बी के झा
NSK


नई दिल्ली/ मुर्शिदाबाद/ कोलकाता, 29 नवंबर
मुर्शिदाबाद के भरतपुर विधानसभा से तृणमूल कांग्रेस के विधायक हुमायूं कबीर के ताजा बयान ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में मानो बारूद पर चिंगारी गिरा दी है। कबीर ने ऐलान किया है कि वे 6 दिसंबर को ‘नई बाबरी मस्जिद’ की नींव रखेंगे, वह भी सरकारी फंड से नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय से जुटाए गए चंदे से। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा है कि वे जल्द ही टीएमसी छोड़कर दिसंबर 2025 तक एक नई ‘सेक्युलर पार्टी’ बनाएंगे, जो 100 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।उनके इस विवादित बयान ने बंगाल की राजनीति में न सिर्फ हलचल पैदा की है, बल्कि आने वाले समय में सियासी तापमान के और बढ़ने का संकेत भी दे दिया है।
हुमायूं कबीर का एलान: “टीएमसी छोड़ दूंगा, लेकिन मस्जिद बनाऊंगा”एक कार्यक्रम में बोलते हुए कबीर ने कहा—“मैं तृणमूल कांग्रेस छोड़ दूंगा, लेकिन मस्जिद जरूर बनाऊंगा। किसी में हिम्मत नहीं कि रोक सके। जो मेरा सिर काटने आएगा, उसका अंजाम क्या होगा, बताना नहीं चाहता।”उन्होंने दावा किया कि बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या 38% है और कुछ ही सालों में यह 40% को पार कर जाएगी।
उनके मुताबिक—“शुरुआत में एक कट्ठा जमीन पर नींव रखी जाएगी। इसके 3–4 महीने बाद 25 बीघा जमीन पहचान ली जाएगी। अगले चार साल में मस्जिद के साथ यूनिवर्सिटी, हॉस्पिटल, होटल और रेस्टोरेंट भी बनेंगे। क्या सेक्युलरिज़्म सिर्फ मंदिर बनाने के लिए है?”कबीर ने ममता बनर्जी पर तंज कसते हुए कहा—“दीघा में जगन्नाथ मंदिर बना रही हैं, पूजा कार्निवल के लिए सड़कें रोकती हैं। अगर मैं मस्जिद बनाऊं, तो यह क्राइम कैसे?”
बीजेपी का पलटवार: “ममता की चुप्पी संदेहास्पद”कबीर के बयान ने विपक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दा दे दिया।बीजेपी नेता राहुल सिन्हा ने तीखा हमला करते हुए कहा—“जिसके शरीर में बाबर का खून दौड़ रहा हो वही बाबरी मस्जिद बनवाना चाहेगा। ममता बनर्जी चुप क्यों हैं? अगर सच में विरोध है तो अपने विधायक पर कार्रवाई क्यों नहीं करतीं?”
बीजेपी ने सवाल उठाया कि क्या यह सब कुछ ‘मुस्लिम वोट बैंक को साधने’ की रणनीति के तहत टीएमसी की मौन स्वीकृति से हो रहा है?
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों की राय: “
बंगाल में खतरनाक खेल शुरू”
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं—“बिहार चुनाव में ‘सेक्युलर’ पार्टियों की भारी हार के बाद कई दलों में घबराहट है। बंगाल में चुनाव करीब हैं, और टीएमसी किसी भी कीमत पर मुस्लिम वोटों के बिखराव को रोकना चाहती है। ऐसे में कबीर का बार-बार बाबरी मस्जिद का जिन्न बाहर निकालना चुनावी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।”एक अन्य विश्लेषक ने और गंभीर आशंका जताई—“
हुमायूं कबीर और कुछ मौलानाओं द्वारा अचानक भड़काऊ बयान आना संकेत देता है कि कहीं कोई बड़ा राजनीतिक गेम चल रहा है। क्या देश में अशांति फैलाने की कोशिश हो रही है? क्या 1947 जैसे हालात पैदा कर वोटों की राजनीति की तैयारी हो रही है?”
उन्होंने कहा—“ममता बनर्जी की कुर्सी बचाने के लिए क्या राज्य को सांप्रदायिक तनाव की आग में झोंका जा रहा है? क्या धर्म के नाम पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की पटकथा लिखी जा रही है?”एक वरिष्ठ समाजसेवी का चेतावनी भरा वक्तव्य
एक प्रमुख समाजसेवी ने कहा—“हुमायूं कबीर का बयान सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि बेहद खतरनाक है। यह सीधे-सीधे देश के बहुसंख्यक समाज को उकसाने की कोशिश है। इस तरह के बयान बंगाल ही नहीं, पूरे देश में तनाव फैलाने का काम करेंगे। यदि सरकारें सतर्क नहीं हुईं तो इसकी कीमत समाज को चुकानी पड़ेगी।”
क्या ममता की खामोशी कोई रणनीति है?
राजनीतिक गलियारों में लगातार चर्चा है कि–क्या टीएमसी जान-बूझकर कबीर को बोलने दे रही है ताकि मुस्लिम वोट उसके पक्ष में ठोस रूप से लौट आएं?
या फिर यह कबीर की अपनी सियासी जमीन तैयार करने की उग्र रणनीति है?क्या आगामी चुनावों में धार्मिक ध्रुवीकरण बंगाल की राजनीति की केंद्रीय धुरी बनने वाला है?
निष्कर्ष:
हुमायूं कबीर का मस्जिद निर्माण का ऐलान सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की सियासत में एक नए तूफान की शुरुआत है।एक ओर टीएमसी की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है, वहीं बीजेपी इसे बड़ा राजनीतिक हथियार मानकर तीखे हमले कर रही है।विशेषज्ञों की राय में यह विवाद आगामी महीनों में बंगाल ही नहीं, पूरे देश की राजनीति को झकझोर सकता है।
