संसद के शोर के बाद संवाद की चाय — सत्ता और विपक्ष की एक मेज़, लोकतंत्र की एक तस्वीर

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 19 दिसंबर

संसद का शीतकालीन सत्र जैसे ही समाप्त हुआ, उसी परिसर में राजनीति का एक दूसरा, अपेक्षाकृत सौम्य और दृश्य उभरा। जहां कुछ घंटे पहले तक लोकसभा और राज्यसभा में हंगामे, नारेबाजी और तीखी बहसें गूंज रही थीं, वहीं सत्र की समाप्ति के बाद ‘चाय पर चर्चा’ ने भारतीय संसदीय लोकतंत्र की एक अलग तस्वीर पेश की—

जहां सत्ता और विपक्ष आमने-सामने नहीं, बल्कि आमने-सामने बैठकर मुस्कुराते नजर आए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, एनसीपी (एसपी) सांसद सुप्रिया सुले, समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव, राजीव राय, डीएमके के ए. राजा और कई केंद्रीय मंत्री—

सभी एक ही मंच पर, एक ही माहौल में दिखाई दिए। यह दृश्य अपने आप में राजनीतिक संदेश था।चाय की मेज़ पर सत्ता और विपक्षी सदस्यों परिसर में आयोजित इस अनौपचारिक बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, नागर विमानन मंत्री राम मोहन नायडू, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान, ललन सिंह, किरण रिजिजू, अर्जुनराम मेघवाल सहित विभिन्न दलों के फ्लोर लीडर मौजूद रहे।

यह कोई औपचारिक बैठक नहीं थी, न कोई एजेंडा तय था—बस संसद के कामकाज, सत्र की कार्यवाही और आगे के रास्तों पर खुली बातचीत।राजनीतिक गलियारों में अक्सर दुर्लभ मानी जाने वाली यह सहजता, कैमरों में भी कैद हुई—जहां मुस्कान थी, हल्की-फुल्की चुहल थी और तीखी बयानबाज़ी का कोई निशान नहीं।

PM मोदी–प्रियंका गांधी संवाद सूत्रों के अनुसार, इस चर्चा का एक दिलचस्प पहलू रहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रियंका गांधी के बीच हुई सौहार्दपूर्ण बातचीत।बताया जा रहा है कि बातचीत का विषय वायनाड रहा—वह संसदीय क्षेत्र जिससे प्रियंका गांधी जुड़ी हैं। यह संवाद न तो राजनीतिक कटाक्ष से भरा था और न ही किसी टकराव से—बल्कि एक सकारात्मक और सहज चर्चा के रूप में देखा गया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार,यह मुलाकात संकेत देती है कि संसद के भीतर संघर्ष अपनी जगह है, लेकिन बाहर संवाद की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।

नए संसद भवन पर भी चर्चा

चाय चर्चा के दौरान सांसदों ने प्रधानमंत्री के सामने एक व्यावहारिक सुझाव भी रखा—

नए संसद भवन में एक समर्पित हॉल की मांग, जहां सांसद अनौपचारिक संवाद कर सकें।इस पर एक वरिष्ठ मंत्री ने पुराने संसद भवन का जिक्र करते हुए कहा कि वहां भी ऐसी व्यवस्था थी, लेकिन उसका इस्तेमाल बहुत सीमित रहा।यह टिप्पणी अपने आप में यह सवाल छोड़ गई कि क्या राजनीतिक संवाद के लिए जगह से ज्यादा ज़रूरत राजनीतिक इच्छाशक्ति की है।

सत्र उपयोगी रहा, लेकिन…सदस्यों ने प्रधानमंत्री को यह भी बताया कि शीतकालीन सत्र काफी उपयोगी रहा, कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुए, लेकिन इसे और आगे बढ़ाया जा सकता था।देर रात तक विधेयकों पर चर्चा और पारित करना आदर्श संसदीय परंपरा नहीं माना जाता—

यह बात भी खुले तौर पर रखी गई।हल्के-फुल्के अंदाज़ में यह भी कहा गया कि विपक्ष के लगातार विरोध प्रदर्शन के चलते सत्र अपेक्षाकृत छोटा रहा।इस पर प्रधानमंत्री ने मुस्कुराते हुए मज़ाकिया जवाब दिया कि मैं विपक्ष की आवाज़ों पर ज्यादा ज़ोर नहीं डालना चाहता था।”यह टिप्पणी सुनकर माहौल और हल्का हो गया।परंपरा, जो संदेश देती है दरअसल, संसद सत्र के समापन के बाद प्रधानमंत्री द्वारा चाय पार्टी आयोजित करने की यह परंपरा नई नहीं है। इसे संसदीय लोकतंत्र में संवाद और सौहार्द का प्रतीक माना जाता है—

एक ऐसा मंच, जहां राजनीतिक मतभेद दरवाज़े के बाहर छोड़ दिए जाते हैं।

हालांकि, पिछले मॉनसून सत्र के बाद हुई चाय पार्टी में कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने हिस्सा नहीं लिया था। उस बहिष्कार को सत्ता-विपक्ष के बीच बढ़ती खाई के संकेत के तौर पर देखा गया था।ऐसे में शीतकालीन सत्र के बाद सभी दलों के नेताओं का एक साथ बैठना राजनीतिक हलकों में एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

लोकतंत्र का दूसरा चेहरा

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चाय चर्चा संसद के उस चेहरे को दिखाती है, जो अक्सर कैमरों से ओझल रहता है।सदन के भीतर टकराव लोकतंत्र की मजबूरी है, लेकिन सदन के बाहर संवाद उसकी मजबूती है।

”शीतकालीन सत्र भले ही हंगामे और तीखी बहसों के लिए याद किया जाए, लेकिन उसके समापन पर हुई यह ‘चाय पर चर्चा’ याद दिलाती है कि भारतीय राजनीति में मतभेद के साथ-साथ मेल-मुलाकात की परंपरा अब भी जीवित है—

और शायद यही लोकतंत्र की असली ताकत है।

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