बी के झा
NSK

कोलकाता / नई दिल्ली, 3 दिसंबर
पश्चिम बंगाल में 6 दिसंबर के ठीक पहले राजनीतिक तापमान खतरनाक रूप से बढ़ गया है।मुर्शिदाबाद के टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर द्वारा “बाबरी मस्जिद” के नाम से मस्जिद की आधारशिला रखने की घोषणा ने न केवल राज्य के माहौल को गर्म कर दिया है, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों को भी हाई-अलर्ट पर ला दिया है।स्थिति की गंभीरता देख राज्यपाल सी. वी. आनंद बोस ने सीधे कमान संभालते हुए राज्य सरकार को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कठोर निर्देश जारी किए हैं।
उन्होंने स्पष्ट कहा—“यदि आवश्यक हो, संभावित उपद्रवियों को एहतियातन हिरासत में लिया जाए। किसी भी कीमत पर शांति भंग नहीं होने दी जाएगी।”
टीएमसी विधायक की घोषणा और विवाद की पृष्ठभूमि टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर ने कुछ सप्ताह पहले ऐलान किया था कि“6 दिसंबर को मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की तर्ज पर मस्जिद की नींव रखी जाएगी।”यह वही तारीख है जब 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाया गया था।इस तारीख का चुनाव न सिर्फ संयोग माना जा रहा है,
बल्कि राजनीतिक विश्लेषक इसे “जानबूझकर भड़काऊ रणनीति” करार दे रहे हैं।टीएमसी ने आधिकारिक तौर पर इससे दूरी बना ली है, लेकिन कबीर का बयान पुलिस अधिकारियों को खुलेआम दी गई धमकीऔर लगातार उग्र टिप्पणियाँ
राज्य में तनाव को खुला निमंत्रण देती दिखाई देती हैं।कबीर ने स्थानीय अधिकारियों से कहा—“
तुम्हें औकात तब पता चलेगी जब कॉलर पकड़कर खींचा जाएगा!”यह टिप्पणी स्वयं में कानून-व्यवस्था की अवहेलना का सार्वजनिक प्रदर्शन है।
राज्यपाल का सख्त रुख—‘अगर राज्य सरकार ढील देगी, तो मैं खुद मैदान में उतरूंगा’लोक भवन के अधिकारियों के अनुसार, राज्यपाल ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि“यह परिस्थिति किसी भी समय सांप्रदायिक आग में बदल सकती है। प्रशासन को हर आवश्यक कदम उठाने होंगे।”राज्यपाल ने जिन बिंदुओं पर जोर दिया:
संवेदनशील जिलों में अतिरिक्त पुलिस बल
सोशल मीडिया पर निगरानी
उपद्रवी तत्वों की पहचान
एहतियाती गिरफ्तारी की तैयारी
जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बलों की मांग सुरक्षा अधिकारियों ने इसे “गंभीर घटनाओं की आशंका का संकेत” बताया है।
देशव्यापी सांप्रदायिक उत्तेजना—क्या सब एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है?पिछले कुछ सप्ताह में देशभर में कई उग्र बयान सामने आए—
तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी द्वारा देवी-देवताओं पर विवादित टिप्पणी धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बयान, जिसे विरोधी दलों ने “मुस्लिम तुष्टिकरण” कहा।
सपा सांसद मोहबिला नदमी का संसद में ‘जिहाद’ का आह्वान लोकसभा में खड़े होकर ऐसा बयान देना लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ माना जा रहा है।
मौलाना महमूद मदनी का भड़काऊ भाषण जहाँ उन्होंने“हजारों मुसलमानों को जिहाद के लिए तैयार रहने”और हिंदुओं को ‘मुर्दा कौम’ कहने की विवादित टिप्पणी की।
राजनीतिक विश्लेषक इन घटनाओं को “पड़ोसी देशों में बढ़ रहे कट्टरपंथ और भारत में वोट बैंक आधारित राजनीति का खतरनाक संयोजन” बता रहे हैं।
विशेषज्ञों की चेतावनी—“6 दिसंबर बंगाल ही नहीं, देश के लिए संवेदनशील दिन”सुरक्षा विश्लेषक प्रो. सुशांत कर“हुमायूं कबीर की घोषणा सांप्रदायिक वातावरण में चिंगारी फेंकने जैसा है। राज्यपाल का कदम समय रहते उठाया गया सुरक्षा उपाय है।”
वरिष्ठ पत्रकार अमोल दत्ता“बंगाल में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब धार्मिक ध्रुवीकरण की जमीन पर होने लगी है। यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
”भू-राजनीतिक विशेषज्ञ श्रेयांश भौमिक“बांग्लादेश और पाकिस्तान में उभरते कट्टरपंथ का असर भारतीय राजनीति पर दिखना स्वाभाविक है। सुरक्षा एजेंसियों को बेहद सतर्क रहना होगा।”
गवर्नर का कदम—‘बंगाल ही नहीं, भारत की स्थिरता के लिए आवश्यक’राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि गवर्नर बोस का यह कदम
न केवल संवैधानिक ज़िम्मेदारी का सही उपयोग है
बल्कि बंगाल की अस्थिर राजनीति में एक संतुलनकारी हस्तक्षेप भी
और सबसे महत्वपूर्ण—देश में बढ़ती कट्टर बयानबाज़ी को रोकने का स्पष्ट संदेश उनके निर्णय की प्रमुख पत्रकारों और विशेषज्ञों द्वारा सराहना की गई, जिन्होंने कहा—“अगर आज सख्ती नहीं दिखाई गई, तो कल बहुत देर हो जाएगी।”
निष्कर्ष6
दिसंबर सिर्फ एक तारीख नहीं—यह भारतीय राजनीति, समाज और सुरक्षा के लिए गंभीर परीक्षा का दिन बन चुका है।जब देशभर में कट्टर बयानबाज़ी बढ़ रही हो और पड़ोसी देशों में कट्टरपंथी ताकतें उभर रही हों—तब बंगाल की स्थिति और ज्यादा संवेदनशील हो जाती है।गवर्नर बोस का निर्णायक रुख इस समय की आवश्यकता भी है और चेतावनी भी—कि “शांति से खिलवाड़ करने की कीमत कोई भी हो, भारत उसे स्वीकार नहीं करेगा।
