कांग्रेस नेता की बजरंग दल पर प्रतिबंध की मांग से सियासत गरमाई संगठनों, धर्मगुरुओं और विश्लेषकों की गूंजती प्रतिक्रियाओं के बीच विवाद तेज

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/बेलगावी / बेंगलुरु ,10 दिसंबर

कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर वैचारिक टकराव की आंच तेज हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व विधान परिषद सदस्य बी.के. हरिप्रसाद ने बजरंग दल पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग दोहराते हुए राज्य की राजनीति को नई बहस में धकेल दिया है। हरिप्रसाद ने आरोप लगाया कि “बजरंग दल राज्य में कई अपराधों और हत्याओं में संलिप्त रहा है, और इस पर प्रतिबंध लगाना कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा भी था।”उनके बयान के बाद भाजपा, आरएसएस तथा विभिन्न हिंदू संगठनों ने इसे “राजनीतिक निहित स्वार्थों से प्रेरित” बताया, जबकि राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे कर्नाटक में बढ़ते ध्रुवीकरण से जोड़कर देखा है।कांग्रेस नेता के गंभीर आरोप हरिप्रसाद ने कहा कि कर्नाटक के चिकमगलूर में कुछ दिनों पहले हुई कांग्रेस कार्यकर्ता गणेश गौड़ा की हत्या में “बजरंग दल के कार्यकर्ताओं की भूमिका जांच के दायरे में है।

”उन्होंने कहा—गणेश गौड़ा हमारे समर्पित कार्यकर्ता थे। उन्हें उन लोगों ने मारा जिनकी हिंसक गतिविधियों पर लंबे समय से शिकायतें रही हैं। यह राज्य की शांति के लिए चुनौती है और ऐसे संगठनों पर रोक आवश्यक है।”हरिप्रसाद ने 2016–17 के उदुपी हत्याकांड का उदाहरण देते हुए कहा कि “हिंदू जागरण वेदिके और बजरंग दल जैसे संगठन एक ही धारा से उपजे हैं, और राज्य सरकार को ऐसे तत्वों पर नियंत्रण करना चाहिए।”हिंदू संगठनों का जवाब: ‘हिंदू समाज को बदनाम करने की कोशिश’बयान ने तुरंत हिंदू संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया।बजरंग दल कर्नाटक प्रांत के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा—

राजनीतिक लाभ के लिए हिंदू संगठनों को अपराधी ठहराने की परंपरा कांग्रेस में पुरानी है। बिना अदालत के निर्णय के किसी संगठन को हिंसा का ठप्पा देना लोकतंत्र के खिलाफ है।हिंदू जागरण वेदिके ने कहा कि “कांग्रेस चुनावी वादे के नाम पर हिंदू संगठनों को निशाना बनाकर धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ा रही है।”आरएसएस की प्रतिक्रिया: ‘देशहित की सेवा करने वालों को निशाना बनाना दुखद’आरएसएस से जुड़े एक वरिष्ठ प्रचारक ने नाम न छापने की शर्त पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा—बजरंग दल और ऐसे अन्य संगठन सामाजिक सेवा और राष्ट्रधर्म के काम करते हैं। उनमें यदि कोई व्यक्तिगत स्तर पर अपराध करता है तो कानून कार्रवाई करे, पर सम्पूर्ण संगठन को अपराधी बताना अनुचित, असत्य और राजनीतिक तौर पर प्रेरित है।”उ

न्होंने कहा कि “कर्नाटक सरकार यदि सच में कानून-व्यवस्था सुधारना चाहती है तो उसे निष्पक्षता बरतनी चाहिए, न कि तुष्टिकरण की राजनीति।”हिंदू धर्म गुरुओं की चिंता: ‘राज्य में सामाजिक समरसता सबसे ऊपर’उडुपी के एक प्रतिष्ठित मठाधीश ने कहा—धर्म के नाम पर किसी भी पक्ष का अति-उत्साह समाज को बांट देता है। सरकार और राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे संगठनों पर आरोप लगाने से पहले तथ्य सामने रखें, ताकि राज्य में भाईचारा कायम रहे।”

कुछ धर्मगुरुओं ने यह भी कहा कि हत्याओं को किसी एक संगठन से जोड़कर देखना “धर्म को राजनीति में खींचने की अनावश्यक कोशिश” है।-

राजनीतिक विश्लेषकों की राय:‘

चुनावी गणित और वैचारिक संघर्ष की नई कड़ी’** प्रख्यात राजनीतिक विश्लेषक डॉ. रामनाथ गुरु का कहना है—कर्नाटक में हिंदू वोट और अल्पसंख्यक वोट—दोनों प्रमुख चुनावी आधार हैं। बजरंग दल का मुद्दा उठाना कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है और कानून-व्यवस्था पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश भी।”उनके अनुसार, मामले के पीछे “मृत कांग्रेस कार्यकर्ता गौड़ा की हत्या से उपजा आक्रोश और विपक्ष की राजनीतिक तैयारी दोनों की भूमिका” है।

शिक्षाविदों की टिप्पणी: ‘युवा मन में कट्टरता से बचना जरूरी’बेंगलुरु सेंट्रल यूनिवर्सिटी के एक वरिष्ठ शिक्षाविद् ने कहा—

आज के माहौल में हिंसक संगठनात्मक राजनीति से सबसे अधिक नुकसान युवाओं को होता है। सरकार का काम संगठनों को प्रतिबंधित करना नहीं, बल्कि शिक्षा, संवाद और विधि-व्यवस्था के माध्यम से समाज में संयम को बढ़ाना है।”सरकार की मुश्किलें और आगे का रास्ता राज्य सरकार ने फिलहाल मामले में कोई औपचारिक कदम नहीं उठाया है, परन्तु सूत्रों के अनुसार, गृह विभाग इस मुद्दे पर रिपोर्ट तैयार कर रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सामाजिक-धार्मिक संगठन पर प्रतिबंध लगाने के लिए ठोस सबूत, विस्तृत जांच और संघवाद संबंधी कानूनी प्रक्रियाएं अनिवार्य होती हैं।

निष्कर्ष

कांग्रेस नेता बी.के. हरिप्रसाद की मांग ने कर्नाटक की राजनीतिक पट्टी को गर्म कर दिया है।जहां एक ओर कांग्रेस इसे “क़ानून-व्यवस्था का सवाल” बता रही है, वहीं हिंदू संगठन और आरएसएस इसे “राजनीतिक दुराग्रह और हिंदू समाज को बदनाम करने की कोशिश” मान रहे हैं।अब सबकी निगाहें राज्य सरकार की अगली कार्रवाई पर टिक गई हैं—

क्या सरकार इस मांग को आगे बढ़ाती है या विवाद को शांत करने के लिए संतुलित कदम उठाती है।

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