जी राम जी’ की नई परिभाषा: रोज़गार बढ़ा, बोझ भी बढ़ा, बिहार पर पड़ेगा 2800 करोड़ का अतिरिक्त भार, मजदूरों को मिलेंगे 125 दिन का काम

बी के झा

पटना/नई दिल्ली, 23 दिसंबर

ग्रामीण रोज़गार योजना के इतिहास में एक बड़ा बदलाव करते हुए केंद्र सरकार ने मनरेगा का नाम बदलकर अब“विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन–ग्रामीण (वीबी जीरामजी)” कर दिया है।नाम बदलने के साथ ही योजना की वित्तीय संरचना में भी ऐसा परिवर्तन किया गया है, जिसने बिहार जैसे संसाधन–संकटग्रस्त राज्यों की चिंता बढ़ा दी है।

नई व्यवस्था के तहत बिहार सरकार पर इस योजना का सालाना लगभग 2800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने जा रहा है। हालांकि इसके बदले ग्रामीण मजदूरों को 100 की जगह 125 दिन का रोज़गार मिलेगा—जो सामाजिक सुरक्षा के लिहाज़ से बड़ा बदलाव है।

कैसे बदला खर्च का गणित?

अब तक मनरेगा के तहत मजदूरी मद का 100% खर्च केंद्र सरकार उठाती थी सामग्री मद में केंद्र 75% और राज्य 25% देता था प्रशासनिक खर्च पूरी तरह केंद्र वहन करता था लेकिन नई व्यवस्था में तस्वीर बदल गई है— नई हिस्सेदारी (वीबी जी रामजी)मजदूरी मद: केंद्र 60%, राज्य 40%सामग्री मद: केंद्र 60%, राज्य 40%प्रशासनिक मद: राज्य की हिस्सेदारी पहली बार 40%आंकड़ों में बोझ की कहानी

वित्तीय वर्ष 2024–25 में इस योजना पर कुल खर्च हुआ था 8390 करोड़ रुपये।केंद्र ने दिया था: 7850 करोड़ बिहार सरकार का योगदान: 540 करोड़ नई व्यवस्था लागू होने पर—कुल खर्च वही रहने पर बिहार सरकार को देना होगा: 3355 करोड़ रुपये यानी 540 करोड़ से बढ़कर 3355 करोड़, कुल अतिरिक्त बोझ: लगभग 2815 करोड़ रुपयेये आंकड़े अभी 100 दिन के काम के आधार पर हैं।जब 125 दिन का रोजगार दिया जाएगा, तो खर्च और बढ़ सकता है।

राज्य सरकार की चिंता:

बोझ बढ़ा, पर अवसर भी बिहार सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने कहा—“कृषि कार्य को इस योजना में शामिल करने की हमारी पुरानी मांग रही है। नई व्यवस्था में राज्य पर बोझ बढ़ रहा है, ऐसे में खेती को इससे जोड़ने से किसान और मजदूर—दोनों को लाभ होगा।”उन्होंने बताया कि हाल ही में केंद्रीय मंत्री के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग बैठक में भी यह मुद्दा उठाया गया।

राजनीतिक विश्लेषण: केंद्र–राज्य संबंधों की नई परीक्षा राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार,“यह बदलाव ‘विकसित भारत’ के विज़न के तहत राज्यों को अधिक जिम्मेदारी देने की कोशिश है, लेकिन कमजोर राजस्व वाले राज्यों के लिए यह चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।”

एक वरिष्ठ विश्लेषक कहते हैं—“125 दिन का रोज़गार सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करेगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या बिहार जैसी अर्थव्यवस्था लंबे समय तक इतना बोझ उठा पाएगी?”

शिक्षाविदों की राय:

नाम से ज़्यादा ज़रूरी संरचना अर्थशास्त्र और ग्रामीण विकास के शिक्षाविदों का मानना है कि—“योजना का नाम बदलना प्रतीकात्मक है, असली मुद्दा है वित्तीय संतुलन।”उनका कहना है कि—यदि कृषि कार्य, जल संरक्षण और ग्रामीण परिसंपत्तियों को जोड़ा गया तो यह योजना खर्च नहीं, निवेश साबित हो सकती है लेकिन बिना अतिरिक्त राजस्व स्रोत के राज्यों पर दबाव बढ़ेगा।

विपक्ष का हमला:

‘बोझ का विकेंद्रीकरण’ विपक्षी दलों ने इस बदलाव को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है।राजद और कांग्रेस नेताओं का कहना है—“

केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारी राज्यों पर डाल रही है। नाम बदलकर योजना को ‘विकसित भारत’ का टैग दिया जा रहा है, लेकिन खर्च का बोझ गरीब राज्यों पर डाला जा रहा है।

”विपक्ष का आरोप है कि—“यह वित्तीय संघवाद की भावना के खिलाफ है।”ग्रामीण हकीकत: मजदूरों को राहत, सरकार को चुनौती ग्रामीण इलाकों में मजदूर संगठनों का कहना है कि125 दिन का काम बड़ी राहत है लेकिन भुगतान समय पर और पूरा हो—यह सबसे बड़ी शर्त है वहीं पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि“अगर राज्य पर बोझ बढ़ेगा, तो कहीं न कहीं भुगतान और क्रियान्वयन पर असर पड़ सकता है।

”निष्कर्ष:

राहत और जोखिम—दोनों सातवीं बी जीरामजी के रूप में मनरेगा का नया अवतार एक ओर मजदूरों को अधिक रोज़गार का भरोसा देता है दूसरी ओर बिहार सरकार के सामने वित्तीय संतुलन की बड़ी चुनौती खड़ी करता है अब असली परीक्षा यह होगी कि—

क्या राज्य सरकार अतिरिक्त बोझ के बावजूद योजना को प्रभावी ढंग से चला पाएगी?

और क्या कृषि जैसे क्षेत्रों को जोड़कर इसे आत्मनिर्भर मॉडल बनाया जा सकेगा?

ग्रामीण भारत के लिए यह बदलाव उम्मीद भी है और इम्तिहान भी।

NSK

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