जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा क्यों न दिया जाए? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब, चार हफ्ते में पेश करनी होगी रिपोर्ट

बी के झा

NSK

नई दिल्ली , 10 अक्टूबर

जम्मू-कश्मीर को दोबारा पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार से सख्त सवाल पूछा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आखिर जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा क्यों नहीं मिलना चाहिए, इस पर सरकार स्पष्ट रूप से जवाब दे। अदालत ने केंद्र को इस संबंध में चार हफ्तों का समय देते हुए नोटिस जारी किया है।यह मामला उन कई याचिकाओं से जुड़ा है जिनमें जम्मू-कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा देने की मांग की गई है। इन याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने गुरुवार को सुनवाई की। अदालत ने सरकार से यह भी पूछा कि दिसंबर 2023 में दिए गए फैसले के बाद अब तक इस दिशा में क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।याचिकाकर्ताओं ने उठाया सवाल: वादा पूरा क्यों नहीं हुआ?इन याचिकाओं में प्रमुख रूप से जहूर अहमद भट और सामाजिक कार्यकर्ता अहमद मलिक शामिल हैं। उन्होंने अदालत में दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि जम्मू-कश्मीर में सितंबर 2024 तक चुनाव कराए जाएं और उसके बाद राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में कदम उठाए जाएं।याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अब चुनाव प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में कोई स्पष्ट प्रगति नहीं हुई है। इसलिए अब अदालत को हस्तक्षेप कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर को जल्द से जल्द उसका संवैधानिक दर्जा वापस मिले।केंद्र का पक्ष: “जम्मू-कश्मीर का मामला बेहद संवेदनशील”केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस देने पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है, लेकिन यह एक “यूनिक और जटिल मामला” है, जिस पर कई पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाएगा।उन्होंने कहा,यह एक विशेष परिस्थिति वाला क्षेत्र है। इस पर विस्तृत चर्चा चल रही है और विभिन्न पहलुओं पर विचार किया जा रहा है। निर्णय जल्दबाजी में नहीं लिया जा सकता।”मेहता ने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर के हालात उतने खराब नहीं हैं, जितने अक्सर कुछ वर्गों द्वारा दिखाए जाते हैं।कुछ लोग अपने हिसाब से नैरेटिव बनाते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार वहां स्थिरता और विकास के लिए निरंतर प्रयासरत है।”पृष्ठभूमि: जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था – जल्द बहाल हो राज्य का दर्जाबता दें कि 11 दिसंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के केंद्र सरकार के निर्णय को संवैधानिक और वैध ठहराया था। हालांकि, उसी फैसले में अदालत ने यह भी कहा था कि जम्मू-कश्मीर को एक “राज्य के रूप में बहाल” किया जाना चाहिए, ताकि वहां लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था पूरी तरह से स्थापित हो सके।सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच ने यह भी निर्देश दिया था कि सितंबर 2024 तक विधानसभा चुनाव संपन्न करा लिए जाएं। अब जबकि यह अवधि पूरी हो चुकी है और चुनाव भी आयोजित हो चुके हैं, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार को अब अपना वादा निभाना चाहिए।अब आगे क्या?सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि अगली सुनवाई में यदि केंद्र की ओर से ठोस जवाब नहीं आता, तो वह इस मुद्दे पर विस्तृत बहस करेगी।कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला सिर्फ संवैधानिक दायरे का नहीं बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व का भी है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने से वहां की जनता को पूर्ण राजनीतिक अधिकार और स्थानीय शासन की ताकत दोबारा प्राप्त होगी।निष्कर्षजम्मू-कश्मीर का भविष्य एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सवालों और केंद्र सरकार के जवाबों के बीच खड़ा है। अब देश की निगाहें आने वाले चार हफ्तों पर हैं — क्या केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा देने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाएगी, या यह मुद्दा एक बार फिर लंबी बहसों में उलझ जाएगा?

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