मुफ्त बिजली की राजनीति: केजरीवाल से भी आगे रेखा गुप्ता सरकार, सब्सिडी बिल 4,000 करोड़ पार

बी के झा

NSK

नई दिल्ली , 15 दिसंबर

दिल्ली की राजनीति में मुफ्त बिजली अब केवल कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि सरकारी खजाने की सबसे बड़ी परीक्षा बनती जा रही है। कभी आम आदमी पार्टी (AAP) की पहचान रही इस योजना पर अब रेखा गुप्ता सरकार का खर्च खुद अरविंद केजरीवाल सरकार के दौर को भी पीछे छोड़ता दिख रहा है। ताज़ा अनुमान बताते हैं कि 2025–26 में बिजली सब्सिडी का बिल 4,000 करोड़ रुपये के पार जा सकता है—

जो दिल्ली सरकार के लिए अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा होगा।बजट से बाहर जाती सब्सिडीटाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए 3,849 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था—

जो 2024–25 के मुकाबले 250 करोड़ रुपये ज्यादा है।लेकिन यह भी नाकाफी साबित हो रहा है।बिजली विभाग ने अब 361 करोड़ रुपये अतिरिक्त की मांग सरकार के सामने रखी है। अधिकारियों के मुताबिक,मुफ्त बिजली योजना के लाभार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है,और बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को किए जाने वाले भुगतान का दबाव भी बढ़ता जा रहा है।संभावना जताई जा रही है कि दिल्ली विधानसभा के शीतकालीन सत्र में संशोधित बजट लाया जा सकता है।एक दशक में तीन गुना खर्च मुफ्त बिजली योजना की शुरुआत 2015–16 में AAP सरकार ने की थी। तब—बिजली उपभोक्ता: 52.62 लाखसब्सिडी खर्च: 1,442 करोड़ रुपये

आज तस्वीर बदल चुकी है—उपभोक्ता: करीब 69 लाखसब्सिडी खर्च: तीन गुना से ज्यादाअधिकारियों का अनुमान: इस साल 4,200 करोड़ रुपये तक खर्च यानी, योजना जितनी लोकप्रिय हुई, उतनी ही महंगी भी।योजना का गणित दिल्ली के कुल बिजली उपभोक्ताओं में से 83% घरेलू हैं।

योजना का ढांचा कुछ यूं है—200 यूनिट तक: पूरा बिल माफ (जीरो बिल)201–400 यूनिट: 50% सब्सिडी (अधिकतम ₹800)400 यूनिट से ऊपर: पूरा बिल उपभोक्ता देता है सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सर्दियों में जीरो बिल वाले उपभोक्ताओं की संख्या तेजी से बढ़ी है—

दिसंबर 2022: 31 लाख

दिसंबर 2023: 42 लाख

दिसंबर 2024: 45 लाख

यानी हर सर्दी सरकार पर बोझ और बढ़ता जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषण:

लोकप्रियता बनाम स्थिरता

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, मुफ्त बिजली अब वेलफेयर से वोट बैंक पॉलिटिक्स का प्रतीक बन चुकी है।

एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं—दिल्ली में मुफ्त बिजली कोई भी सरकार खत्म नहीं कर सकती। फर्क बस इतना है कि पहले इसे AAP की पहचान माना जाता था, अब भाजपा सरकार भी उसी रास्ते पर और उससे आगे जाती दिख रही है।

सवाल यह है कि क्या यह मॉडल आर्थिक रूप से टिकाऊ है?

विश्लेषकों का मानना है कि बढ़ती सब्सिडी भविष्य में स्वास्थ्य, शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों के बजट पर असर डाल सकती है।

विपक्ष का हमला: ‘

नाम बदला, नीति वही’AAP ने भाजपा सरकार पर सीधा हमला बोला है।पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा—भाजपा चुनाव से पहले मुफ्त योजनाओं को कोसती थी, और सत्ता में आते ही उसी नीति को और बड़े पैमाने पर लागू कर रही है। फर्क बस इतना है कि अब खर्च का बोझ जनता पर टैक्स या कटौती के रूप में डाला जाएगा।”

कांग्रेस ने भी सवाल उठाया कि बढ़ती सब्सिडी का पैसा आखिर कहां से आएगा और क्या इससे दिल्ली का वित्तीय संतुलन बिगड़ेगा।सरकार का पक्ष: ‘गरीब और मिडिल क्लास को राहत’सरकार समर्थक सूत्रों का कहना है कि यह खर्च निवेश नहीं, सामाजिक राहत है।

एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक—महंगाई के दौर में मुफ्त बिजली से गरीब और मध्यम वर्ग को सीधी राहत मिलती है। बिजली पर खर्च बचने से लोगों की क्रय शक्ति बढ़ती है, जो अर्थव्यवस्था के लिए भी फायदेमंद है।

निष्कर्ष:

सियासत से आगे की चुनौती

रेखा गुप्ता सरकार का बढ़ता बिजली सब्सिडी बिल यह साफ करता है कि दिल्ली में मुफ्त बिजली अब राजनीतिक मजबूरी बन चुकी है।लेकिन सवाल यह है—

क्या यह मॉडल लंबे समय तक चलेगा,या किसी दिन सरकार को कड़वा फैसला लेना पड़ेगा?फिलहाल इतना तय है कि मुफ्त बिजली की इस रेस में रेखा गुप्ता सरकार, केजरीवाल सरकार से भी आगे निकल चुकी है—

खर्च के मामले में।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *