बी के झा
नारायणगंज/ढाका, नई दिल्ली, 23 दिसंबर
चूल्हे पर आधा पका चावल, मां की हथेलियों में अभी भी गर्माहट, और घर के बाहर फैला सन्नाटा—यही वह आख़िरी दृश्य था, जब 13 साल की अलिफ़ा अपनी मां नसीमा की नज़रों से ओझल हुई।वह दोबारा कभी लौटकर नहीं आई।अगली सुबह, उसकी नन्ही लाश पड़ोस के दरवाज़े के सामने पड़ी मिली—और उसी पल नारायणगंज के डोरी सोनाकांडा इलाके में रहने वाले एक गरीब परिवार के सपने हमेशा के लिए टूट गए।
“मेरी बच्ची ने लंच भी नहीं किया था…”—मां की चीखद डेली स्टार से बात करते हुए नसीमा की आवाज़ बार-बार टूट जाती है—“मेरी बच्ची ने लंच भी नहीं किया था… उसे मार डाला। जिसने भी यह किया है, मैं उसके लिए मौत की सज़ा चाहती हूं।”नसीमा घर-घर बर्तन धोकर परिवार चलाती हैं।अलिफ़ा उनकी सबसे बड़ी बेटी थी, कक्षा पाँच की छात्रा, जो इसी महीने अपना सालाना इम्तिहान देकर लौटी थी।
30 दिसंबर को उसका रिज़ल्ट आना था—लेकिन अब रिज़ल्ट की जगह पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने ले ली है।रात भर बेटी को ढूंढता रहा पिताअलिफ़ा के पिता मोहम्मद अली, बैटरी रिक्शा चलाते हैं।शाम को घर लौटे तो बेटी के गायब होने की खबर मिली।
वे पूरी रात भटकते रहे—गलियों में मस्जिदों में लाउडस्पीकर से ऐलान करवाया सुबह 3:30 बजे तक उम्मीद ज़िंदा थी।फिर सुबह—पुलिस का फोन आया।पोस्टमार्टम ने खोले भयावह संकेत बंदर थाना प्रभारी गुलाम मुख्तार अशरफ के अनुसार—“चेहरे और गर्दन पर नाखूनों से बने गहरे निशान हैं। प्रथम दृष्टया यौन उत्पीड़न के संकेत मिलते हैं।”
नारायणगंज जनरल हॉस्पिटल के डॉक्टर जहिरुल इस्लाम ने कहा—“हमने सैंपल सुरक्षित रखे हैं। रिपोर्ट आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी।”इलाके की हकीकत: नशा, अपराध और बेखौफ अराजकता स्थानीय लोगों का आरोप है किड्रग डीलरों की बेरोक टोक आवाजाही
CCTV कैमरों की कमी पुलिस गश्त का अभाव ने इस इलाके को अपराधियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बना दिया है।पूर्व महिला पार्षद शेउली नौशाद कहती हैं—“हमने कई बार शिकायत की, लेकिन अपराधी हमें ही धमकाने लगे।”
राजनीतिक विश्लेषण:
यह सिर्फ एक हत्या नहीं
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है—“यह घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि बांग्लादेश में टूटती कानून-व्यवस्था और राज्य की विफलता का प्रतीक है।”उनके अनुसार, हालिया हिंसा के बाद भीड़ हिंसा लिंचिंग यौन अपराध लगातार बढ़े हैं, लेकिन राज्य का जवाब कमजोर रहा है।
शिक्षाविद: ‘बच्चों की सुरक्षा सभ्यता की कसौटी होती है’समाज शास्त्रियों और शिक्षाविदों का कहना है—“जब समाज बच्चों की सुरक्षा नहीं कर पाता, तब वह नैतिक रूप से विफल हो जाता है।”उनका मानना है कि गरीबी + नशा + प्रशासनिक उदासीनता= हिंसा का विस्फोटक मिश्रण
हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया: ‘
चुनिंदा चुप्पी क्यों?’
कुछ हिंदू संगठनों ने सवाल उठाया कि—“जब बांग्लादेश में लगातार मासूम मारे जा रहे हैं, तब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और भारत सरकार की आवाज़ इतनी धीमी क्यों है?”
उन्होंने इसे सभ्यतागत संकट बताया।हिंदू धर्म गुरुओं की पीड़ा धर्मगुरुओं ने कहा—“एक बच्ची की हत्या केवल कानून का विषय नहीं, यह आत्मा को झकझोर देने वाला पाप है।”उनका कहना है कि“राज्य को कठोर उदाहरण पेश करना होगा, नहीं तो यह हिंसा रुकने वाली नहीं।”
कानूनविद: ‘फांसी से पहले तेज़ न्याय ज़रूरी’कानूनी विशेषज्ञों का कहना है—“मौत की सज़ा की मांग भावनात्मक है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है तेज़, पारदर्शी और निष्पक्ष न्याय।”उनका मानना है कि देरी राजनीतिक हस्तक्षेप कमजोर जांचअपराधियों को और साहसी बनाती है।
रक्षा और सुरक्षा विशेषज्ञ: ‘
आंतरिक सुरक्षा संकट’रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार—“यह घटना बांग्लादेश में आंतरिक सुरक्षा के कमजोर होने का संकेत है।”उन्होंने चेताया किन्ना अपराध भीड़ हिंसाअगर ऐसे ही बढ़ी, तो यह केवल कानून-व्यवस्था नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला बन जाएगा।
निष्कर्ष:
अलिफ़ा सिर्फ एक नाम नहीं आरिफ़ा अब सिर्फ एक बच्ची का नाम नहीं—वह सवाल है—राज्य से समाज से राजनीति से उसका अधपका लंच आज भी मां की आंखों में जलता है।और उसका सवाल गूंजता है—“
क्या अगली अलिफ़ा को बचाने के लिए कोई जागेगा?”
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