600 परिवारों पर बेदखली का साया: हाईकोर्ट से लताड़ के बाद वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, मुनंबम भूमि विवाद पर कानूनी संग्राम तेज, जांच आयोग की वैधता पर सवाल

बी के झा

नई दिल्ली, 19 नवंबर

केरल के बहुचर्चित मुनंबम भूमि विवाद ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी हलचल मचा दी है। विवादित 135 एकड़ जमीन को लेकर उठे वक्फ दावे पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद अब मामला सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े तक जा पहुंचा है। केरल वक्फ संरक्षण वेधि ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाख़िल की है।

मामले में फैसले का असर सीधे तौर पर उन 600 परिवारों पर पड़ेगा, जिनकी जमीन पर वक्फ बोर्ड 2019 से दावा कर रहा है—और जिन्हें बेदखली की तलवार का सामना करना पड़ रहा है।

हाईकोर्ट ने क्यों लगाई थी लताड़?10 अक्टूबर 2024 को केरल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने वक्फ बोर्ड को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि:वक्फ बोर्ड का 2019 में भूमि को वक्फ घोषित करना कानूनन गलत था1950 में जमीन का हस्तांतरण वक्फ नहीं बल्कि एक गिफ्ट डीड थापूरी प्रक्रिया “भूमि हथियाने की साजिश” प्रतीत होती है

जमीन को वक्फ घोषित करने में कानून के अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया गया हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि यह भूमि दशकों से स्थानीय निवासियों के कब्जे में है, जिनमें से अधिकतर ने कॉलेज से विधिवत रजिस्टर्ड बिक्री दस्तावेज़ के माध्यम से प्लॉट खरीदे थे।जमीन के इतिहास का जटिल सफल बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार:मूल भूमि: 404.76 एकड़ समुद्री कटाव के बाद बची:

135.11 एकड़1950 में सिद्धीक सैत नामक व्यक्ति ने जमीन फारूक कॉलेज को दान में दीउस समय दर्जनों परिवार पहले से वहाँ बसे हुए थेवर्षों बाद कॉलेज ने इन्हीं परिवारों को प्लॉट बेचे—जिनमें वक्फ का कोई उल्लेख नहीं इसके बावजूद वक्फ बोर्ड ने 2019 में इस पूरी भूमि को वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया, जिससे दर्जनों वैध बिक्री अचानक “अवैध” बताई जाने लगी और 600 परिवारों पर बेदखली का खतरा मंडराने लगा।

राज्य सरकार का हस्तक्षेप और उसके खिलाफ विरोध स्थानीय लोगों के विरोध को देखते हुए केरल सरकार ने नवंबर 2024 में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सी.एन. रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में एक जांच आयोग की स्थापना की।उद्देश्य था—भूमि की वास्तविक प्रकृति पता लगाना और समाधान सुझाना।इस आयोग को वक्फ संरक्षण समिति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।एकल-न्यायाधीश ने आयोग को अवैध बताया था पर डिवीजन बेंच ने इसे पलट दिया।

अब मामला सुप्रीम कोर्ट में—क्या कहा गया SLP में?SLP में वक्फ संरक्षण वेधि ने गंभीर आरोप लगाए हैं:हाईकोर्ट ने वक्फ ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन कियाट्रिब्यूनल में मामला लंबित होने के बावजूद हाईकोर्ट ने भूमि की प्रकृति पर टिप्पणी दी

आयोग को वैध ठहराकर हाईकोर्ट ने ‘कार्यपालिका के हस्तक्षेप’ को बढ़ावा दिया वक्फ मामलों पर अंतिम शब्द हमेशा ट्रिब्यूनल का होता है, न कि राज्य सरकार का याचिका अधिवक्ता अब्दुल्ला नसीह वीटी के माध्यम से दाख़िल की गई है।

सुप्रीम कोर्ट में अब बड़े सवालों का जवाब तय होगा शीर्ष अदालत को अब तीन प्रमुख सवालों पर निर्णय करना होगा:

1. क्या राज्य सरकार वक्फ विवादों में जांच आयोग गठित कर सकती है?

2. क्या हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर भूमि की प्रकृति पर टिप्पणी की?

3. क्या वक्फ बोर्ड और ट्रिब्यूनल की शक्तियों को कमजोर किया गया?इन सवालों का जवाब ही 600 परिवारों के भविष्य का आधार बनेगा।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: “वक्फ बोर्ड का कदम—भूमि हड़पने का हथकंडा

”डिवीजन बेंच ने कहा था:संपत्ति को वक्फ घोषित करने की प्रक्रिया कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण थी

1954 और 1995 के वक्फ कानूनों का पालन नहीं किया गयायह कदम “भूमि हड़पने के हथकंडे” जैसा है इससे सैकड़ों परिवारों की आजीविका सीधे प्रभावित हुई

राज्य सरकार आयोग गठित करने और आगे कार्रवाई करने के लिए कानूनन स्वतंत्र हैं बेंच

ने एकल-न्यायाधीश के आदेश को पलटकर सरकार के कदम को सही ठहराया था।अब आगे क्या होगा?सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद ही तय होगा:क्या 600 परिवार बेदखली से बच सकेंगे?क्या वक्फ बोर्ड का दावा कायम रहेगा या खत्म हो जाएगा?क्या जांच आयोग कानूनी तौर पर मान्य रहेगा?

मामला अब भूमि कानून, वक्फ अधिकार, कार्यपालिका की शक्ति और न्यायिक प्रक्रिया के चार पहियों पर आगे बढ़ रहा है—और इसका असर सीधा जनजीवन और राज्य के सामाजिक ढांचे पर पड़ेगा।

NSK

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