बंगाल में बाबरी मस्जिद निर्माण का ऐलान—6 दिसंबर की तारीख पर घमासान, टीएमसी विधायक के बयान से राजनीतिक हलचल तेज, विपक्ष और हिंदू संगठनों ने साधा निशाना

बी के झा

NSK

कोलकाता / नई दिल्ली, 22 नवंबर

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर धार्मिक प्रतीकवाद का तूफ़ान खड़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विधायक हुमायूं कबीर ने घोषणा की है कि मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा में 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद की नींव रखी जाएगी। यह वही तारीख है, जब 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा था—और इसी वजह से इस घोषणा ने बंगाल की राजनीतिक हवा में नया तनाव भर दिया है।

टीएमसी विधायक का बयान—“6 दिसंबर को नींव रखेंगे”हुमायूं कबीर के मुताबिक, मस्जिद निर्माण का प्रस्ताव पहले ही दिया जा चुका था और अब उसकी औपचारिक शुरुआत की जाएगी।उन्होंने कहा—“हम 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद की नींव रखेंगे। विभिन्न मुस्लिम नेता शामिल होंगे। यह निर्माण लगभग तीन साल में पूरा होगा।”उनके इस कथन के बाद बंगाल से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक तापमान बढ़ गया है।

बीजेपी का हमला—“संवेदनशील तारीख का राजनीतिक इस्तेमाल”अग्नि मित्रा पॉल (भाजपा नेता)उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया दी—“कोई भी मंदिर–मस्जिद बनाए, हमें ऐतराज नहीं। लेकिन टीएमसी ने 6 दिसंबर की तारीख चुनकर साफ कर दिया है कि वह धर्म के नाम पर राजनीति कर रही है। यह पूरी तरह वोट बैंक की राजनीति है।”प्रियंका टिबरेवाल (भाजपा)उन्होंने इसे ‘तुष्टिकरण की चरम सीमा’ बताते हुए कहा—“टीएमसी का सेक्युलरिज्म सिर्फ एक धर्म के लिए है। क्या इस मस्जिद में वे रोहिंग्या लोगों को भी बुलाएंगे? यह निर्माण नहीं, बल्कि चुनावी खेल है।”वहीं बीजेपी कार्यकर्ताओं ने एक विडियो शेयर करके हिन्दू मतदाताओं को ममता बनर्जी के साथ साथ सभी सैकुलर राजनीतिक दलों का हिंदू विरोधी मानसिकता उजागर करते दिखाया है

हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया—“सामाजिक सद्भाव भंग करने की कोशिश”विहिप व अन्य हिंदू संगठनहिंदू संगठनों ने इसे विवाद को पुनर्जीवित करने का प्रयास करार दिया।उनके अनुसार—“बंगाल की संवेदनशील परिस्थिति में 6 दिसंबर जैसी तारीख चुनकर टीएमसी जानबूझकर भावनाओं को भड़का रही है। इससे शांति नहीं, तनाव बढ़ेगा।”कुछ संगठनों ने यह भी कहा कि राज्य में बढ़ते SIR से उपजे तनाव के बीच ऐसी घोषणा अग्नि पर घी डालने जैसी है।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय—‘प्रतीकवाद की राजनीति चरम पर’राजनीतिक विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने इस मुद्दे को “राजनीतिक प्रतीकों का उपयोग” बताया।

राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अनिरुद्ध डे“यह कदम धार्मिक भावनाओं को उभारकर राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने जैसा है। बंगाल पहले से ही संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। इसलिए तारीख को लेकर बेहतर राजनीतिक संवेदनशीलता दिखाई जा सकती थी।”

शिक्षाविद प्रो. सुमित्रा बनर्जी“मस्जिद बनाना गलत नहीं, लेकिन 6 दिसंबर चुनना एक राजनीतिक संकेत है। इससे टीएमसी अपने मुस्लिम वोट बैंक को संदेश देना चाहती है और बीजेपी इसे हिंदू ध्रुवीकरण के अवसर के रूप में देख रही है।”

टीएमसी का पक्ष—“एकजुटता और सद्भाव का संदेश”बीजेपी के आरोपों के जवाब में टीएमसी नेताओं ने कहा—“यह मस्जिद निर्माण का अधिकार है, और नींव रखने की तारीख पर विवाद खड़ा करना अनावश्यक है। विपक्ष सिर्फ मुद्दा भटकाना चाहता है।”टीएमसी 6 दिसंबर को “एकजुटता दिवस रैली” निकाल रही है, जिसे इस बार अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ की बजाय पार्टी की युवा और छात्र शाखाओं को सौंपना, टीएमसी का एक बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।

कुल मिलाकर क्या?6 दिसंबर को नींव रखने की घोषणा ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है।एक तरफ टीएमसी इसे “सामाजिक एकजुटता” से जोड़ रही है, तो दूसरी तरफ बीजेपी इसे “धार्मिक तुष्टिकरण” बता रही है।हिंदू संगठन इसे “भावनाओं से खेलना” मानते हैं, जबकि विश्लेषकों के अनुसार यह ध्रुवीकरण की सीधी राजनीति है।बंगाल में मुद्दा अब सिर्फ मस्जिद की नींव का नहीं रहा—बल्कि तारीख, प्रतीकवाद और चुनावी राजनीति के चौराहे पर आ खड़ा है।

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