बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 3 दिसंबर
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने बुधवार को वैश्विक मंच पर एक बार फिर ऐसा संदेश दिया, जिसने अमेरिकी और यूरोपीय नीतिगत गलियारों में हलचल पैदा कर दी। मोबिलिटी पर आयोजित एक कॉन्क्लेव में उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि “सीमा पार प्रोफेशनल्स पर दीवार खड़ी करने वाले देश भविष्य में सबसे बड़ा नुकसान उठाएंगे।” उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीज़ा पर भारी फीस बढ़ाकर और नियम कठोर करके विदेशी प्रतिभाओं, विशेषकर भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिका का रास्ता पहले से कहीं अधिक कठिन बना दिया है।“टैलेंट रोकोगे तो नुकसान तुम्हारा, न हमारा”—
जयशंकरबिना किसी देश का नाम लिए जयशंकर ने कहा—
“जो देश पेशेवरों के फ्लो पर बहुत अधिक प्रतिबंध लगाते हैं, वे कुल मिलाकर स्वयं को ही नुकसान पहुंचाते हैं। उन्नत विनिर्माण और टेक्नॉलजी की नई दुनिया में उनकी अपनी ज़रूरतें उन्हें घेरेंगी।”उन्होंने इशारों में अमेरिका और यूरोप की ओर संकेत करते हुए कहा कि विकसित राष्ट्रों में नौकरियों का संकट “विदेशियों के आने” से नहीं, बल्कि “अपने ही मैन्युफैक्चरिंग बेस को बाहर धकेल देने” से पैदा हुआ है।और फिर उनकी एक पंक्ति पूरे सत्र का केंद्रीय संदेश बन गई—“अगर लोग यात्रा नहीं करेंगे, तो काम यात्रा करेगा—देशों से बाहर।”भारतीय कौशल का वैश्विक दबदबा — आंकड़े खुद बोलते हैंअमेरिका के H-1B वीज़ा में भारतीयों का दबदबा किसी से छिपा नहीं।यूएससीआईएस के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार:सभी स्वीकृत H-1B आवेदन में 71% भारतीयभारत में पिछले वर्ष 135 अरब डॉलर का रेमिटेंस, जो अमेरिका को किए गए भारतीय निर्यात से दोगुना यानी, भारतीय टैलेंट सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं बनाता… बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ब्लड-सर्क्युलेशन का काम करता है।
राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रिया — “भारत अब बोलता नहीं, सुनाता है”प्रमुख वैश्विक मामलों के जानकारों ने जयशंकर के बयान को “न्यू इंडिया की कूटनीति का आत्मविश्वासी स्वर” बताया।प्रो. अरविंद निरंजन (अंतर्राष्ट्रीय राजनीति विशेषज्ञ)“अमेरिका व यूरोप भारतीय टैलेंट पर निर्भर हैं। उनके राजनीतिक नेता आव्रजन पर सख्ती की राजनीति खेल सकते हैं, पर अर्थव्यवस्था की हकीकत कुछ और है। जयशंकर ने यह हकीकत दुनिया के सामने रख दी।”डॉ. सना कुरैशी (वैश्विक श्रम-आर्थिक विश्लेषक)“ग्लोबल सप्लाई-चेन का नया दौर टैलेंट-ड्रिवन है। जैसे-जैसे कंपनियां चीन से बाहर आ रही हैं, भारत की भूमिका और बढ़ेगी। ऐसे में टैलेंट रोकने वाले देश स्वयं अलग-थलग पड़ेंगे।
”विपक्ष की प्रतिक्रिया — “जयशंकर सच बोल रहे हैं, पर सरकार को घर में भी यही नीति लागू करनी चाहिए”हालाँकि विपक्षी दलों ने वैश्विक मंच पर जयशंकर के रुख की सराहना की, लेकिन साथ ही सरकार पर निशाना भी साधा।कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत“जयशंकर जी ने सही कहा कि टैलेंट को सीमाओं में कैद करना गलत है। लेकिन भारत को भी अपने युवाओं को वही अवसर और माहौल देना चाहिए, ताकि वे विदेश जाने के लिए मजबूर न हों।
”टीएमसी सांसद साकेत घोष“अमेरिका को नसीहत देने से पहले केंद्र सरकार को स्टार्टअप्स पर टैक्स आतंकवाद रोकना होगा। भारत का टैलेंट विदेश इसलिए जा रहा है क्योंकि यहां नीति स्थिरता नहीं है।”
सीपीआई(एम) नेता महेंद्र पांडे“वैश्विक श्रम गतिशीलता की बात अच्छी है, पर सरकार को यह भी बताना चाहिए कि बेरोजगारी रिकॉर्ड स्तर पर क्यों है? देश के अंदर कौशल का उपयोग कितना हो रहा है?”
अमेरिकी नीति पर सीधा प्रहार—या रणनीतिक संदेश?विशेषज्ञों के अनुसार यह बयान सिर्फ एक टिप्पणी नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में एक “संकेत” भी है:भारत अब टैलेंट को bargaining power की तरह इस्तेमाल करेगाअमेरिका के ‘टेक डिपेंडेंसी’ को भारत भलीभांति समझता हैनई वैश्विक व्यवस्था में भारत workforce diplomacy का नया सूत्रधार बनेगा“सीमा पर नहीं, दिमागों पर दीवार” — जयशंकर ने खोल दी पश्चिम की पोलअंत में जयशंकर ने अवैध प्रवासन पर भी कड़ा संदेश दिया—“अवैध मार्गों में अलगाववादी और अपराधी एजेंडा शामिल होता है। कानूनी गतिशीलता ही सुरक्षित और परस्पर लाभकारी है।”उनका पूरा भाषण ऐसे समय आया है जब दुनिया भर में राजनीतिक पार्टियाँ “एंटी-इमिग्रेशन” के सहारे चुनाव जीतने की कोशिश कर रही हैं, परंतु अर्थव्यवस्थाएँ टैलेंट के बिना ठहरने लगी हैं।
निष्कर्ष —
भारत के विदेश मंत्री ने दुनिया को बता दिया है कि भविष्य टैलेंट का है, और टैलेंट का सबसे बड़ा घर भारत है।अमेरिका हो या यूरोप—अगर वे भारत के कौशल, इंजीनियर्स और टेक प्रोफेशनल्स के लिए दरवाज़े बंद करेंगे, तो असली नुकसान उनका ही होगा।
