बी के झा
NSK




ढाका/नई दिल्ली, 18 दिसंबर
भारत के ‘सेवन सिस्टर्स’ राज्यों को अलग करने की धमकी के बाद अब बांग्लादेश की राजनीति में भारत-विरोध खुलकर सामने आने लगा है। बांग्लादेश की नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) के सदर्न चीफ़ ऑर्गेनाइज़र हसनत अब्दुल्लाह द्वारा भारतीय उच्चायुक्त को देश से बाहर निकालने की मांग ने न केवल द्विपक्षीय रिश्तों को झकझोर दिया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या बांग्लादेश में आगामी चुनाव राष्ट्रवाद, कट्टरपंथ और भारत-विरोध के सहारे लड़े जा रहे हैं?
इस पूरे घटनाक्रम ने 1971 के मुक्ति युद्ध की व्याख्या, शेख़ हसीना के बाद की सत्ता-संरचना, और दक्षिण एशिया की सुरक्षा परिदृश्य को फिर से बहस के केंद्र में ला दिया है।चुनावी राजनीति और भारत-विरोध का उभार एनसीपी नेता हसनत अब्दुल्लाह का बयान ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश में फ़रवरी में आम चुनाव होने हैं और राजनीतिक दल जनभावनाओं को उकसाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।
कुमिल्ला की जनसभा में भारतीय उच्चायुक्त को निष्कासित करने की मांग केवल कूटनीतिक मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत-विरोध अब चुनावी पूंजी बनता जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. मुनीरुल इस्लाम मानते हैं—बांग्लादेश की राजनीति में जब भी आंतरिक अस्थिरता बढ़ती है, भारत को खलनायक बना दिया जाता है। यह आसान रास्ता है, लेकिन खतरनाक भी।”अंतरिम सरकार और मोहम्मद यूनुस पर सवाल
बांग्लादेश ओपन यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर आरिफ़ा रहमान रूमा का आरोप गंभीर है—कि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार कट्टरपंथी ताक़तों पर निर्भर होती जा रही है। उनके अनुसार,जिस देश में कोई नेता सार्वजनिक मंच से किसी पड़ोसी देश के उच्चायुक्त को निकालने की बात कर सके, वहाँ राज्य की संस्थागत मर्यादाएं ढह चुकी हैं।”
शेख़ हसीना के बेटे सजीब वाज़ीद जॉय ने भी चेताया है कि बांग्लादेश फिर से 2001–2006 के उस दौर की ओर लौट सकता है, जब देश भारत-विरोधी और आतंकवादी गतिविधियों का अड्डा बन गया था।
1971 की विरासत पर नई बहस बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन द्वारा 1971 की जंग में भारत की भूमिका पर सवाल उठाना केवल ऐतिहासिक बहस नहीं, बल्कि एक राजनीतिक पुनर्लेखन (Political Rewriting) की कोशिश मानी जा रही है।इतिहासकार और शिक्षाविद प्रो. रहमान सोभान साफ़ कहते हैं—
जुलाई 2024 का आंदोलन लोकतांत्रिक असफलताओं के खिलाफ़ था, लेकिन मुक्ति युद्ध विरोधी ताक़तों ने उसमें घुसपैठ कर ली। अब वे 1971 में अपनी भूमिका को ‘सफ़ेद’ करने की कोशिश कर रहे हैं।
हिंदू संगठन और धर्म गुरुओं की प्रतिक्रिया भारत के कई हिंदू संगठनों ने बांग्लादेश में बढ़ते भारत-विरोध और अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है।एक प्रमुख हिंदू संगठन के प्रवक्ता ने कहा—1971 में भारत ने केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय आधार पर हस्तक्षेप किया था। आज उसी इतिहास को नकारना नैतिक कृतघ्नता है।
”एक वरिष्ठ हिंदू धर्म गुरु ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा—जो शक्तियां मुक्ति युद्ध के प्रतीकों को मिटा रही हैं, वे केवल भारत नहीं, बांग्लादेश की आत्मा से भी युद्ध कर रही हैं।
”रक्षा विशेषज्ञ:
भारत की सुरक्षा पर असर भारतीय रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल (से.नि.) आर.के. मेहता मानते हैं कि—्
अगर बांग्लादेश में कट्टरपंथी और पाकिस्तान समर्थक ताक़तें मज़बूत होती हैं, तो पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा।”उनके अनुसार,सेवन सिस्टर्स को लेकर बयान सिर्फ़ बयान नहीं हैं, यह एक साइकोलॉजिकल वॉरफेयर का हिस्सा है।”
भारतीय विदेश मंत्रालय का संतुलित रुख
भारत ने अब तक संयम दिखाया है। विदेश मंत्रालय ने साफ़ कहा है कि—बांग्लादेश में कुछ कट्टरपंथी तत्व झूठा विमर्श फैला रहे हैं, जिनका कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया गया है।”पूर्व राजनयिक तलमीज़ अहमद के अनुसार—भारत जानता है कि बांग्लादेश की जनता और बांग्लादेश की राजनीति अलग चीज़ें हैं। इसलिए प्रतिक्रिया नपी-तुली है।
”निष्कर्ष:
दक्षिण एशिया के लिए चेतावनी बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह केवल एक देश की आंतरिक राजनीति नहीं है।
यह—1971 की ऐतिहासिक स्मृति दक्षिण एशिया की सुरक्षा और भारत की पड़ोसी नीति तीनों को प्रभावित कर रहा है।अगर भारत-विरोध, कट्टरपंथ और इतिहास का पुनर्लेखन बांग्लादेश की राजनीति का मुख्य स्वर बनता गया, तो इसका असर केवल दिल्ली–ढाका रिश्तों तक सीमित नहीं रहेगा।
यह क्षण चेतावनी का है—भारत के लिए भी और बांग्लादेश के विवेकशील समाज के लिए भी।
