझौते हो सकते हैं।पूर्व सैन्य अधिकारियों का कहना है कि अमेरिका अब भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में “सुरक्षा साझेदार” के रूप में स्थापित करना चाहता है। क्वाड समूह में भारत की सक्रिय भूमिका और हिंद महासागर में बढ़ती सामरिक गतिविधियों ने वॉशिंगटन की नजर में नई दिल्ली की अहमियत बढ़ा दी है।

रक्षा मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार यदि दोनों देशों के बीच उन्नत रक्षा तकनीक साझा करने की प्रक्रिया तेज होती है, तो यह चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए रणनीतिक संदेश होगा।

विपक्ष ने उठाए सवाल

हालांकि विपक्षी दलों ने इस बढ़ती नजदीकी को लेकर कई सवाल भी खड़े किए हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भारत को अपनी विदेश नीति में “रणनीतिक स्वायत्तता” बनाए रखनी चाहिए और किसी एक वैश्विक ध्रुव के अधिक करीब जाने से बचना चाहिए।वाम दलों ने आरोप लगाया कि अमेरिका के साथ अत्यधिक सामरिक निकटता भारत की पारंपरिक गुटनिरपेक्ष छवि को कमजोर कर सकती है। कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी पूछा कि क्या भारत-अमेरिका संबंधों की यह मजबूती रूस के साथ पुराने रक्षा संबंधों को प्रभावित करेगी।

राजद और समाजवादी धड़े के नेताओं ने घरेलू राजनीति का मुद्दा उठाते हुए कहा कि विदेश नीति की उपलब्धियों का इस्तेमाल अक्सर चुनावी माहौल बनाने के लिए किया जाता है। हालांकि सत्ता पक्ष का तर्क है कि मजबूत वैश्विक संबंध सीधे भारत की अर्थव्यवस्था, निवेश और सुरक्षा हितों को फायदा पहुंचाते हैं।

बंगाल से दिल्ली तक कूटनीतिक संदेश

रूबियो का कोलकाता दौरा भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका अब भारत के पूर्वी और समुद्री क्षेत्रों में आर्थिक और रणनीतिक संभावनाओं को लेकर ज्यादा सक्रिय दिख रहा है। बंगाल की खाड़ी और पूर्वोत्तर क्षेत्र भविष्य की इंडो-पैसिफिक रणनीति में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

आने वाले महीनों में बड़े ऐलान संभव

रूबियो ने संकेत दिया है कि आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच “नई और रोचक घोषणाएं” हो सकती हैं। कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि इसमें व्यापार, रक्षा उत्पादन, तकनीकी निवेश, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऊर्जा सहयोग जैसे क्षेत्रों में बड़े फैसले शामिल हो सकते हैं।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मोदी-ट्रंप समीकरण केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत मित्रता तक सीमित नहीं रह गया है। यह अब बदलती वैश्विक राजनीति में एक ऐसे रणनीतिक गठजोड़ का रूप लेता दिख रहा है, जो आने वाले वर्षों में एशिया और दुनिया की शक्ति संरचना को प्रभावित कर सकता है।

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