बी के झा
NSK News

नई दिल्ली, 30 जुलाई
राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के अपमान को दंडनीय अपराध बनाने वाले राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 के लोकसभा से पारित होते ही देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। एआईएमआईएम प्रमुख एवं हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने विधेयक का खुलकर विरोध करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान के कुछ प्रावधानों के विपरीत बताया। उनके बयान के बाद राजनीतिक दलों, संवैधानिक विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, कानूनविदों और विभिन्न सामाजिक संगठनों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
ओवैसी ने क्यों जताया विरोध?
लोकसभा में विधेयक पारित होने के बाद समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि ‘जन गण मन’ देश और उसके नागरिकों की भावना का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ के कुछ अंश देवी-देवताओं की आराधना से जुड़े हैं। उनका कहना था कि एक मुस्लिम होने के नाते वह केवल अल्लाह की इबादत करते हैं और किसी अन्य की उपासना नहीं कर सकते।ओवैसी ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार इस विधेयक के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों का अतिक्रमण कर रही है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद पर टिप्पणी से बढ़ा विवाद
ओवैसी ने देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के 1950 के निर्णय पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उनके अनुसार राष्ट्रीय गीत के संबंध में औपचारिक संसदीय प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक विवाद और तेज हो गया। कई नेताओं ने इसे स्वतंत्र भारत के संवैधानिक इतिहास और राष्ट्रनिर्माताओं के प्रति अनुचित टिप्पणी बताया।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि यह विधेयक किसी धर्म विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के उद्देश्य से लाया गया है।सत्तापक्ष के नेताओं के अनुसार,”राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत किसी दल या विचारधारा के नहीं, बल्कि पूरे भारत की सामूहिक राष्ट्रीय पहचान के प्रतीक हैं। उनका सम्मान प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक और नैतिक दायित्व है।”सरकार का यह भी कहना है कि विधेयक का उद्देश्य किसी नागरिक की धार्मिक मान्यता में हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों के जानबूझकर अपमान को रोकना है।
विपक्ष की मिली-जुली प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया एक समान नहीं रही।कुछ विपक्षी नेताओं ने कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान आवश्यक है, लेकिन ऐसे कानून बनाते समय यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संतुलन बना रहे।
दूसरी ओर कुछ विपक्षी दलों ने ओवैसी के बयान से दूरी बनाते हुए कहा कि राष्ट्रीय सम्मान के विषय को धार्मिक विवाद का रूप देना उचित नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में केवल कानूनी बहस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय पहचान, सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर व्यापक राजनीतिक विमर्श का विषय बनेगा।विश्लेषकों के अनुसार,”सरकार इस विधेयक को राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सम्मान के मुद्दे के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि ओवैसी इसे धार्मिक स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से देख रहे हैं। यही वैचारिक टकराव इस विवाद का मूल कारण है।”एक अन्य विश्लेषक का कहना है कि ऐसे विषयों पर संवाद और संवैधानिक मर्यादा दोनों आवश्यक हैं ताकि समाज में अनावश्यक ध्रुवीकरण न बढ़े।
संवैधानिक विशेषज्ञों की टिप्पणी
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और अन्य संवैधानिक प्रावधानों के अधीन है।विशेषज्ञों के अनुसार,”यदि किसी कानून को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी जाती है, तो उसका अंतिम परीक्षण न्यायपालिका करेगी। लोकतंत्र में संविधान की व्याख्या का अंतिम अधिकार न्यायालय के पास है।”
कानूनविदों की राय
वरिष्ठ कानूनविदों का कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान सुनिश्चित करना राज्य का वैध उद्देश्य हो सकता है, किंतु किसी भी दंडात्मक प्रावधान की संवैधानिक वैधता का परीक्षण न्यायिक कसौटी पर होगा।उनका कहना है कि विधेयक के लागू होने के बाद यदि किसी नागरिक को अपने मौलिक अधिकारों के हनन का अनुभव होता है, तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
शिक्षाविदों का दृष्टिकोण
शिक्षाविदों का मानना है कि राष्ट्रभक्ति और धार्मिक आस्था को परस्पर टकराव के बजाय संवैधानिक मूल्यों के आलोक में समझने की आवश्यकता है।उनके अनुसार,”भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी विविधता में निहित है। राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता—दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना ही संविधान की मूल भावना है।
“समाजसेवी संस्थाओं की प्रतिक्रिया
विभिन्न समाजसेवी संगठनों ने ओवैसी के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की।कुछ संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने कहा,”लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी विधेयक का विरोध करना प्रत्येक जनप्रतिनिधि का अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों और स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तित्वों के संबंध में सार्वजनिक टिप्पणी करते समय भाषा और मर्यादा का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
“कुछ संगठनों ने यह भी कहा कि भारत का संविधान सभी धर्मों के नागरिकों को समान अधिकार देता है और इसी संविधान के प्रति निष्ठा प्रत्येक निर्वाचित जनप्रतिनिधि का दायित्व है।हालांकि कुछ नागरिक अधिकार समूहों ने यह भी कहा कि किसी भी विवाद का समाधान संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से।
आगे क्या?
अब यह विधेयक संसद की आगे की विधायी प्रक्रिया और आवश्यक संवैधानिक औपचारिकताओं के बाद लागू होने की दिशा में बढ़ेगा। दूसरी ओर, इस पर राजनीतिक और कानूनी बहस जारी रहने के संकेत हैं।
स्पष्ट है कि वंदे मातरम् पर छिड़ी यह बहस केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं है। यह राष्ट्रीय सम्मान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक आस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन पर देशव्यापी विमर्श का विषय बन चुकी है।
आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर संसद से लेकर न्यायालय और जनमंच तक बहस और तेज होने की संभावना है।
