बी के झा
NSK

पटना, 18 दिसंबर
पटना की सड़कों पर ढोल-नगाड़ों की गूंज, कार्यकर्ताओं के हाथों में भगवा झंडे और रथ पर सवार एक अनुभवी नेता—बिहार भारतीय जनता पार्टी ने नए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में संजय सरावगी का जिस भव्यता से स्वागत किया, वह सिर्फ़ औपचारिक सत्ता-हस्तांतरण नहीं था, बल्कि 2025 की सियासत का स्पष्ट संकेत भी था। दरभंगा से लेकर पटना तक निकला रोड शो यह बताने के लिए काफ़ी था कि पार्टी नेतृत्व इस बदलाव को “संगठनात्मक रीसेट” के रूप में देख रहा है।अनुभव और संगठन का संगम
56 वर्षीय संजय सरावगी, जो लगातार पांच बार दरभंगा से विधायक रहे हैं और राज्य सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं, को मिथिला क्षेत्र में भाजपा का मजबूत चेहरा माना जाता है। दिलीप जायसवाल से प्रभार लेते हुए उन्होंने अपने पहले ही वक्तव्य में स्पष्ट कर दिया—“संगठन और कार्यकर्ता सर्वोपरि हैं।” यह कथन आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी की प्राथमिकताओं की झलक देता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह नियुक्ति केवल चेहरे का बदलाव नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और जमीनी पकड़ को मजबूत करने की रणनीति है। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रो. (डॉ.) अरुण कुमार मानते हैं,सरावगी का चयन मिथिला और उत्तरी बिहार के सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों को साधने का प्रयास है। वह संगठन और सरकार—दोनों की कार्यशैली को समझते हैं।”संगठन में नई ऊर्जा या पुरानी रणनीति?
प्रदेश कार्यालय में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, विजय सिन्हा सहित कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी यह दर्शाती है कि पार्टी नेतृत्व इस बदलाव को सामूहिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है।
शिक्षाविद और चुनावी राजनीति के अध्येता डॉ. नीलम रंजन के मुताबिक,बीजेपी बिहार में अब ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ के दौर में है। संजय सरावगी जैसे अनुभवी नेता से अपेक्षा है कि वह बूथ स्तर तक संगठन को चुस्त करें।”
विपक्ष की प्रतिक्रिया: ‘पुरानी बोतल, नया लेबल’विपक्षी दलों ने इस नियुक्ति पर तंज कसने में देर नहीं लगाई। राजद के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि,बीजेपी चेहरे बदलती है, नीतियां नहीं। बिहार की जनता बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर जवाब चाहती है, रथ और रोड शो पर नहीं।”
वहीं कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भाजपा संगठनात्मक बदलावों से असली सवालों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।सियासी संकेत और आगे की राह संजय सरावगी का छात्र राजनीति से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक का सफर भाजपा की “कैडर आधारित राजनीति” का उदाहरण माना जा रहा है।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि उनकी नियुक्ति से पार्टी को मिथिला क्षेत्र में मजबूती मिलेगी, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब वे सहयोगी दलों के साथ तालमेल और विपक्ष के आक्रामक तेवरों का सामना करेंगे।समापन में, यह कहा जा सकता है कि संजय सरावगी का पदभार ग्रहण करना केवल एक संगठनात्मक घटना नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में आने वाले चुनावी संघर्ष की भूमिका है।
अब देखना यह होगा कि यह नई कमान भाजपा को नई ऊंचाई तक ले जाती है या यह बदलाव सिर्फ़ शक्ति-प्रदर्शन तक ही सीमित रह जाता है।
