बदायूं की पिंकी ने रचाई ‘कान्हा’ से अनोखी शादी लड्डू गोपाल की बारात, वरमाला, फेरे और विदाई— पूरे गांव ने देखा अद्भुत आध्यात्मिक अनुष्ठान

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/बदायूं/इस्लामनगर, 10 दिसंबर

उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में एक ऐसी अनोखी शादी हुई, जिसने पूरे क्षेत्र में व्यापक चर्चा छेड़ दी है। इस्लामनगर ब्लॉक के बैौर कासिमाबाद गांव की रहने वाली पिंकी शर्मा ने भगवान श्रीकृष्ण के बालरूप लड्डू गोपाल से विवाह रचा कर अपनी जिंदगी ‘कन्हैया’ को समर्पित करने का फैसला कर लिया।अद्भुत आस्था से भरी इस शादी में कान्हा की बारात गांव पहुंची, स्वागत द्वार सजा, शंखनाद हुआ, भजन गूंजे और परिजनों तथा ग्रामीणों की मौजूदगी में वरमाला से लेकर फेरे और विदाई तक सभी रस्में निभाई गईं।गांव में पहली बार हुई यह अनोखी शादी जितनी अनूठी थी, उतनी ही श्रद्धा और भावनाओं से भरी भी। पिंकी के पिता सुरेश चंद्र शर्मा ने पूर्ण हृदय से इस आध्यात्मिक निर्णय को स्वीकार करते हुए बेटी को “कन्हैया की दुल्हन” मान लिया।“

अब जो भी हूँ, सब बिहारी जी की हूँ”—

पिंकी की भावनात्मक कहानीPG तक पढ़ाई कर चुकीं पिंकी शर्मा बचपन से ही अत्यंत धार्मिक रहीं।परिवार के अनुसार, पिंकी का मन हमेशा मथुरा-वृंदावन में ही रमता था।प्रति माह दो—दो बार वृंदावन जाना उनकी दिनचर्या बन गया था।मीडिया से बात करते हुए पिंकी ने कहा—वृंदावन मंदिर में एक दिन मुझे ऐसा लगा जैसे बिहारी जी ने मुझे चुन लिया है।उस पल के बाद मैं समझ गई कि मेरा जीवन अब उन्हीं को समर्पित है।”

पिंकी बताती हैं कि बांके बिहारी मंदिर में एक दिव्य घटना ने उनके हृदय में यह भाव स्थायी कर दिया।मंदिर के पुजारी ने प्रसाद उनके आंचल में डाला, जिसके भीतर एक सोने की अंगूठी निकली।पिंकी ने इसे “कन्हैया जी की निशानी” मानते हुए परिवार से साफ कह दिया—

मेरी शादी अब केवल बिहारी जी से ही होगी, किसी मनुष्य से नहीं।”बीमारी, तपस्या और चमत्कार—गंभीर हालत में कन्हैया की मूर्ति उठाकर की वृंदावन परिक्रमा**कुछ समय बाद पिंकी अचानक गंभीर रूप से बीमार हो गईं।परंतु इसी बीमारी के दौरान उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया, जिसने परिवार को चकित कर दिया—

उन्होंने लड्डू गोपाल की भारी विग्रह मूर्ति को गोद में लेकर वृंदावन और गोवर्धन की परिक्रमा करने की ठान ली।परिजनों के लाख रोकने के बाद भी पिंकी नहीं रुकीं।चमत्कारिक रूप से—

उन्होंने संपूर्ण वृंदावन परिक्रमा पूरी की गोवर्धन की परिक्रमा भी कीऔर लौटते-लौटते उनकी तबीयत पूरी तरह ठीक हो गई परिवार के अनुसार, इसी घटना ने पिंकी के भीतर कन्हैया के प्रति समर्पण को अटूट बना दिया।परंपरा और आस्था का संगम—बारात से विदाई तकगांव में विवाह की तैयारियाँ कई दिनों तक चलीं।पंडितों ने वेदिक विधि-विधान के साथ विवाह मुहूर्त निकाला।बारात आगमन लड्डू गोपाल का विग्रह दूल्हे के रूप में सुसज्जित भजन-कीर्तन की धुन

महिलाएँ मंगलगीत गाती हुईं ग्रामीणों का उत्साह देखते ही बनता था वरमाला मंच पर पिंकी ने लड्डू गोपाल को वरमाला पहनाई और पूरा पंडाल “जय कन्हैया लाल की” के जयकारों से गूँज उठाना। फेरे विवाह मंडप में अग्नि प्रज्वलित की गई और पिंकी ने एक-एक फेरा लेकर अपने जीवन को प्रभु श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित किया।

विदाईअंत में पारंपरिक विदाई की रस्म भी निभाई गई, और ग्रामीणों ने इसे “आस्था की अनूठी मिसाल” बताया।पिता ने संपत्ति में हिस्सा भी दिया—“

पिंकी अब मेरी नहीं, कन्हैया की बेटी है”पिंकी के पिता सुरेश चंद्र शर्मा ने घोषणा की कि—बेटी को बेटों की तरह संपत्ति और जमीन में पूरा हिस्सा दिया जाएगा।अब उसका भविष्य कन्हैया जी की कृपा से सुरक्षित है।”उन्होंने सोने की अंगूठी वाली घटना और बीमारी में हुए चमत्कार को “दैवी संकेत” बताया।

गांव में चर्चा का विषय—आस्था या मन की गरिमा?

पिंकी की इस अनोखी शादी को लेकर गांव में मतभेद नहीं, बल्कि मिश्रित उत्सुकता दिखाई दे रही है।कुछ लोग इसे अद्भुत आध्यात्मिक प्रेम बता रहे हैं, तो कुछ लोग इसे अत्यधिक भक्ति का रूप कह रहे हैं।हालांकि, गांव के ज्यादातर लोग पिंकी की भक्ति और उनके दृढ़ संकल्प की सराहना कर रहे हैं।

निष्कर्ष

जब आस्था जीवन का मार्ग बन जाएं पिंकी शर्मा की कहानी आस्था की गहराई, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आध्यात्मिक समर्पण का अनोखा मिश्रण है।जहां आधुनिक समाज विवाह में व्यवहारिकता को महत्व देता है, वहीं पिंकी ने अपने जीवन को ईश्वर की भक्ति में विलीन करने का रास्ता चुना है।उनकी इस अनोखी शादी ने यह संदेश दिया है कि—

मनुष्य की आस्था जब ‘भक्ति’ बन जाती है, तब वह सामाजिक परिभाषाओं से ऊपर उठकर जीवन का अपना मार्ग स्वयं बना लेती है।

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