चिराग पासवान 25 सीटों पर राजी? NDA में सुलह के सिग्नल — भाजपा ने ऑफर में RS/MLC और सीटें बताकर तालमेल बढ़ाने की कोशिश की

बी के झा

NSK

पटना बिहार / नई दिल्ली , 10 अक्टूबर

विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए के भीतर सीट-वाट का मसला अब निर्णायक चरण में दिख रहा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने अपनी मांग घटाकर लगभग 25–26 सीटों पर समझौता करने की ओर रुख किया है — जिसके एवज में भाजपा ने उनकी पार्टी को विधान परिषद (MLC) और संभावित रूप से राज्यसभा की एक सीट देने का आश्वासन भी दिया गया है। कैसे पहुँचा यह मोड़ — मांग, पेशकश और बैठकेंसूत्रों का कहना है कि शुरुआती दौर में चिराग की मांग 40 से ऊपर बताई जा रही थी, बाद में उन्होंने इसे 35 तक घटाया और अंतिम दौर की बातचीत में 25–26 के स्तर पर सहमति के संकेत मिलने लगे। भाजपा-एलजेपी के बीच यह बैक-एंड तालमेल कुछ अहम सीटों पर हो रहे टकराव और समायोजन के बाद आया है। एनडीए के वरिष्ठ नेताओं और लोक जनशक्ति पार्टी प्रतिनिधियों के बीच हाल के दिनों में पटना में कई दौर की बैठकें हुईं — इनमें केंद्रीय नेताओं और भाजपा के संगठन प्रतिनिधि शामिल रहे। इन बैठकों में बताया जा रहा है कि बातचीत “सकारात्मक” बनी हुई है और सामने आए समझौते की औपचारिक घोषणा निकट दिनों में होने की उम्मीद है। लोक जनशक्ति पार्टी की शीर्ष बैठक में सांसदों और प्रदेश नेतृत्व ने चिराग को अंतिम फैसला लेने का अधिकार भी दे दिया है — जिससे साफ संदेश गया कि पार्टी फिलहाल अध्यक्ष के साथ एकजुट दिखना चाहती है। भाजपा ने क्या-क्या दिया और देने का कहा जा रहा है समाचार एजेंसियों और अखबारों की रिपोर्टों में यह उल्लेख है कि भाजपा ने चिराग को विधानसभा सीटों के साथ-साथ एक MLC और एक राजयसभा की सीट की पेशकश का भरोसा दिया है — ताकि LJP(RV) को केवल विधानसभा-सीट तक सीमित न रखते हुए उन्हें संगठनात्मक व संवैधानिक सम्मान भी मिल सके। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि केंद्र-बिहार दोनों स्तरों पर उनकी भूमिका को मजबूत करने का आश्वासन दिया गया है — हालांकि मंत्रालयों को लेकर खुली घोषणा अभी किसी ने आधिकारिक तौर पर नहीं की है। (नोट: उपर्युक्त ‘आश्वासन/ऑफर’ मीडिया-रिपोर्टों पर आधारित हैं — इनकी औपचारिक घोषणा तब तक आधिकारिक नहीं मानी जानी चाहिए जब तक पार्टी/केंद्र द्वारा सार्वजनिक बयान न आ जाए।)गठबन्धन के अंदर की जटिलताएँ — अन्य सहयोगियों की मांगेएनडीए में सिर्फ LJP(RV) ही नहीं, बल्कि जीतनराम मांझी (HAM), उपेंद्र कुशवाहा जैसे अन्य छोटे दलों की भी सीट-मांगें तेज हैं। JD(U) और BJP के बीच भी टकराव के स्थान पर समंजस्य बैठाने की कोशिशें चलीं — इसलिए भाजपा के लिए सभी पक्षों को संतुष्ट रखना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। प्रस Georgically, कुछ साथी दलों ने कड़ा रुख दिखाया है — जैसे मांझी ने अपने लिए सम्मानजनक संख्या की मांग की है, तो LJP(RV) ने कुछ ऐसे जिलों की मांग की है जहाँ उसकी ताकत देखी जाती है। इन सब वजहों से सीट-वाट पर आखिरी पेंच अभी भी निपटने बाकी हैं। चिराग के बयान और परिवार-राजनीति की झलकचिराग ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि “एनडीए में सब ऑल-इज़-वेल है” और बातचीत अच्छी तरह चल रही है — एक तरह से उन्होंने