बी के झा
NSK

नई दिल्ली,/ चेन्नई, 10 दिसंबर
भारत में न्यायाधीश अलौकिक पदों पर बैठे देवतुल्य माने जाते हैं। वे दूसरों का मूल्यांकन करते हैं, अपने अंतर में झांकने की परंपरा नहीं रखते। लेकिन मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन इस परंपरा के ‘अपवाद’ हैं—इतने बड़े अपवाद कि वे भारतीय न्यायिक इतिहास में पहले जज हैं जिन्होंने खुद अपना रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखकर स्वीकार किया कि—
“मैं इंसान हूं, मशीन नहीं… 75 मामलों में फैसला नहीं लिख सका। यह मेरी असफलता है।”यह ईमानदारी, यह आत्मस्वीकृति, और यह पारदर्शिता भारतीय न्यायपालिका में दुर्लभ है—लगभग अनुपस्थित। और यही कारण है कि जस्टिस स्वामीनाथन न्यायाधीश कम, एक विचारधारा बन चुके हैं।लेकिन आज यही जज विपक्षी दलों के निशाने पर हैं। वजह?हिंदू परंपरा से जुड़े एक फैसले ने राजनीतिक भूचाल ला दिया है।हिंदू परंपरा पर फैसला और राजनीति की आग1 दिसंबर के अपने आदेश में जस्टिस स्वामीनाथन ने मदुरै के तिरुपरंकुंड्रम पहाड़ी पर स्थित विवादित स्थल पर कार्तिगई दीपम परंपरा को पुनर्जीवित करने का आदेश दिया।
जहां एक ओर मुस्लिम दरगाह मौजूद है, वहीं दूसरी ओर हिंदू मंदिर।उनका आदेश था—“धर्म-सांस्कृतिक निरंतरता को राज्य प्रशासनिक कारणों से नहीं रोक सकता।”यहीं से राजनीति में भूचाल मच गया।डीएमके, कांग्रेस, सपा सहित 107 सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग का नोटिस दे दिया।
आरोप लगे—पक्षपात सांप्रदायिक झुकाव विशेष विचारधारा के प्रति निष्ठा लेकिन सवाल बड़ा है—क्या एक पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाज को बहाल करने का आदेश जज को ‘साम्प्रदायिक’ बना देता है?
राजनीतिक विश्लेषण : विपक्ष क्यों परेशान?एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक का सटीक विश्लेषण—“जस्टिस स्वामीनाथन ने हिंदुओं के सदियों पुराने अधिकार को बहाल किया। विपक्ष मुस्लिम वोटबैंक को खोने से डर गया… इसलिए एक जज को ही ‘बलि का बकरा’ बना दिया गया।”विपक्ष हमेशा न्यायपालिका की स्वतंत्रता की बात करता है,लेकिन जब कोई जज हिंदू परंपराओं के पक्ष में खड़ा हुआ—तो अचानक वही विपक्ष न्यायपालिका की “धर्मनिरपेक्षता” की दुहाई देने लगा।
यही विरोधाभास राजनीतिक मंसूबों को उजागर करता है।कानूनी विशेषज्ञों का मत : क्या महाभियोग जायज़ है?कानून विशेषज्ञों की बड़ी दलीलें—
1. जज धर्म का नहीं, कानून का अनुकरण करते हैं।अगर परंपरा वैध है, और प्रशासन बिना कारण रोक रहा है, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
2. महाभियोग का आधार बेहद कमजोर है।ना तो भ्रष्टाचारना व्यक्तिगत लाभना किसी मामले में अनुचित प्रभावसिर्फ एक विवादित फैसला—जो सिर्फ हिंदू धर्म के संदर्भ में आया—क्या वही महाभियोग के लिए पर्याप्त है?
3. यह महाभियोग न्यायपालिका को ‘डराने’ का प्रयास हो सकता है।ताकि आगे कोई जज धार्मिक या सांस्कृतिक संवेदनाओं से जुड़े मामलों में खुलकर लिखने की हिम्मत न करे।हिंदू धर्मगुरुओं और संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया हिंदू धर्मगुरुओं का मत स्पष्ट है—
“यह सिर्फ जस्टिस स्वामीनाथन का मामला नहीं…यह भारत की सांस्कृतिक आत्मा पर हमला है।जो हिंदू परंपरा के पक्ष में बोलता है, उसे निशाना बनाया जा रहा है।”विहिप, RSS, कई अखाड़ों और संत समाज ने खुलकर कहा—“एक जज जिसने पारदर्शिता दिखाई, ईमानदारी दिखाई, और हिंदू अधिकार की रक्षा की—
उसे हटाना लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान है।”जूडिशियल परफॉर्मेंस कार्ड : विरले साहस की मिसाल
जस्टिस स्वामीनाथन ने अपने ‘सेल्फ अप्रेज़ल कार्ड’ में जो लिखा, वह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होना चाहिए—75 मामले लंबितदेरी की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति स्वयं को दोषी ठहराया वादियों से माफी मांगी सभी मामलों को डी-रिज़र्व कर दिया किसी जज का यह साहस—
ना सिर्फ ईमानदारी का उदाहरण है,बल्कि एक ऐसी पारदर्शिता का परिचय है जो भारत की न्याय व्यवस्था में शायद पहली और आखिरी बार देखने को मिली।एक व्यापक तस्वीर : EVM – विपक्ष – और हिंदू विमर्श विपक्षी राजनीति का यह भी पैटर्न है—
चुनाव जीतें तो EVM सही चुनाव हारें तो EVM खराब हिंदू परंपराओं पर फैसला आए तो जज साम्प्रदायिकअल्पसंख्यकों पर फैसला हो तो जज ‘प्रगतिशील’यही दोहरा मापदंड आज भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी समस्या है।एक राजनीतिक विशेषज्ञ ने तीखा तंज किया—“
जो दल EVM में हेराफेरी का आरोप लगाते हैं, वही दल एक ईमानदार जज को हटाने के लिए एकजुट हो जाते हैं। असल समस्या हिंदू विरोधी मानसिकता है।
निष्कर्ष :
जस्टिस स्वामीनाथन—एक जज से बढ़कर, एक विचारजसटिस स्वामीनाथन का मामला सिर्फ एक न्यायाधीश का मामला नहीं।यह भारत की राजनीति, न्यायपालिका, धर्म और समाज—चारों स्तंभों की गहराई में उतरने वाला प्रश्न है।क्या हिंदू परंपरा की रक्षा करना अपराध है?क्या एक ईमानदार जज “राजनीतिक शिकार” बन गया है?
क्या न्यायपालिका की स्वतंत्रता राजनीति के हाथों गिरवी रखी जा रही है?एक बात स्पष्ट है—
जस्टिस स्वामीनाथन ने न्यायपालिका के नाम में एक ईमानदार, निर्भीक और सांस्कृतिक रूप से सजग अध्याय जोड़ दिया है।
अब इतिहास तय करेगा कि यह अध्याय ‘प्रेरणा’ बनेगा या ‘चेतावनी।
