बी के झा
NSK


नई दिल्ली / चेन्नई”, 8 मई
तमिलनाडु की राजनीति में इस समय जो उबाल दिखाई दे रहा है, वह केवल सत्ता संघर्ष नहीं बल्कि द्रविड़ राजनीति के छह दशक पुराने ढांचे को चुनौती देने वाली एक ऐतिहासिक करवट मानी जा रही है। अभिनेता से नेता बने Vijay की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) ने 108 सीटें जीतकर राज्य की राजनीति में ऐसा भूचाल ला दिया है, जिसने द्रमुक और अन्नाद्रमुक जैसे पारंपरिक दिग्गजों की नींव तक हिला दी है। अब TVK का यह कहना कि यदि DMK या AIADMK सरकार बनाने की कोशिश करती है तो उसके सभी विधायक इस्तीफा दे देंगे, केवल राजनीतिक चेतावनी नहीं बल्कि जनादेश की नैतिक व्याख्या का आक्रामक दावा भी है।
राजनीतिक गलियारों में इसे “तमिलनाडु मॉडल की नई पीढ़ी बनाम पुरानी द्रविड़ व्यवस्था” की लड़ाई कहा जा रहा है। राज्य में पहली बार ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जनता ने करिश्माई व्यक्तित्व, युवा ऊर्जा और भ्रष्टाचार-विरोधी भावनाओं को पारंपरिक जातीय-संगठनात्मक राजनीति पर प्राथमिकता दी है।जनादेश की व्याख्या पर टकराव234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है। TVK के पास 108 सीटें हैं और कांग्रेस के समर्थन के बाद यह संख्या 113 तक पहुंच चुकी है।
दूसरी ओर, DMK और AIADMK दोनों स्पष्ट बहुमत से दूर हैं। ऐसे में सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि संवैधानिक परंपरा के अनुसार सबसे पहले किसे सरकार बनाने का अवसर मिलना चाहिए।राजनीतिक विश्लेषक प्रो. आर. शिवसुंदरम कहते हैं—“त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में संवैधानिक नैतिकता कहती है कि सबसे बड़े दल को पहले आमंत्रित किया जाए। यदि वह बहुमत साबित नहीं कर पाता, तब अन्य विकल्प देखे जाएं।
राज्यपाल की देरी ने राजनीतिक संदेह को जन्म दिया है।”वहीं संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ अधिवक्ता कार्तिकेय अय्यर का मानना है—“राज्यपाल का दायित्व केवल संख्या नहीं बल्कि स्थिरता भी देखना होता है। यदि किसी दल के पास स्पष्ट समर्थन पत्र नहीं हैं तो राज्यपाल का सतर्क रहना असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।”
विजय की राजनीति: भावनात्मक लहर या स्थायी विकल्प?
Vijay ने चुनाव प्रचार के दौरान खुद को “नई पीढ़ी की आवाज” के रूप में पेश किया था। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भाषा अस्मिता और युवाओं की राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों को उन्होंने जिस आक्रामक अंदाज में उठाया, उससे शहरी और प्रथम बार मतदान करने वाले मतदाताओं में जबरदस्त आकर्षण पैदा हुआ।
चेन्नई के समाजसेवी एस. मणिकंदन कहते हैं—“
तमिलनाडु की जनता अब वही चेहरे देखकर थक चुकी थी। विजय ने लोगों को उम्मीद दी कि राजनीति केवल परिवारवाद और गठबंधन गणित का खेल नहीं है।”हालांकि आलोचक इसे “भावनात्मक उभार” भी बता रहे हैं। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक लक्ष्मण सुब्रमण्यम का कहना है—“लोकप्रिय अभिनेता होना और स्थायी शासन चलाना दो अलग बातें हैं।