गठबंधन के भीतर असहमतियों के ख़बरों को खारिज करने की कोशिश की है। इधर पारिवारिक मोर्चे पर भी हलचल है: चिराग के रुख से प्रभावित उनके पारिवारिक प्रतिद्वंद्वी (RLJP-Paras गुट) ने कहा है कि वह कई सीटों पर चिराग के खिलाफ प्रतिद्वंद्वी उतारेगा — जो चुनावी समीकरण को और जटिल बना सकता है। आरोप-प्रचार: टिकट बेचने जैसी पुरानी उथल-पुथल और नवीन दावेराजनीतिक गलियारों में चिराग के टिकट-वाट के तरीके पर पिछले वर्षों में भी आरोप उठे हैं — 2024 में पार्टी के 22 नेताओं ने इस्तीफा देकर टिकट बेचने का प्रत्यक्ष आरोप लगाया था। वर्तमान दौर में भी कुछ सूत्रों की बयानों में यह कहा जा रहा है कि कुछ खास सीटों पर टिकट के एवज में रकम की बातें हुईं (उदाहरणस्वरूप, हायाघाट से जुड़ी खबरें जिक्र की जा रही हैं)। परंतु इन तरह के आरोप फिलहाल अनौपचारिक और नामज़द सबूतों से रहित हैं — मीडिया-रिपोर्ट्स में इन्हें ‘सूत्रों का दावा’ कर के पेश किया जा रहा है और इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रिकॉर्ड या पुलिस/आदालत के स्तर पर नहीं मिली है। इसलिए इन आरोपों को तथ्‍य के रूप में नहीं बल्कि स्थानीय राजनीतिक हलचल और अफवाहों के हिस्से के रूप में देखना ज़रूरी है। रणनीतिक मायने — भाजपा-एलजेपी समझौता क्यों जरूरी था?1. वोटर-बेस और सीट-मेट्रिक्स: LJP(RV) की गैर-यादव OBC/ EBC वोटबेस BJP के लिए उपयोगी मानी जाती है; छोटी पार्टियों को साथ लेकर भाजपा व्यापक जातीय और क्षेत्रीय समीकरण बनाए रखना चाहती है। 2. नॉमिनेशन-टाइमिंग: नामांकन और प्रचार-तैयारी की समयसीमा नज़दीक है; भाजपा चाहती है कि उसके और सहयोगियों के उम्मीदवारों को पर्याप्त प्रचार-समय मिले — इसलिए सीट-वाट जल्द फाइनल करने की ज़रूरत है। 3. प्रतिकूल विकल्पों से निपटना: यदि छोटे सहयोगी सख्त रुख पर आ जाएँ या अलग सूची जारी करें तो NDA की समग्र चुनी-लड़ाई प्रभावित हो सकती है — इसलिए समझौता दोनों के हित में दिखता है। अब आगे क्या देखें — टाइमलाइन और संभावित परिणामकब होगा अघोषित समझौता? मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सीट-बंटवारे की फाइनल सूची और पहली कैंडिडेट-सूची 10–13 अक्टूबर के बीच जारी होने की संभावना है — इसके बाद नामांकन-प्रक्रिया की अंतिम तारीखें चलेंगी। क्या चिराग मुख्यमंत्री की दावेदारी रखेंगें? कुछ कयास और स्थानीय चर्चा में यह बात भी आई है कि चिराग की महत्वाकांक्षा बड़ी है, पर महागठबंधन और NDA के बड़े दलों के मद्देनजर यह व्यवहारिकता पर निर्भर करेगा। अख्तियार/कानूनी पहलें: यदि टिकट-विक्रय/रकम जमा करने जैसे आरोप की ठोस जानकारी आती है तो स्क्रूटनी/पुलिस जांच चालू हो सकती है — फिलहाल ऐसी कोई आधिकारिक कार्रवाई सार्वजनिक नहीं हुई है। निष्कर्ष बिहार की राजनेतिक तस्वीर फिलहाल समंजस की ओर बढ़ रही है — चिराग पासवान के 25-26 सीटों पर आ जाने की खबरें एनडीए को राहत दे सकती हैं और भाजपा को चुनाव मैदान में रणनीति जल्दी तय करने का अवसर मिल सकता है। पर साथ ही छोटे सदस्यों की मांगें, पारिवारिक प्रतिद्वंद्विता और टिकट-वितरण को लेकर उठ रहे पुराने आरोप इस समझौते को नाजुक भी बना देते हैं। आने वाले 72-96 घंटों में होने वाली आधिकारिक घोषणाएँ ही बताएँगी कि यह सुलह कितनी मजबूती से टिकती है।

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