बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 11 नवंबर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता को सार्वजनिक करने को लेकर छिड़ा विवाद एक बार फिर अदालत की चौखट पर पहुंच गया है। इस बार मामला उच्च न्यायालय की खंडपीठ तक पहुंच चुका है, जहां आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह, आरटीआई एक्टिविस्ट नीरज शर्मा और अधिवक्ता मोहम्मद इरशाद ने नई अपील दायर की है।
उन्होंने एकल न्यायाधीश के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें पीएम मोदी की डिग्री और शैक्षणिक रिकॉर्ड के खुलासे पर रोक लगा दी गई थी।पृष्ठभूमि: CIC का आदेश, फिर हाई कोर्ट की रोकयह विवाद तब शुरू हुआ था जब वर्ष 2016 में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने दिल्ली विश्वविद्यालय को निर्देश दिया था कि वह वर्ष 1978 बैच के रिकॉर्ड सार्वजनिक करे। याचिकाकर्ता का दावा है कि इसी वर्ष प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बीए की पढ़ाई पूरी की थी, इसलिए उनकी डिग्री की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
हालांकि, बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगाते हुए कहा कि“शैक्षणिक विवरण—जैसे अंकपत्र और डिग्री—RTI एक्ट की धारा 8(1)(J) के तहत व्यक्तिगत जानकारी है और बिना व्यापक जनहित के इसे उजागर नहीं किया जा सकता।”विश्वविद्यालय–विद्यार्थी संबंध पर अदालत की कड़ी टिप्पणीएकल न्यायाधीश जस्टिस सचिन दत्ता ने 25 अगस्त 2024 को CIC के आदेश को रद्द करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी:“
विश्वविद्यालय और छात्र के बीच का संबंध प्रत्ययी (fiduciary) होता है, जो पूरी तरह विश्वास और गोपनीयता पर आधारित है।”“तीसरे पक्ष को किसी छात्र की डिग्री या अंक जारी करना इस भरोसे का उल्लंघन होगा।”अदालत ने यह भी कहा था कि सिर्फ इसलिए कि कोई जानकारी “जनता के लिए रुचिकर” है, इसका मतलब यह नहीं कि वह “सार्वजनिक हित” में भी है। सार्वजनिक जिज्ञासा के नाम पर व्यक्तिगत गोपनीयता को खत्म नहीं किया जा सकता।सुनवाई अब खंडपीठ करेगी मुख्य
न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की खंडपीठ अब इस अपील की सुनवाई करेगी। नई अपील में याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि प्रधानमंत्री जैसे सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता का खुलासा “जनहित” के दायरे में आता है और इसे छिपाना गलत है।
सरकार और विश्वविद्यालय का पक्ष दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया था कि—इस तरह की जानकारी देने से राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित RTI आवेदनों की बाढ़ आ जाएगी।आरटीआई कानून का उद्देश्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को हवा देना नहीं है।विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड जरूरत पड़ने पर अदालत के समक्ष रखे जा सकते हैं, पर इन्हें सार्वजनिक करना संस्थागत विश्वास को नुकसान पहुंचाएगा।डिग्री विवाद क्यों बनता है सुर्खी?2016 में दर्ज RTI के बाद से यह मामला लगातार राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है।
विपक्ष अक्सर प्रधानमंत्री की डिग्री की पारदर्शिता को मुद्दा बनाता है, जबकि सरकार का रुख है कि यह व्यक्तिगत जानकारी है, जिसे उजागर करने का अधिकार किसी तीसरे पक्ष को नहीं दिया जा सकता।अगला कदम—अदालत करेगी तयअब खंडपीठ के सामने बड़ा सवाल है:
क्या प्रधानमंत्री जैसे उच्च पद पर बैठे व्यक्ति की शैक्षणिक डिग्री “जनहित” का विषय है?
या फिर यह पूरी तरह “व्यक्तिगत जानकारी” है, जिसे गोपनीय रखा जाना चाहिए?
दोनों पक्षों की दलीलें देखते हुए यह मामला एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बनने जा रहा है। फैसले का असर न सिर्फ प्रधानमंत्री की डिग्री विवाद पर पड़ेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि भविष्य में सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की शैक्षणिक जानकारी किस हद तक सार्वजनिक हो सकती है।