TVK को अब सड़क की राजनीति से निकलकर प्रशासनिक गंभीरता साबित करनी होगी।”कांग्रेस का दांव और INDIA गठबंधन पर असर तमिलनाडु की राजनीति में सबसे बड़ा झटका कांग्रेस के फैसले ने दिया है। वर्षों से DMK की सहयोगी रही कांग्रेस ने TVK का समर्थन कर पूरे राजनीतिक समीकरण को उलट दिया। इससे DMK बेहद आक्रामक हो गई है और उसने इसे “पीठ में छुरा घोंपना” करार दिया है।M. K. Stalin के करीबी नेताओं का मानना है कि कांग्रेस ने सत्ता साझेदारी के लालच में वैचारिक प्रतिबद्धता छोड़ दी।
राजनीति विज्ञान के शिक्षाविद प्रो. रमेश्वरन कहते हैं—“यदि यह गठबंधन स्थायी रूप लेता है तो दक्षिण भारत में INDIA गठबंधन की संरचना बिखर सकती है। कांग्रेस ने यहां व्यावहारिक राजनीति को वैचारिक राजनीति पर तरजीह दी है।
”दूसरी ओर कांग्रेस का तर्क है कि सबसे बड़ी धर्मनिरपेक्ष पार्टी को समर्थन देना लोकतांत्रिक आवश्यकता है। पार्टी नेताओं का कहना है कि भाजपा समर्थित राजनीतिक ध्रुवीकरण को रोकने के लिए यह फैसला लिया गया।
वाम दलों की भूमिका बनी निर्णायक
Communist Party of India (Marxist) और Communist Party of India अब “किंगमेकर” की भूमिका में दिखाई दे रहे हैं। माकपा महासचिव M. A. Baby द्वारा विजय को सरकार बनाने का पहला अवसर देने की वकालत ने संकेत दे दिया है कि वाम दल द्रविड़ राजनीति में नए समीकरण तलाश रहे हैं।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि वाम दल, वीसीके और IUML TVK के साथ आते हैं तो बहुमत का आंकड़ा आसानी से पार हो जाएगा।
राज्यपाल की भूमिका पर उठते सवाल
Rajendra Arlekar पर विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद TVK को आमंत्रित न करना लोकतांत्रिक भावना के विपरीत है।संवैधानिक विशेषज्ञों का एक वर्ग 1996 का उदाहरण दे रहा है, जब Atal Bihari Vajpayee को सबसे बड़े दल का नेता होने के नाते सरकार बनाने का अवसर दिया गया था, भले ही उनकी सरकार बहुमत साबित नहीं कर सकी।
हालांकि भाजपा इस पूरे विवाद में राज्यपाल के बचाव में उतर आई है। भाजपा प्रवक्ता नारायणन तिरुपति का कहना है कि “राज्यपाल संविधान के अनुसार ही कदम उठा रहे हैं और किसी तरह की जल्दबाजी लोकतांत्रिक संकट पैदा कर सकती है।”
जनता क्या सोच रही है?
चेन्नई, मदुरै और कोयंबटूर जैसे शहरों में TVK समर्थकों का उत्साह चरम पर है। युवाओं का बड़ा वर्ग इसे “राजनीतिक क्रांति” बता रहा है।मदुरै के कॉलेज छात्र अरविंदन कहते हैं—“हमने बदलाव के लिए वोट दिया है। अगर सबसे बड़ी पार्टी को मौका ही नहीं मिलेगा तो जनता का भरोसा टूट जाएगा।
”वहीं वरिष्ठ मतदाता आर. जयलक्ष्मी का मत अलग है—
“स्थिर सरकार जरूरी है। केवल लोकप्रियता से शासन नहीं चलता। अगर संख्या नहीं है तो गठबंधन राजनीति स्वीकार करनी चाहिए।
”आगे क्या?
तमिलनाडु अब निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यदि TVK बहुमत जुटा लेती है तो यह राज्य की राजनीति में 1967 के बाद सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन होगा। लेकिन यदि राज्यपाल किसी अन्य गठबंधन को मौका देते हैं या राष्ट्रपति शासन जैसी स्थिति बनती है, तो राजनीतिक टकराव और सड़क पर संघर्ष दोनों तेज हो सकते हैं।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि तमिलनाडु की राजनीति अब केवल करुणानिधि-जयललिता युग की छाया में नहीं चल रही। एक नई पीढ़ी सत्ता के दरवाजे पर दस्तक दे रही है और यह संघर्ष केवल सरकार गठन का नहीं बल्कि तमिलनाडु की राजनीतिक आत्मा को पुनर्परिभाषित करने का युद्ध बन चुका है।
