बी के झा
ढाका/नई दिल्ली/कोलकाता, 23 दिसंबर
बांग्लादेश आज केवल राजनीतिक अस्थिरता से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक क्षरण और सभ्यतागत संकट से गुजर रहा है। लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर पड़ने के साथ-साथ जिस चीज़ पर सबसे गहरी चोट पड़ी है, वह है उसकी सनातन शाक्त परंपरा—
वह परंपरा, जिसने इस भूभाग को कभी आर्यावर्त और बंगाल की आत्मा से जोड़ा था।आज उसी बांग्लादेश में स्थित सप्त शक्तिपीठ—जसोरेश्वरी, सुगंधा, भवानी, जयंती, महालक्ष्मी, अपर्णा और स्रवानी—अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं।सिर्फ मंदिर नहीं, सभ्यता की स्मृतियाँ
शिक्षाविदों और इतिहासकारों के अनुसार, ये शक्तिपीठ केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि बंगाली संस्कृति शाक्त तंत्र परंपरा स्त्री-शक्ति की दार्शनिक अवधारणा के जीवंत प्रतीक हैं। दुर्गा सप्तशती, तंत्र चूड़ामणि और शक्ति पीठ स्तोत्र में इनका उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि यह भूभाग सनातन की गहन साधना भूमि रहा है।
राजनीतिक विश्लेषण:
अस्थिरता में सबसे पहले आस्था पर वार
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है—“जब किसी देश में सत्ता अस्थिर होती है, तो चरमपंथी ताकतें सबसे पहले संस्कृति और धार्मिक प्रतीकों को निशाना बनाती हैं।”बांग्लादेश में मंदिरों पर हमले मूर्तियों की तोड़फोड़ पुजारियों को धमकी इसी रणनीति का हिस्सा बताए जा रहे हैं।
1 • जसोरेश्वरी शक्तिपीठ (सतखिरा): जहां सती की हथेली गिरी 51 शक्तिपीठों में से एक, देवी काली को समर्पित यह मंदिर श्यामनगर के ईश्वरपुर गांव में स्थित है।मान्यता: सती की हथेलियां यहां गिरीं 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां स्वर्ण मुकुट अर्पित किया 2024 की अराजकता में वही मुकुट चोरी हो गया हिंदू संगठनों का कहना है—“यह चोरी केवल अपराध नहीं, प्रतीकात्मक अपमान है।”
2• सुगंधा शक्तिपीठ (शिकारपुर): जहां सती की नासिका गिरीं सुनंदा नदी के तट पर स्थित यह शक्तिपीठ देवी उग्रतारा/सुनंदा को समर्पित है।भैरव: त्रियंबकबार-बार मूर्ति लूटअतिक्रमण और स्थानीय संघर्ष शिक्षाविदों के अनुसार,“यह स्थल बांग्लादेश में हिंदू अस्तित्व की आखिरी सांसों का गवाह बनता जा रहा है।
”3• चट्टल भवानी शक्तिपीठ (सीताकुंडा): चंद्रनाथ पर्वत की चोटी यहां देवी सती की ठुड्डी गिरी मानी जाती है।भैरव: चंद्रशेखर धर्मगुरुओं का कहना है—“यह पीठ शाक्त और शैव परंपरा के मिलन का प्रतीक है, इसका नष्ट होना आध्यात्मिक संतुलन तोड़ देगा।्
4• जयंती शक्तिपीठ (कनाईघाट, सिलहट): जहां गिरी बाईं जांघयह पीठ भारत के नर्तियांग (मेघालय) से भी जुड़ी5.90 एकड़ में फैलीआज भी ग्रामीण श्रद्धा का केंद्र कानूनविदों के अनुसार,“इस स्थल की सुरक्षा बांग्लादेश के संविधान में निहित अल्पसंख्यक संरक्षण की कसौटी है।”
5• महालक्ष्मी शक्तिपीठ (सिलहट): जहां गिरी देवी की गर्दनशक्ति पीठ स्तोत्र में वर्णित यह स्थल देवी महालक्ष्मी और भैरव संभरानंद को समर्पित है।पाटरा समुदाय आज भी इसे बचाने में जुटा है।हिंदू धर्मगुरु कहते हैं—“यह पीठ केवल धन नहीं, धर्म और धैर्य का प्रतीक है।”
6• स्रवानी (सर्वाणी) शक्तिपीठ (कुमीरा): रीढ़ की हड्डी का स्थान गुप्त शक्तिपीठों में से एक,यहां देवी को सर्वाणी/श्रावणी कहा जाता है।तंत्र परंपरा के साधक मानते हैं—“यदि यह पीठ नष्ट हुई, तो शाक्त तंत्र की एक पूरी धारा विलुप्त हो जाएगी।”
7• अपर्णा शक्तिपीठ (करतोया–शेरपुर): इतिहास, युद्ध और रानी भवानी यह शक्तिपीठ देवी के टखने/पैर से जुड़ीपाल कालीन राजा प्रण नारायण और रानी भवानी के संघर्षों की साक्षी इतिहासकार बताते हैं—“रानी भवानी केवल धार्मिक नेता नहीं, सामाजिक सुधारक और स्वतंत्रता की अग्रदूत थीं।”
भाजपा-एनडीए और केंद्र सरकार की चिंता
सरकारी सूत्रों के अनुसार,केंद्र सरकार कूटनीतिक स्तर पर स्थिति पर नजर बनाए हुए है।भाजपा-एनडीए नेताओं का कहना है—“यह केवल धार्मिक मुद्दा नहीं, भारत की सभ्यतागत स्मृति का प्रश्न है।”
विपक्षी दलों का सवाल विपक्ष का कहना है—“सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा का मुद्दा और मुखरता से उठाना चाहिए।”
रक्षा विशेषज्ञ: ‘सभ्यता पर हमला, भविष्य की चेतावनी’ रणनीतिक विशेषज्ञ चेताते हैं—“जब पड़ोसी देश में संस्कृति और अल्पसंख्यक निशाने पर होते हैं, तो उसका असर क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ता है।
निष्कर्ष:
मंदिर बचेंगे तो स्मृति बचेगी बांग्लादेश में जलते शक्तिपीठ केवल पत्थर और मूर्तियाँ नहीं—वे उस साझा इतिहास की अंतिम निशानियाँ हैं,जो भारत और बंगाल को जोड़ता है।आज सवाल यह नहीं है कि ये मंदिर बचेंगे या नहीं—
सवाल यह है कि क्या सभ्यता को बचाने की इच्छा अभी जीवित है?
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