बी. के. झा
NSK


खटीमा (उत्तराखंड) / नई दिल्ली, 14 दिसंबर
उत्तराखंड के सीमांत कस्बे खटीमा में युवक तुषार शर्मा की चाकू गोदकर हत्या के बाद उपजा जनाक्रोश, आगजनी और पांच घंटे तक चला बवाल आखिरकार पुलिस एनकाउंटर तक जा पहुंचा। हत्या के मुख्य आरोपी हाशिम झनकट को पुलिस ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया है। उसके पैर में गोली लगी है और उसे रुद्रपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई, जब पूरा इलाका तनाव, अविश्वास और सांप्रदायिक उकसावे की आशंकाओं से घिरा हुआ है।
हत्या से उपद्रव तक
शुक्रवार देर रात रोडवेज बस स्टेशन के पास दो पक्षों के बीच पुरानी रंजिश के चलते चाकूबाजी हुई थी। इसमें तुषार शर्मा की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि सलमान और अभय गंभीर रूप से घायल हो गए। जैसे ही यह खबर फैली, शनिवार सुबह से ही शहर में आक्रोश भड़क उठा। परिजन और स्थानीय लोग सड़कों पर उतर आए।सुबह करीब नौ बजे शुरू हुआ विरोध देखते ही देखते उग्र हो गया। टनकपुर रोड, पुरानी तहसील रोड और मुख्य चौक पर दुकानों के शटर गिरने लगे। आक्रोशित भीड़ ने आरोपी के पिता के चाय के खोखे में आग लगा दी, जिसे फायर ब्रिगेड ने काबू में किया। कुछ स्थानों पर दुकानों में तोड़फोड़ हुई, वाहनों के शीशे तोड़े गए और ई-रिक्शा पलटने की कोशिश तक की गई।
जामा मस्जिद के बाहर तनाव दोपहर होते-होते हालात और गंभीर हो गए। जामा मस्जिद के बाहर कुछ लोग सड़क पर बैठकर जाम लगाने लगे। पुलिस द्वारा समझाने के बावजूद भीड़ नहीं मानी, जिसके बाद लाठीचार्ज कर भीड़ को तितर-बितर करना पड़ा। करीब पांच घंटे तक चले इस बवाल के बाद स्थिति पर काबू पाया जा सका।
प्रशासन ने मामले को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिशों को देखते हुए शहर में भारी पुलिस बल तैनात किया और मुख्य चौक के 200 मीटर के दायरे में धारा 163 लागू कर दी।
पुलिस एनकाउंटर और प्रशासन की दलील
रविवार को पुलिस को सूचना मिली कि मुख्य आरोपी हाशिम झनकट एक ईंट भट्टे में छिपा है। जब पुलिस टीम वहां पहुंची तो आरोपी ने भागने की कोशिश की। इसी दौरान हुई मुठभेड़ में उसके पैर में गोली लगी। पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई। आरोपी को हिरासत में लेकर इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, खटीमा की घटना केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि राज्य की सामाजिक नब्ज से जुड़ा प्रश्न बन चुकी है। एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक, “ऐसे मामलों में त्वरित न्याय और पारदर्शी कार्रवाई जरूरी है, वरना जनाक्रोश राजनीतिक और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का रूप ले लेता है। एनकाउंटर से तात्कालिक संतोष मिल सकता है, लेकिन दीर्घकालीन समाधान न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से ही आएगा।”
शिक्षाविदों की चेतावनी
शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों ने आगजनी और भीड़ की हिंसा को चिंताजनक बताया है। एक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर का कहना है,
“भीड़ का न्याय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। किसी भी अपराध के खिलाफ गुस्सा स्वाभाविक है, लेकिन कानून को हाथ में लेना सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करता है।” उन्होंने सोशल मीडिया और अफवाहों की भूमिका पर भी सवाल उठाए।
हिंदू संगठनों और धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया
हिंदू संगठनों और धर्मगुरुओं ने तुषार की हत्या को ‘सामाजिक असुरक्षा’ से जोड़ा है। एक प्रमुख हिंदू संगठन के नेता ने कहा, “निर्दोष युवक की हत्या ने समाज को झकझोर दिया है। सरकार को यह संदेश देना होगा कि अपराधी चाहे कोई भी हो, उसे कठोरतम सजा मिले।” कुछ धर्मगुरुओं ने संयम की अपील करते हुए कहा कि न्याय की लड़ाई कानून के दायरे में रहकर ही लड़ी जानी चाहिए।
विपक्ष का हमला
विपक्षी दलों ने सरकार और पुलिस प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया है। विपक्ष का आरोप है कि राज्य में कानून-व्यवस्था चरमराई हुई है और एनकाउंटर संस्कृति न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकती।
एक विपक्षी नेता ने कहा, “सरकार को यह बताना होगा कि यदि कानून व्यवस्था मजबूत होती, तो हत्या के बाद शहर को पांच घंटे तक आग में झोंका जाने की नौबत क्यों आती?”
निष्कर्ष:
एक कस्बा, कई सवाल खटीमा की यह घटना सिर्फ एक हत्या या एक एनकाउंटर की कहानी नहीं है। यह उस सामाजिक तनाव, राजनीतिक संवेदनशीलता और प्रशासनिक चुनौती का आईना है, जहां न्याय में देरी, अफवाहें और भावनात्मक उबाल मिलकर पूरे शहर को हिंसा की ओर धकेल देते हैं। अब सवाल यह है कि क्या तुषार को न्याय मिलेगा, क्या दोषियों को कानून के मुताबिक सजा मिलेगी—
और क्या खटीमा फिर से शांति की ओर लौट पाएगा ?
