बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 4 जनवरी
इतिहास जब दोहराता है, तो वह हूबहू नहीं लौटता—वह नए चेहरे, नई भाषा और नए कूटनीतिक मुखौटे पहनकर आता है। दक्षिण एशिया आज एक बार फिर ऐसे ही मोड़ पर खड़ा है, जहां पाकिस्तान अपनी खोई हुई प्रासंगिकता को पुनः अर्जित करने के लिए बांग्लादेश को रणनीतिक प्रयोगशाला के रूप में देखने लगा है। सवाल यह नहीं कि पाकिस्तान कोशिश करेगा—सवाल यह है कि बांग्लादेश उस कोशिश को कितनी दूर तक अनुमति देता है।
पाकिस्तान की वापसी का भ्रम
पाकिस्तान में 2025 को कई लोग “रणनीतिक अलगाव के अंत” के रूप में देख रहे हैं। इसके पीछे तीन बड़े कारण गिनाए जा रहे हैं—डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में अचानक आई गर्मजोशी,सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौतों के ज़रिए संबंधों का नया विस्तार,गाजा संकट के बाद पश्चिम एशिया में एक बहुराष्ट्रीय सैन्य ढांचे में पाकिस्तान की संभावित भूमिका।इस कूटनीतिक आत्मविश्वास की नींव मई 2025 की उस आधिकारिक कथा पर टिकी है, जिसमें पाकिस्तान की सेना और सरकार ने दावा किया कि उन्होंने भारत के सामने “सफलतापूर्वक नेतृत्व” किया। यह वैधता वास्तविक हो या गढ़ी हुई—इसने इस्लामाबाद को एक नई महत्वाकांक्षा दे दी है।
बांग्लादेश: अवसर या शिकार?
जुलाई 2024 में बांग्लादेश में आई तथाकथित “मानसून क्रांति” और उसके बाद अवामी लीग सरकार का पतन, पाकिस्तान के लिए एक रणनीतिक खिड़की बन गया। शेख हसीना के 15 साल लंबे शासनकाल में ढाका-इस्लामाबाद संबंध लगभग जमे हुए थे। सत्ता परिवर्तन ने उस जमी बर्फ को तोड़ दिया।2025 में पाकिस्तान के विदेश मंत्री का बांग्लादेश दौरा, सैन्य संपर्क, व्यापारिक बातचीत, सीधी उड़ानों की चर्चा और यहां तक कि बेगम खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में उच्चस्तरीय पाकिस्तानी उपस्थिति—ये सब संकेत हैं कि पाकिस्तान इस रिश्ते को “सामान्य” नहीं, बल्कि रणनीतिक बनाना चाहता है।
पाकिस्तानी नजरिए से यह 1971 के घावों के बावजूद एक बड़ी उपलब्धि है।भारत की चिंता: इतिहास की परछाईंभारत में यह आशंका अनकही नहीं है कि बांग्लादेश कहीं फिर से “पूर्वी पाकिस्तान जैसी स्थिति” की ओर न बढ़ जाए। 2024 की घटनाओं की तीव्रता ने कई विश्लेषकों को 1975 के उस अंधेरे दौर की याद दिलाई, जब शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद बांग्लादेश अस्थिरता के भंवर में चला गया था।
शेख हसीना का लंबा शासन केवल सत्ता नहीं था—वह 1971 की आकांक्षाओं का प्रतीक बन चुका था। भारत-बांग्लादेश व्यापार, कनेक्टिविटी, ऊर्जा और निवेश में जो प्रगति दिखी, वह उसी राजनीतिक स्थिरता का परिणाम थी। उस दिशा से पीछे लौटना भारत के लिए भी एक भयावह रणनीतिक परिदृश्य है।
सीमा नहीं, सभ्यता का सवाल
भारत-बांग्लादेश सीमा कोई साधारण रेखा नहीं है। यह पश्चिम में बाड़ और नियंत्रण रेखा से कहीं अधिक जटिल, मानवीय और संवेदनशील है। यदि रिश्ते शत्रुतापूर्ण होते हैं, तो इसके सुरक्षा, शरणार्थी और सामाजिक प्रभाव दूरगामी होंगे।बांग्लादेश की राजनीति में मौजूद गहरा विभाजन—जिसे अक्सर 1947 की भावना बनाम 1971 की भावना कहा जाता है—को केवल भारत-पाकिस्तान के चश्मे से देखना भूल होगी। धार्मिक राष्ट्रवाद और भाषाई राष्ट्रवाद की यह लड़ाई मूलतः स्वदेशी है, लेकिन बाहरी शक्तियां इसे अपने हित में मोड़ने को तत्पर रहती हैं।
अल्पसंख्यक, चुनाव और असहज यथार्थ
हालिया घटनाओं में बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरों ने भारत में जनमत को गहराई से प्रभावित किया है। शेख हसीना को भारत में शरण देना विवाद का स्थायी बिंदु बन चुका है।अवामी लीग को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखना और भारत-समर्थक तत्वों का हाशियाकरण नई दिल्ली के लिए स्वाभाविक चिंता है।जमात-ए-इस्लामी और अन्य इस्लामी ताकतों का उभार—चाहे वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर ही क्यों न हो—पाकिस्तान के प्रभाव को बढ़ाने का मार्ग खोल सकता है।
इतिहास की चेतावनी
इतिहास सरल सबक नहीं देता, लेकिन गंभीर चेतावनियां जरूर देता है। पाकिस्तान इसलिए टूटा क्योंकि उसके नेतृत्व ने पूर्वी पाकिस्तान में भारत के भय को इतना बढ़ा दिया कि वे लगातार गलत फैसले लेते चले गए।किसी भी स्थिति को केवल काला-सफेद नजरिए से देखना रणनीतिक आत्मघात होता है।धूसर दृष्टि की जरूरतक्वांटम यांत्रिकी की ‘माप समस्या’ एक गहरा सबक देती है—आप जिस पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वही वास्तविकता बन जाती है।अगर हम हर जगह केवल पाकिस्तान की छाया खोजेंगे, तो वही हमें अंधा कर देगी।भारत के लिए बेहतर रास्ता है—अपनी ताकत पर भरोसा,धैर्य,और निरंतर कूटनीतिक संवाद।विदेश मंत्री एस. जयशंकर का खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होना इसी धूसर दृष्टिकोण का उदाहरण था। ऐसे अवसरों को बढ़ाने की जरूरत है, न कि उन्हें संदेह की नजर से देखने की।
निष्कर्ष
बांग्लादेश के लिए संदेश स्पष्ट है—
पाकिस्तान के चक्कर में अंधा मत बनो।इतिहास बताता है कि जब भय, भावुकता और बाहरी प्रभाव नीति का मार्गदर्शन करने लगते हैं, तो राष्ट्र टुकड़ों में टूटते देर नहीं लगती।और भारत के लिए भी—
हर हलचल को साजिश मानने के बजाय, ठंडे दिमाग से, दीर्घकालिक हितों के साथ आगे बढ़ना ही असली रणनीति है।
