बी के झा
NSK

बहराइच/अयोध्या, 19 दिसंबर
अयोध्या हनुमानगढ़ी के महंत और हिंदू सुरक्षा सेवा संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजू दास के ताज़ा बयान ने एक बार फिर आस्था, इतिहास और संवैधानिक मर्यादाओं के बीच खिंची रेखा को बहस के केंद्र में ला दिया है। बहराइच में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि “बाबर जैसे आक्रांताओं के नाम पर मस्जिद बनाने की कोई ज़रूरत नहीं” और यह कि वे “किसी भी कीमत पर बाबरी मस्जिद नहीं बनने देंगे।
उनके बयान में “आक्रांताओं की मजार उखाड़कर फेंक देने” जैसी तीखी पंक्तियाँ भी शामिल रहीं, जिन्हें लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं।महंत राजूदास ने यह भी कहा कि इस्लाम में अनेक महापुरुष हैं—“उनके नाम पर मस्जिद बने तो सहयोग करेंगे”—लेकिन बाबर जैसे ऐतिहासिक पात्रों का महिमा मंडन स्वीकार्य नहीं। बहराइच में उन्होंने महाराजा सुहेलदेव के सम्मान की बात दोहराते हुए स्थानीय इतिहास और स्मृतियों के पुनर्पाठ की मांग रखी।
हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया:
“इतिहास-सम्मान का प्रश्न”कुछ हिंदू संगठनों ने राजूदास के बयान को “ऐतिहासिक अस्मिता की अभिव्यक्ति” बताते हुए समर्थन किया। उनका तर्क है कि आक्रांताओं के प्रतीकों को सार्वजनिक सम्मान देना समाज में विभाजन को बढ़ाता है और स्थानीय नायकों के योगदान को भुला देता है।
एक हिंदू संगठन के पदाधिकारी ने कहा,यह मसला पूजा-स्थल से अधिक स्मृति और सम्मान का है। आस्था के साथ-साथ इतिहास के सत्य पर भी संवाद होना चाहिए।”हालांकि, इन्हीं संगठनों के भीतर से यह स्वर भी उठा कि भाषा संयत होनी चाहिए ताकि सामाजिक सौहार्द प्रभावित न हो।हिंदू धर्मगुरुओं का मत: “वाणी की मर्यादा आवश्यक”कुछ प्रमुख संत-महात्माओं ने राजूदास की भावनाओं को समझने की बात कही, लेकिन उग्र शब्दावली से परहेज़ की सलाह दी।
एक वरिष्ठ धर्मगुरु के अनुसार,धर्म का उद्देश्य समाज को जोड़ना है। इतिहास पर चर्चा हो सकती है, पर आह्वान की भाषा अहिंसक और मर्यादित रहनी चाहिए।”
कानूनविदों की चेतावनी: संविधान सर्वोपरि
”कानूनी विशेषज्ञों ने इस पूरे विवाद में संविधान और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को केंद्रीय बिंदु बताया। अयोध्या मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अंतिम है और पूजा-स्थलों से जुड़े किसी भी नए विवाद पर Places of Worship Act, 1991 लागू होता है।एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा,ऐतिहासिक बहस अकादमिक मंचों पर हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक रूप से ऐसे बयान जो विध्वंस या हिंसा का संकेत दें, वे कानून के दायरे में जांच योग्य हो सकते हैं।”
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया:
आरोप-प्रत्यारोपसत्तारूढ़ दल से जुड़े नेताओं ने बयान से औपचारिक दूरी बनाते हुए कहा कि सरकार कानून और न्यायालय के आदेशों के अनुसार ही चलती है।विपक्षी दलों ने इसे “ध्रुवीकरण की राजनीति” करार दिया। एक विपक्षी नेता ने कहा,देश विकास और रोजगार की बात चाहता है, न कि इतिहास को लेकर भड़काऊ बयान।”
कुछ क्षेत्रीय दलों ने शांति और संवाद की अपील की, यह कहते हुए कि धार्मिक भावनाओं को भुनाने से सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता है।
शिक्षाविदों का विश्लेषण:
“इतिहास बनाम राजनीति”इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का कहना है कि मध्यकालीन इतिहास के पात्रों को आज की राजनीति में प्रतीक बनाना नया नहीं है, लेकिन इससे समकालीन समस्याओं का समाधान नहीं निकलता।एक शिक्षाविद के अनुसार,इतिहास को समझने के लिए संदर्भ और स्रोत चाहिए। राजनीतिक मंचों पर उसे नारे में बदल देना समाज को दो ध्रुवों में बांट देता है।
”निष्कर्ष
महंत राजूदास का बयान उस संवेदनशील रेखा को फिर उजागर करता है जहाँ आस्था, स्मृति और कानून एक-दूसरे से टकराते हैं। एक ओर समर्थक इसे ऐतिहासिक आत्मसम्मान का प्रश्न मानते हैं, दूसरी ओर आलोचक इसे सामाजिक सौहार्द के लिए चुनौती बताते हैं।
स्पष्ट है कि इस मुद्दे पर आगे की राह संयमित संवाद, संवैधानिक मर्यादाओं और न्यायिक निर्णयों के सम्मान से ही निकल सकती है—
वक्योंकि लोकतंत्र में आस्था की अभिव्यक्ति भी कानून की चौखट के भीतर ही टिकाऊ होती है।
