बी के झा
पटना/किशनगंज/अररिया, 14 नवंबर
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM अब सिर्फ “गेस्ट अपीयरेंस वाली पार्टी” नहीं रही, बल्कि सीमांचल की राजनीति में वह एक स्थायी फैक्टर बन चुकी है। इस चुनाव में AIMIM ने 25 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 24 सीटें मुस्लिम बहुल सीमांचल की थीं।
अंतिम नतीजों में पार्टी ने 5 सीटों पर निर्णायक जीत दर्ज की—
ठीक वही संख्या, जो AIMIM ने 2020 में हासिल की थी।2020 का रिपोर्ट कार्ड 2025 में हू-ब-हू दोहराया2020 में AIMIM ने जोकीहाट, बहादुरगंज, ठाकुरगंज, कोचाधामन और किशनगंज सीटें जीती थीं। इस बार भी पार्टी ने जोकीहाट, बहादुरगंज, कोचाधामन, अमौर और बायसी सीट पर विजय हासिल कर अपनी पकड़ बरकरार रखी।अहम बात यह है कि 2020 में AIMIM की जीत के बाद चार विधायक RJD में शामिल हो गए थे, लेकिन 2025 में ओवैसी ने ऐसी टूट-फूट रोकने के लिए पहले ही संगठन को मजबूत कर लिया था।
परिणाम—1.88% वोट शेयर के बावजूद AIMIM का प्रभाव पहले से अधिक ठोस हुआ है।AIMIM: सीमांचल की नई राजनीतिक धुरी?सीमांचल की 24 सीटों पर मुस्लिम आबादी 40% से 70% के बीच है। ओवैसी ने इस चुनाव से पहले तेज़, आक्रामक और मुद्दा-प्रधान रैलियाँ कीं, जिसमें उन्होंने मुस्लिम सुरक्षा,विकास,सामाजिक न्याय,और हाशिये पर पड़े इलाकों की राजनीतिको केंद्र में रखा।
परिणामस्वरूप, मुस्लिम वोट इस बार पहले की तरह महागठबंधन के पक्ष में एकमुश्त नहीं गया। AIMIM ने मुस्लिम वोटों के बंटवारे में निर्णायक भूमिका निभाई,
जिसका सीधा नुकसान RJD–कांग्रेस को हुआ।कांग्रेस की स्थिति तो AIMIM से भी खराब रही—यह बात सीमांचल की राजनीति के लिए एक बड़ा संकेत है।जीतने वाले AIMIM उम्मीदवार विधानसभा सीट जिला विजेताजोकीहाट अररिया मोहम्मद मुर्शिद आलमबहादुरगंज किशनगंज मोहम्मद तौसीफ आलमकोचाधामन किशनगंज मोहम्मद सरवर आलमअमौर पूर्णिया अख्तरुल इमानबायसी पूर्णिया गुलाम सरवर
विश्लेषण: ‘
मुस्लिम वोट बैंक’ की राजनीति में बड़ा बदलाव
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने कहा:“भारतीय राजनीति में आज तक धर्म आधारित वोटिंग कभी पूरी तरह एकतरफा नहीं हुई थी। लेकिन बिहार के सीमांचल में इस बार का पैटर्न नया और गहरा संकेत देता है।”यह संकेत क्या है?
1. मुस्लिम मतदाता अब महागठबंधन,सेक्युलर पार्टियोंया ‘बीजेपी के डर’की पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़कर अपना राजनीतिक प्रतिनिधि स्वयं चुनना चाहता है।
2. AIMIM को लगातार दो चुनावों में मिली सफलता बताती है कि सीमांचल का मुसलमान
स्थानीय मुद्दों,अपने क्षेत्रीय नेतृत्वऔर स्पष्ट आवाज़को अधिक महत्व दे रहा है।
3. राजनीतिक जानकारों के अनुसार:“यह स्थिति आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति तक असर डाल सकती है।”क्या ओवैसी बन रहे हैं ‘दूसरे कायद-ए-आज़म’?कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सीमांचल में AIMIM को मिला एकतरफा मुस्लिम समर्थन यह संदेश देता है किक्या मुसलमान ओवैसी को अपना आधुनिक ‘कायद-ए-आज़म’, यानी क़ौम का मार्गदर्शक मानने लगे हैं?
हालांकि यह तुलना विवादास्पद और अतिशयोक्तिपूर्ण है, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता किओवैसी की भाषा,उनका संघर्ष,और मुसलमानों के मुद्दों पर उनकी आक्रामकताने उन्हें मुस्लिम समाज में एक प्रखर नेता के रूप में स्थापित कर दिया है।महागठबंधन के लिए चेतावनी की घंटीAIMIM की पांच सीटें जीतना संख्या के लिहाज़ से भले छोटा लगे, लेकिन इन पाँच सीटों ने सीमांचल की पूरी राजनीतिक दिशा बदल दी है।
RJD–कांग्रेस के नेताओं को यह समझना होगा कि मुस्लिम मतदाता अबभावनात्मक भाषण,पुरानी सेक्युलर अपीलसे संतुष्ट नहीं होने वाला।उसे अब वास्तविक प्रतिनिधित्व, जमीन से जुड़े मुद्दे और ईमानदार नेतृत्व चाहिए।
निष्कर्ष
ओवैसी की AIMIM ने 2025 में सिर्फ 5 सीटें नहीं जीतीं—बल्कि बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय लिखा है।सीमांचल का यह ‘मुस्लिम शिफ्ट’ आने वाले चुनावों में महागठबंधन,NDA,और अन्य पार्टियों की रणनीति को पूरी तरह बदल सकता है।2025 के नतीजों ने साफ़ संदेश दे दिया है:सीमांचल में अब पुराना समीकरण नहीं चलेगा — यहाँ ओवैसी की राजनीति एक स्थायी शक्ति बनने की राह पर है।
NSK

