बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 12 अक्टूबर
कसौली में हुए साहित्यिक कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम के उस बयान ने, जिसमें उन्होंने कहा कि “ऑपरेशन ब्लूस्टार एक गलती थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस गलती की कीमत अपनी जान देकर चुकाई”, कांग्रेस नेतृत्व में बहस और असंतोष की आग लगा दी है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि शीर्ष नेतृत्व इस बात से बेहद नाराज है कि ऐसे वरिष्ठ नेता — जिन्होंने कांग्रेस से सब कुछ पाया है — सार्वजनिक मंचों पर ऐसी टिप्पणियाँ करें, जो पार्टी के लिए शर्मिंदगी का कारण बन सकती हैं।पार्टी नेतृत्व की तीखी नाराज़गी: ‘यह आदत नहीं बननी चाहिए’पार्टी सूत्रों ने रविवार को बताया कि कांग्रेस का मानना है कि वरिष्ठ नेताओं को सार्वजनिक बयान देते समय अधिक सावधानी बरतनी चाहिए।सूत्रों का कहना है, “कांग्रेस से सब कुछ पाने वाले वरिष्ठ नेताओं को पार्टी के लिए शर्मिंदगी पैदा कर सकने वाले बयान देने में सावधानी बरतनी चाहिए। यह आदत नहीं बननी चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि चिदंबरम के बार-बार दिए जा रहे ऐसे बयानों ने पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा कर दिया है।एक वरिष्ठ पार्टी सूत्र ने कहा, “पार्टी का शीर्ष नेतृत्व बहुत नाराज है। पार्टी के सभी कार्यकर्ता इस बात से परेशान हैं कि ऐसा बार-बार क्यों हो रहा है। चिदंबरम ने हाल ही में कुछ ऐसे बयान दिए हैं जिनसे पार्टी को शर्मिंदगी उठानी पड़ी है।”कसौली में क्या कहा था चिदंबरम ने?कसौली में आयोजित खुशवंत सिंह साहित्य महोत्सव में, राज्यसभा सदस्य पी. चिदंबरम ने पत्रकार और लेखिका हरिंदर बावेजा से उनकी पुस्तक ‘दे विल शूट यू मैडम: माई लाइफ थ्रू कॉन्फ्लिक्ट’ पर बातचीत के दौरान कहा —सभी आतंकवादियों को पकड़ने का कोई और तरीका हो सकता था, लेकिन ऑपरेशन ब्लू स्टार एक गलती थी। मैं मानता हूँ कि श्रीमती गांधी ने इस गलती की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। यह सेना, खुफिया विभाग, पुलिस और नागरिक सुरक्षा एजेंसियों का निर्णय था और आप इसके लिए पूरी तरह से श्रीमती गांधी को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते।”यह टिप्पणी राजनीतिक परिदृश्य में संवेदनशील विषय को बहाल कर रही है क्योंकि ऑपरेशन ब्लू स्टार 1984 की वह घटना है जिसने देश को लंबे समय तक विभाजित किया।ऑपरेशन ब्लू स्टार: संक्षिप्त पृष्ठभूमिऑपरेशन ‘ब्लू स्टार’ जून 1984 के बीच अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में चलाया गया सैन्य अभियान था, जिसका उद्देश्य जलांधर के दमदमी टकसाल के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों को वहां से खदेड़ना था। इस अभियान के बाद उसी वर्ष 31 अक्टूबर 1984 को सिख अंगरक्षकों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी थी। यह घटना देश के लिए लंबे समय तक भावनात्मक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनी रही।
कांग्रेस के भीतर प्रतिक्रिया: विभाजन और असहजता
सूत्रों का कहना है कि चिदंबरम के इस बयान से पार्टी के भीतर असहजता और खटास बढ़ गई है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने इसे अनुचित व समयानुकूल न मानते हुए कहा कि चुनावी माहौल में ऐसी टिप्पणियाँ संगठन के पक्ष में नहीं हैं। 10 जनपथ से जुड़े कुछ नेताओं ने इस व्यवहार को “अनुशासनहीनता” तक कहा है और चिंता जताई है कि इससे पार्टी को चुनावी कीमत चुकानी पड़ सकती है।पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि ऐसे वक्तव्य भाजपा के पल्ले प्रभावित कर सकते हैं और विपक्षी बयानबाजी को हवा दे सकते हैं।
