बी के झा
नई दिल्ली, 16 नवंबर
जब देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़े होकर किसी विषय पर बात करते हैं, तो वह वक्तव्य केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जाना-पहचाना सत्य का साहसिक उद्घोष बन जाता है।
बुधवार को 30वें जस्टिस सुनंदा भंडारे स्मृति व्याख्यान के दौरान CJI जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की जगह कार्यवाहक रूप में न्यायाधीश के रूप में नेतृत्व संभाले CJI बी.आर. गवई ने ठीक ऐसा ही किया।उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा—
“लैंगिक समानता की यात्रा अभी पूरी नहीं हुई। और यह यात्रा केवल महिलाओं के कंधों पर नहीं डाली जा सकती।”“सिर्फ महिलाओं का दायित्व नहीं—
पुरुषों को भी देनी होगी बराबरी की हिस्सेदारी”अपने भाषण में CJI गवई ने लैंगिक न्याय को अरसे से चल रही सामाजिक मुहिम का केंद्र बताते हुए कहा कि वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है,जब पुरुष सत्ता, अवसर और संसाधनों को साझा करने का साहस दिखाएँ।उन्होंने कहा—
“सत्ता साझा करना कोई नुकसान नहीं, बल्कि समाज की मुक्ति का मार्ग है। समतामूलक भारत टकराव से नहीं, बल्कि सहयोग से बनेगा।”उनका यह संदेश उन संस्थाओं—न्यायपालिका, नौकरशाही, राजनीतिक तंत्र और कार्यस्थलों—सभी तक जाता है, जहाँ निर्णय से लेकर नेतृत्व तक, पुरुषों की हिस्सेदारी पारंपरिक रूप से अधिक रही है।तीन चरणों में समझाई
75 वर्षों की यात्रा बार एंड बेंच के अनुसार CJI गवई ने लैंगिक समानता की प्रगति को तीन ऐतिहासिक पड़ावों में बाँटकर समझाया—
1. संविधान लागू होने के शुरुआती 25 वर्ष (1950–1975)इस दौर में संघर्ष “औपचारिक समान अधिकारों” को स्थापित करने तक सीमित था।
2. 1975–2000: व्यापक विमर्श का दौरयह वह समय था जब बातचीत केवल कानून तक सीमित न रही।महिलाओं की गरिमा,उनके जीवन के अनुभव,शरीर और स्वायत्ततापहली बार विमर्श के केंद्र में आए।
3. 2000 से आज तक: न्याय का अंतर्संबंधीय युगआज बहस सिर्फ महिला–पुरुष बराबरी की नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और जातीय स्तरों पर लैंगिक न्याय की वास्तविक स्थिति की हो रही है।
CJI ने कहा—“नागरिक समाज की सजगता और महिला आंदोलनों की दृढ़ता ही वे कारण हैं, जिन्होंने न्यायपालिका को समय-समय पर संविधान के वादे के प्रति जवाबदेह बनाए रखा है।”
“मानव गरिमा की संरक्षक रहीं अदालतें”CJI गवई ने स्वीकार किया कि न्यायपालिका ने कई ऐतिहासिक फैसलों में महिलाओं की गरिमा और पहचान को प्राथमिकता दी है।लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास चुनौतियों से मुक्त नहीं रहा—
कई बार न्यायिक व्याख्याएँ महिलाओं के वास्तविक अनुभवों को पर्याप्त रूप से समझ नहीं पाईं।फिर भी,नागरिक समाज,महिला संगठनऔर आम नागरिकों की आवाज़ने मिलकर न्याय व्यवस्था को संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप रहने का मार्ग दिखाया।“संवाद—
भारत की लोकतांत्रिक ताक़त”CJI गवई ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की—“
अदालतों और जनता के बीच संवाद, भारत की लोकतांत्रिक शक्ति के सबसे बड़े स्रोतों में से एक है।”उन्होंने कहा, लैंगिक समानता कोई मंज़िल नहीं, बल्कि ऐसी प्रतिबद्धता है जिसे समाज को लगातार नवीनीकृत करते रहना होगा।23 नवंबर को होंगे रिटायर—
एक अधूरी यात्रा की यादरिटायरमेंट से ठीक कुछ दिन पहले दिया गया यह भाषण केवल कानूनी व्याख्यान नहीं, बल्किएक अनुभवी न्यायाधीश की गहरी सामाजिक चेतना और संवेदनशील चिंतन का दस्तावेज़ बनकर सामने आया है।अंत में उन्होंने कहा—
“हम प्रगति कर चुके हैं, लेकिन यात्रा अभी भी अधूरी है।”यह भाषण क्यों महत्वपूर्ण?क्योंकि यह देश के शीर्ष न्यायाधीश की विदाई से ठीक पहले सामाजिक न्याय पर दिया गया अंतिम संदेश है।
क्योंकि इसमें लैंगिक समानता को सिर्फ महिलाओं का विषय नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझी जिम्मेदारी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।और इसलिए भी क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि सत्ता का पुनर्वितरण संघर्ष नहीं—उद्धार का मार्ग है।
NSK

