बांग्लादेश भारत से चाहता क्या है? चुनाव से पहले उफनता असंतोष, भारत-विरोध की राजनीति और अस्थिर भविष्य की आशंका

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/ढाका, 20 दिसंबर

बांग्लादेश और भारत के संबंध एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां कूटनीति, राजनीति और सड़क की भावनाएं आपस में टकरा रही हैं। अगस्त 2024 में शेख़ हसीना के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद जिस अस्थिरता की आशंका जताई जा रही थी, वह अब फरवरी 2026 में प्रस्तावित चुनाव से पहले खुलकर सामने आ रही है।ढाका में भारतीय उच्चायोग और चटगांव, राजशाही, खुलना व सिलहट स्थित सहायक उच्चायोगों को मिल रही धमकियां, भारत-विरोधी नारों की बढ़ती तीव्रता और राजनीतिक मंचों पर भारत को ‘सुविधाजनक दुश्मन’ के रूप में पेश किया जाना—

ये सब संकेत दे रहे हैं कि बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति अब भारत को केंद्रीय मुद्दा बना चुकी है।एक हत्या, जिसने रिश्तों में ज़हर घोल दिया 12 दिसंबर को 32 वर्षीय शरीफ उस्मान हादी की गोली मारकर हत्या ने हालात को और भड़का दिया। हादी उस आंदोलन से जुड़े थे, जिसने शेख़ हसीना को सत्ता से हटाया था।

सोशल मीडिया पर यह अफवाह तेजी से फैली कि हमलावर भारत भाग गए हैं।हालांकि इस दावे का कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं मिला, लेकिन भीड़ भड़क चुकी थी।भारतीय उच्चायोग के बाहर प्रदर्शन, राजनयिक को देश से निकालने की मांग और वीज़ा सेवाओं का अस्थायी निलंबन—

यह सब बताता है कि राजनीतिक अस्थिरता अब कूटनीतिक संकट में बदल रही है।शेख़ हसीना, प्रत्यर्पण और भारत की दुविधा अंतरिम सरकार, जिसके मुखिया मोहम्मद यूनुस हैं, भारत से शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण की मांग कर रही है।

बांग्लादेश की अदालतों द्वारा उन्हें मौत की सज़ा सुनाए जाने के बाद यह मांग और तेज़ हुई है।भारत ने इस पर स्पष्ट इनकार तो नहीं किया, लेकिन कोई सकारात्मक संकेत भी नहीं दिया।भारतीय विदेश मंत्रालय के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि—यह केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय, राजनीतिक और रणनीतिक फैसला है।

भारत किसी ऐसे कदम से बचेगा, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़े।”

चुनाव और ‘समावेशी लोकतंत्र’ की जंग

भारत ने बांग्लादेश में “स्वतंत्र, निष्पक्ष, समावेशी और विश्वसनीय चुनाव” की वकालत की है।लेकिन ‘समावेशी’ शब्द पर ही विवाद है।अंतरिम सरकार और हसीना-विरोधी खेमे का साफ कहना है कि अवामी लीग को चुनाव से बाहर रखना ही ‘नया लोकतंत्र’ है।

जबकि भारत और कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि—देश की सबसे बड़ी पार्टियों में से एक को बाहर रखकर चुनाव लोकतांत्रिक नहीं हो सकता।”

राजनीतिक विश्लेषक: ‘क्रांति नहीं, सत्ता-रिक्तता

’भारत की पूर्व विदेश सचिव निरूपमा राव और वरिष्ठ पत्रकार स्टैनली जॉनी की टिप्पणियां इस संकट को गहराई से समझने का अवसर देती हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार—शेख़ हसीना कोई आदर्श शासक नहीं थीं लेकिन वे कट्टरपंथी ताकतों के सामने एक दीवार थीं उनके हटने से जो शून्य पैदा हुआ, उसे—

जमात-ए-इस्लामीनए कट्टरपंथी समूहऔर हिंसक भीड़ भरने लगी।

हिन्दू संगठन और धर्मगुरु: ‘अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर संकट’

भारत के कई हिन्दू संगठनों और धर्मगुरुओं ने चिंता जताई है कि बांग्लादेश में—हिन्दुओं अहमदिया मुसलमानोंऔर अवामी लीग समर्थकों पर हमले बढ़े हैं।

एक वरिष्ठ संत का कहना है—जब सत्ता कमज़ोर होती है, सबसे पहले अल्पसंख्यक निशाने पर आते हैं। भारत को इस पर मौन नहीं रहना चाहिए।

”कानूनविद: ‘मौत की सज़ा और दिखावटी न्याय’कानूनी

विशेषज्ञों का मानना है कि—शेख़ हसीना के खिलाफ ट्रायल अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा नहीं उतरता राजनीतिक प्रतिशोध की बू आती है एक संवैधानिक विशेषज्ञ के अनुसार—यह न्याय नहीं, सत्ता परिवर्तन के बाद बदले की राजनीति है।

”रक्षा और सुरक्षा विशेषज्ञ: ‘भारत के लिए रणनीतिक चेतावनी’

भारतीय रक्षा विशेषज्ञों की दृष्टि में बांग्लादेश की अस्थिरता केवल पड़ोसी देश की समस्या नहीं है।यह—पूर्वोत्तर भारतसीमा सुरक्षाऔर कट्टरपंथी नेटवर्क के लिए सीधी चुनौती है।एक पूर्व सैन्य अधिकारी का कहना है—अगर बांग्लादेश में कट्टरपंथ को खुली छूट मिली, तो उसका असर भारत की सुरक्षा पर पड़ेगा।”

बीएनपी और भारत: बदलते संकेत

बीएनपी के सत्ता में आने की संभावना को देखते हुए भारत ने संकेत दिए हैं कि वह संवाद के दरवाज़े खुले रखना चाहता है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ख़ालिदा ज़िया के स्वास्थ्य को लेकर जताई गई संवेदना को इसी रणनीति के तहत देखा जा रहा है।

निष्कर्ष:

चुनाव के बाद आसान नहीं होगा रास्ता

विशेषज्ञों की लगभग सर्वसम्मत राय है कि—फरवरी के चुनाव के बाद भी बांग्लादेश को स्थिरता मिलना आसान नहीं होगा भारत-विरोधी की राजनीति घरेलू विफलताओं को ढकने का औजार बनी रहेगी

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या बांग्लादेश लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है, या वह एक ऐसी अराजकता में प्रवेश कर चुका है, जहां सत्ता तो बदलेगी, लेकिन स्थिरता नहीं आएगी ?

भारत के लिए यह केवल पड़ोसी देश का संकट नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा और भविष्य से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।

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