चिदंबरम के बयान का राजनीतिक संदर्भ:
चुनावी समय और प्रभाव यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब बिहार में विधानसभा चुनाव का सिलसिला चालू है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पूर्व गृह मंत्री द्वारा हाल में लगातार की गई उन टिप्पणियों — जिनमें कांग्रेस सरकार के कार्यकाल की चुनौतियों और घटनाओं को परत-दर-परत खोलने जैसी बातें शामिल हैं — का चुनावी असर हो सकता है।विश्लेषकों का मानना है कि चिदंबरम की सार्वजनिक अभिव्यक्तियाँ, खासकर जब वे पार्टी की संवेदनशील घटनाओं को दोहराती हैं, तब कांग्रेस और उसके गठबंधन पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं। इससे न केवल कांग्रेस को बल्कि उसके साथ चल रहे विपक्षी गठबंधन को भी बिहार जैसे ज़रूरी चुनावी मोर्चे पर नुकसान उठाना पड़ सकता है।
आर.पी.एन. सिंह और मनीष तिवारी — मिलती-जुलती सहमति, पर पार्टी का रुख कठिन
रिपोर्ट्स के मुताबिक, तत्कालीन मंत्री आर.पी.एन. सिंह ने चिदंबरम के कुछ बयानों को सही ठहराने की प्रवृत्ति दिखाई, जबकि मनीष तिवारी ने दबे जुबान में सहमति जताई। हालांकि, कांग्रेस के गांधी परिवार से निकटस्थ नेताओं और पार्टी के दिग्गजों में इस पर तीव्र असंतोष देखा गया — कुछ ने तो चिदंबरम के बयान को प्रधानमंत्री मोदी के एजेंट कहने तक से इनकार नहीं किया।पार्टी के अंदर यह बहस है कि क्या चिदंबरम सचमुच अतीत की गलतियों की पड़ताल कर रहे हैं या उनका यह रुख चुनावी रणनीति में किसी प्रकार के संदेश का हिस्सा है।विश्लेषण: आत्म-निरीक्षण या आत्म-विनाश का संकेत?राजनीतिक पर्यवेक्षक दो धड़ों में बंटी राय पेश कर रहे हैं — एक तरफ कुछ का मानना है कि चिदंबरम केवल कांग्रेस के अतीत का ‘काला चिट्ठा’ खोलकर सत्य उजागर कर रहे हैं और पार्टी को आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता है; दूसरी तरफ आलोचक कहते हैं कि चुनावी समय में इस तरह की बयानबाजी राजनीतिक आत्म-विनाश की तरह है क्योंकि यह पार्टी के वर्तमान संघर्षों को ध्वस्त करने का कारण बन सकती है।विशेषकर तब जब पार्टी के प्रमुख मुद्दे—बेरोजगारी, महंगाई और स्थानीय प्रत्याशियों की मजबूती—पर ध्यान देने की आवश्यकता है, ऐसे वक्तव्य पार्टी के चुनावी संदेश को बिखेर सकते हैं।
पक्ष और विपक्ष की संभावित हालात में कांग्रेस नेतृत्व के पास विकल्प सीमित हैं — वे या तो सार्वजनिक रूप से चिदंबरम को समझाने और संगठनिक अनुशासन की तरफ लौटाने की कोशिश करेंगे, या फिर यदि बयान पार्टी के लिए अधिक हानिकारक साबित होता है तो अनुशासनात्मक कदमों की तरफ भी विचार कर सकते हैं।भाजपा, जो इस मामले में पहले ही अपना राजनीतिक लाभ तलाश चुकी है, चिदंबरम के बयानों का उपयोग कांग्रेस में दरार दिखाने के लिए कर सकती है। इससे विपक्षी मोर्चे की भूमिका और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
निष्कर्षपी.
चिदंबरम के ताज़ा बयानों ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में असंतोष और नाराज़गी को जन्म दिया है। पार्टी का संदेश साफ़ है — वरिष्ठ नेताओं को सार्वजनिक बयान देते समय संगठन और संवेदनशील ऐतिहासिक घटनाओं को ध्यान में रखते हुए अधिक सतर्क रहना चाहिए।अब यह देखने वाली बात है कि क्या चिदंबरम अपने बयानों पर सफाई देंगे, या पार्टी उच्चस्तर पर उनसे स्पष्टीकरण मांगेगी — और सबसे अहम, इस घटना का बिहार विधानसभा चुनाव सहित आने वाले चुनावी परिदृश्य पर क्या प्रभाव पड़ता है।
