बी के झा
नई दिल्ली, 19 दिसंबर
राज्यसभा के 269वें सत्र का समापन केवल विधायी आंकड़ों के साथ नहीं, बल्कि संसदीय गरिमा और विरोध की मर्यादा पर एक गंभीर बहस छोड़ गया। शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने विपक्षी सदस्यों के आचरण पर खुली और सख्त टिप्पणी करते हुए साफ शब्दों में कहा कि “व्यवधान संसद सदस्यों की गरिमा के अनुरूप नहीं है।” यह टिप्पणी महज एक औपचारिक असंतोष नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर अनुशासन और संवाद की आवश्यकता पर एक सशक्त संदेश मानी जा रही है।
पहला सत्र, पहली कसौटी
यह सत्र सभापति के रूप में सी. पी. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में आयोजित पहला शीतकालीन सत्र था। सत्र के समापन भाषण में उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने पदभार ग्रहण करते समय सदस्यों से सहयोग की अपेक्षा की थी और अधिकांश समय सदन ने उस अपेक्षा पर खरा उतरने का प्रयास भी किया। इसके बावजूद, ग्रामीण रोजगार गारंटी से जुड़े ‘विकसित भारत–
जी राम जी विधेयक, 2025’ के पारित होने के दौरान जो दृश्य सामने आए—
नारेबाजी, तख्तियां, कागज फाड़ना और आसन के समक्ष फेंकना—उन्हें उन्होंने संसदीय परंपराओं के विरुद्ध बताया।सभापति का यह कथन ऐसे समय आया, जब विधेयक आधी रात के बाद 12 बजकर 35 मिनट तक चली बैठक में पारित हुआ और मनरेगा की जगह नई व्यवस्था के तहत प्रति परिवार गारंटी वाले कार्यदिवसों की संख्या 100 से बढ़ाकर 125 कर दी गई। विपक्ष का विरोध मुख्यतः राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम को योजना से हटाए जाने को लेकर था।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय:
विरोध बनाम अवरोध राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सभापति का वक्तव्य सत्ता और विपक्ष—दोनों के लिए संकेत है। एक वरिष्ठ विश्लेषक के मुताबिक, “लोकतंत्र में विरोध अनिवार्य है, लेकिन जब विरोध अवरोध में बदल जाता है, तो संसद की भूमिका कमजोर पड़ती है।” उनका मानना है कि आधी रात तक चली बैठक और विधेयक पारित होना सरकार की दृढ़ता दर्शाता है, जबकि विपक्ष का आचरण यह सवाल खड़ा करता है कि क्या संसदीय मंच पर प्रभावी विरोध के वैकल्पिक तरीके तलाशे जा रहे हैं।कुछ विश्लेषक इसे नए सभापति की ‘संवैधानिक दृढ़ता’ के रूप में भी देख रहे हैं—
एक ऐसा संदेश कि सदन की गरिमा से समझौता नहीं किया जाएगा, चाहे मुद्दा कितना ही संवेदनशील क्यों न हो।शिक्षाविदों की दृष्टि: संसदीय संस्कृति की परीक्षा संवैधानिक मामलों के जानकार शिक्षाविदों का मानना है कि यह सत्र भारतीय संसदीय संस्कृति के दो चेहरों को उजागर करता है। एक ओर 121 प्रतिशत उत्पादकता, लगभग 92 घंटे की बैठकें और आठ विधेयकों का पारित होना—तो दूसरी ओर व्यवधान और शोरगुल।
एक राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर के अनुसार, “उत्पादकता केवल घंटों और आंकड़ों से नहीं मापी जानी चाहिए, बल्कि बहस की गुणवत्ता और मर्यादा से भी आंकी जानी चाहिए।
”शिक्षाविदों ने यह भी रेखांकित किया कि शून्यकाल में नोटिसों की संख्या में 31 प्रतिशत वृद्धि और प्रतिदिन औसतन 15 से अधिक मामलों का उठाया जाना सांसदों की सक्रियता का संकेत है, लेकिन इस सक्रियता को संस्थागत अनुशासन के साथ जोड़ना समय की मांग है।
उत्पादकता के आंकड़े और लोकतांत्रिक जीवंततासभापति राधाकृष्णन ने सत्र को “अत्यंत उत्पादक” बताते हुए कहा कि पांच दिनों तक बैठक अवधि बढ़ाने और भोजनावकाश छोड़ने जैसे निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर दो दिवसीय चर्चा, चुनाव सुधारों पर तीन दिवसीय बहस और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) संशोधन अधिनियम, 2024 पर 212 सदस्यों की भागीदारी—इन सभी को उन्होंने संसदीय लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण बताया।गैर-सरकारी कामकाज के तहत 59 निजी विधेयकों की प्रस्तुति और नियम 267 को लेकर विस्तृत आदेश जारी होना भी इस सत्र की उल्लेखनीय उपलब्धियों में शामिल रहा।
संवैधानिक पद की गरिमा और भविष्य का संदेश
अपने समापन भाषण में सभापति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सदन के नेता जे. पी. नड्डा और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे का आभार जताया और कहा कि उन्हें मिली शुभकामनाएं उनके लिए प्रेरणा का स्रोत रहीं। साथ ही, उन्होंने उपसभापति, पीठासीन अध्यक्षों, सचिवालय और मीडिया के योगदान को भी रेखांकित किया।
निष्कर्ष
सभापति सी. पी. राधाकृष्णन का पहला शीतकालीन सत्र केवल विधेयकों और बहसों का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि संसदीय मर्यादा की पुनर्स्थापना का प्रयास भी माना जा रहा है। यह सत्र एक स्पष्ट संदेश देता है—
लोकतंत्र में असहमति का सम्मान है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति संसद की गरिमा के भीतर ही होनी चाहिए। आने वाले सत्रों में यही संतुलन भारतीय संसद की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता तय करेगा।
NSK

