बी के झा
NSK

न्यूयॉर्क / काराकास / न ई दिल्ली, 5 जनवरी
सोमवार को मैनहट्टन की संघीय अदालत के बाहर जो दृश्य था, वह केवल एक कानूनी सुनवाई नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का भयावह प्रदर्शन था। भूरे रंग का कैदियों वाला जंपसूट, साधारण भूरे जूते, चेहरे पर थकान और चाल में लंगड़ाहट— वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो जब भारी सुरक्षा घेरे में अदालत पहुंचे, तो यह तस्वीर दुनिया भर में सवालों की तरह फैल गई।यह वही व्यक्ति है जो कुछ दिन पहले तक एक संप्रभु देश का राष्ट्राध्यक्ष था। आज वह अमेरिकी न्याय प्रणाली के कटघरे में खड़ा है।अदालत के बाहर किला, भीतर इतिहास मैनहैट्टन कोर्ट के आसपास का इलाका किसी युद्ध क्षेत्र में तब्दील कर दिया गया था।चारों ओर भारी बैरिकेडिंग मुख्य प्रवेश द्वार पर बहुस्तरीय सुरक्षागश्ती दलों की तैनातीआसपास की सड़कों पर आम नागरिकों की आवाजाही सीमित
संदेश साफ था— यह केवल न्याय नहीं, शक्ति का प्रदर्शन भी है।92 वर्षीय जज और राष्ट्रीय सुरक्षा का इतिहास
मादुरो का मामला 92 वर्षीय वरिष्ठ जज एल्विन हेलरस्टीन की अदालत में चल रहा है।1998 में बिल क्लिंटन द्वारा नियुक्त, हेलरस्टीन अमेरिका के उन जजों में हैं जिन्होंने:9/11 आतंकी हमलों से जुड़े मामलों की सुनवाई कीआतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के संवेदनशील केस देखें
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह चयन खुद में एक संकेत है— अमेरिका इस केस को “राष्ट्रीय सुरक्षा” के फ्रेम में रखना चाहता है, न कि सिर्फ आपराधिक आरोप के रूप में।जिस जेल में बंद हैं राष्ट्रपति मादुरो को न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन की जिस जेल में रखा गया है, वह पहले से विवादों में रही है।हालात इतने खराब रहे हैं कि कुछ न्यायाधीशों ने वहां आरोपियों को भेजने से इनकार तक किया है।यही वह जेल है जहां:गायक आर. केलीरैपर सीन ‘डिडी’ कॉम्ब्स जैसे चर्चित कैदी रह चुके हैं।अब उसी सूची में एक विदेशी राष्ट्रपति का नाम जुड़ चुका है।सैन्य कार्रवाई से अदालत तकअमेरिका ने शनिवार तड़के एक सैन्य अभियान में मादुरो और उनकी पत्नी को उनके आवास से हिरासत में लिया।पहले उन्हें एक अमेरिकी युद्धपोत पर रखा गया फिर विमान से न्यूयॉर्क लाया गया उतरते समय संघीय एजेंटों ने चारों ओर से घेरा कई एजेंटों ने अपने फोन से वीडियो रिकॉर्ड किए यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं, बल्कि वास्तविक अंतरराष्ट्रीय राजनीति का है।
आरोप और असली बहस
अमेरिका का कहना है कि मादुरो मादक पदार्थों से जुड़े आतंकवाद की साजिश में शामिल थे।लेकिन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ पूछ रहे हैं—क्या यह मामला सच में ड्रग्स का है, या सत्ता परिवर्तन की नीति का?क्या किसी देश को यह अधिकार है कि वह दूसरे संप्रभु देश के राष्ट्रपति को उठा लाए?अगर आज वेनेजुएला है, तो कल कौन?
अमेरिकी दादागिरी या वैश्विक चुप्पी?
सबसे बड़ा प्रश्न अदालत से बाहर खड़ा है—क्या विश्व बिरादरी अमेरिका की इस दादागिरी के सामने घुटने टेक चुकी है?संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएं और तथाकथित “नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था” इस पूरे घटनाक्रम पर या तो मौन हैं, या बेहद सतर्क बयान दे रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है:
“यह मामला न्याय का नहीं, शक्ति-संतुलन का है। अमेरिका यह दिखाना चाहता है कि उसकी पहुंच कहीं भी हो सकती है।”कब तक?आज एक राष्ट्रपति कैदियों की वर्दी में लंगड़ाता हुआ अदालत पहुंचा है।कल यह मिसाल बन सकती है।
क्या यही नया अंतरराष्ट्रीय कानून है?
क्या शक्तिशाली देशों के लिए अलग नियम हैं?
और क्या दुनिया केवल देखती रहेगी?
निकोलस मादुरो की पेशी से कहीं बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है—क्या वैश्विक व्यवस्था अब कानून से चलेगी, या बंदूक और हेलीकॉप्टर से?
यह सवाल केवल वेनेजुएला का नहीं,हर छोटे और मध्यम देश का है।
