बी के झा
NSK


दरभंगा / नई दिल्ली, 11 अक्टूबर
जन सुराज पार्टी प्रमुख प्रशांत किशोर ने आगामी बिहार विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक दांव खेलते हुए दरभंगा शहरी सीट से पूर्व डीजी (IPS) राकेश कुमार मिश्रा को पार्टी का प्रत्याशी घोषित किया है। इस फैसले से न केवल स्थानीय सियासत में हलचल मच गई है, बल्कि एनडीए से लेकर इंडिया गठबंधन तक में नए समीकरण बनने की चर्चा शुरू हो गई है।
सहरसा से दरभंगा तक –
जन सुराज की रणनीतिसहरसा जिले के नगर पंचायत बनगांव वार्ड नंबर 9 के मूल निवासी पूर्व डीजी राकेश मिश्रा का नाम जब दरभंगा से प्रत्याशी के रूप में सामने आया, तो राजनीतिक गलियारों में अटकलों का दौर तेज हो गया। तीन दशकों से अधिक पुलिस सेवा का अनुभव रखने वाले राकेश मिश्रा अपनी ईमानदारी, सख़्त अनुशासन और जनसरोकारों के लिए हमेशा चर्चित रहे हैं।उन्होंने आईआईटी (BHU) वाराणसी से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक किया और भारतीय पुलिस सेवा में शामिल होने के बाद नक्सलवाद और संगठित अपराध के खिलाफ कई सफल अभियानों का नेतृत्व किया। उनकी कार्यशैली ने उन्हें एक जुझारू और निष्पक्ष अधिकारी के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई।
जन सुराज का मकसद –
प्रशासनिक अनुभव को राजनीति में ला्का प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी लगातार ऐसे चेहरों को राजनीति में लाने की कोशिश कर रही है, जिनका प्रशासनिक या सामाजिक कार्यों में सशक्त योगदान रहा हो।पूर्व डीजीपी राकेश मिश्रा की उम्मीदवारी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। दरभंगा जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील और जातीय समीकरणों से प्रभावित क्षेत्र में एक पेशेवर, गैर-राजनीतिक छवि वाले उम्मीदवार को उतारना पीके का साहसिक कदम माना जा रहा है।स्थानीय मतदाताओं में मिश्रित प्रतिक्रियाहालांकि, दरभंगा के कुछ स्थानीय मतदाताओं में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या “बाहरी” उम्मीदवार क्षेत्र की जमीनी समस्याओं को सही मायनों में समझ पाएंगे?
दरभंगा ब्राह्मण बहुल्य विधानसभा क्षेत्र माना जाता है, और इसी जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए पीके ने ब्राह्मण समाज से आने वाले मिश्रा को मैदान में उतारा है।गांव के एक स्थानीय निवासी टुन्ना मिश्रा कहते हैं,राकेश मिश्रा जब भी गांव आते हैं, तो हर किसी से आत्मीयता से मिलते हैं। वे केवल एक अफसर नहीं, बल्कि समाज के सच्चे सेवक हैं। अगर ऐसे पढ़े-लिखे और ईमानदार लोग राजनीति में आएंगे, तो क्षेत्र का विकास निश्चित है।”
राजनीतिक इतिहास की गूंज –
ललित और जगन्नाथ मिश्रा का संदर्भदरभंगा और आसपास का इलाका कभी स्व. ललित नारायण मिश्रा और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्रा जैसे दिग्गज ब्राह्मण नेताओं का गढ़ रहा है।आज भी जनता के मन में यह तुलना उठ रही है कि क्या पूर्व डीजीपी राकेश मिश्रा उस विरासत को आगे बढ़ा पाएंगे या फिर वे भी उन्हीं पुराने “राजनीतिक रास्तों” पर चल पड़ेंगे, जहाँ जनता के बजाय ठेकेदारों और प्रभावशाली वर्गों को प्राथमिकता मिलती रही है।
राजनीतिक विश्लेषण –
तीन स्तरों पर असर
1. जातीय संतुलन: ब्राह्मण वोटबैंक को साधने की स्पष्ट रणनीति।
2. विकास बनाम राजनीति: एक अनुभवी अफसर को उम्मीदवार बनाना जनता में “सुशासन और विकास” की उम्मीद जगाता है।
3. दरभंगा बनाम बाहरी बहस: स्थानीय बनाम बाहरी प्रत्याशी की बहस निश्चित तौर पर चुनावी हवा में प्रमुख मुद्दा बनेगी।राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित अधिकारीपूर्व डीजीपी मिश्रा को उनकी उत्कृष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक से भी सम्मानित किया जा चुका है। यह उनकी प्रशासनिक दक्षता और ईमानदारी का प्रमाण है। अब राजनीति में कदम रखकर वे “कानून और विकास” दोनों को एक साथ आगे बढ़ाने का संकल्प ले रहे हैं।
निष्कर्ष
दरभंगा की जनता अब उत्सुक है यह देखने के लिए कि क्या जन सुराज का यह “नया सूरज” सच में चमकेगा या पारंपरिक राजनीति के बादलों में खो जाएगा।फिलहाल इतना तय है कि पूर्व डीजीपी राकेश मिश्रा की एंट्री ने दरभंगा के सियासी मैदान को और भी रोमांचक बना दिया है।
