ग्रीन फाइलें’ क्या थीं?* ED रेड, ममता की मौजूदगी और सत्ता–संघर्ष की नई पटकथा

बी. के. झा

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कोलकाता, 8 जनवरी

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बुधवार को जो दृश्य सामने आया, वह केवल एक प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी नहीं थी, बल्कि यह केंद्र बनाम राज्य, संवैधानिक एजेंसियां बनाम निर्वाचित सत्ता और राजनीति बनाम कानून के टकराव का एक जीवंत अध्याय बन गया।कोलकाता में राजनीतिक रणनीतिकारों की चर्चित फर्म I-PAC (Indian Political Action Committee) से जुड़े ठिकानों पर ED की कार्रवाई के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं मौके पर पहुंचीं, और वहीं से शुरू हुआ एक ऐसा हाई-वोल्टेज सियासी ड्रामा, जिसने पूरे देश का ध्यान खींच लिया।

ED की कार्रवाई:

जांच या राजनीतिक संदेश?

ED ने सेंट्रल कोलकाता में I-PAC से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी प्रतीक जैन के आवास और सॉल्ट लेक सेक्टर-V स्थित गोदरेज वाटरसाइड बिल्डिंग में फर्म के कार्यालय पर छापेमारी की। प्रतीक जैन को तृणमूल कांग्रेस (TMC) की चुनावी रणनीति का अहम कड़ी माना जाता है।जैसे ही छापेमारी की खबर फैली, TMC नेताओं और कार्यकर्ताओं की भीड़ मौके पर जमा हो गई। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि बिधाननगर पुलिस कमिश्नर को स्वयं स्थिति संभालने के लिए पहुंचना पड़ा।

‘ग्रीन फाइलों’ का रहस्य: क्या था उनमें?

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे रहस्यमय और विवादास्पद हिस्सा वे हरी फाइलें (Green Files) रहीं, जिन्हें ममता बनर्जी की मौजूदगी में ED की कार्रवाई के दौरान उठाया गया और बाद में मुख्यमंत्री के काफिले की गाड़ियों में रखवाया गया।इन फाइलों की सामग्री को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हैं कि इनमें—TMC उम्मीदवारों की संभावित सूची चुनावी रणनीति और बूथ-मैनेजमेंट प्लानडिजिटल कैंपेन और IT सेल से जुड़े दस्तावेजआगामी लोकसभा चुनाव से संबंधित आंतरिक नोट्सशामिल हो सकते हैं।यही वह बिंदु है, जहां मामला कानूनी जांच से आगे बढ़कर राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई में बदल जाता है।

ममता बनर्जी का तीखा हमला: ‘शरारती गृह मंत्री’मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस कार्रवाई के लिए सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा:“यह सब उस शरारती गृह मंत्री ने करवाया है, जो देश को सुरक्षित नहीं रख सकता। वे हमारी पार्टी की रणनीति और उम्मीदवारों की सूची चुराना चाहते हैं।”ममता ने सवाल उठाया कि क्या ED का काम किसी राजनीतिक दल की अंदरूनी रणनीति, चुनावी प्लान और उम्मीदवारों की सूची जब्त करना है?

उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सीधा हमला बताया और कहा कि एक तरफ SIR (Special Intensive Revision) के जरिए मतदाता सूचियों से नाम हटाए जा रहे हैं, और दूसरी तरफ राजनीतिक दस्तावेज़ जुटाए जा रहे हैं।

कानूनविदों की राय: ‘ED की सीमाएं स्पष्ट हैं’वरिष्ठ कानूनविदों का मानना है कि ED का अधिकार क्षेत्र वित्तीय अपराध, मनी लॉन्ड्रिंग और आर्थिक अनियमितताओं तक सीमित है।

एक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता के अनुसार:“यदि जब्त किए गए दस्तावेज़ राजनीतिक रणनीति, उम्मीदवार चयन या चुनावी योजना से जुड़े हैं, और उनका वित्तीय अपराध से सीधा संबंध नहीं है, तो यह गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है।”उनका कहना है कि राजनीतिक सामग्री की जब्ती संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।शिक्षाविदों की चिंता: ‘संस्थागत टकराव लोकतंत्र को कमजोर करता है’राजनीति विज्ञान के शिक्षाविद इस घटना को भारत के लोकतंत्र में बढ़ते संस्थागत टकराव का उदाहरण मानते हैं

।एक वरिष्ठ शिक्षाविद का कहना है:“जब जांच एजेंसियां और निर्वाचित सरकारें आमने-सामने आ जाती हैं, तो संदेश जनता तक जाता है कि लोकतंत्र संघर्ष की स्थिति में है, संवाद की नहीं।”उनके अनुसार, यह टकराव केवल बंगाल तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का नया ट्रेंड बनता जा रहा है।विपक्ष का सुर: ‘राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई’

विपक्षी दलों ने इस ED रेड को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है। कांग्रेस, वाम दलों और कुछ क्षेत्रीय पार्टियों ने कहा कि:चुनाव से पहले रणनीतिक संस्थाओं पर छापे संयोग नहीं विपक्षी शासित राज्यों में केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता सवाल खड़े करती है-यह संघीय ढांचे की भावना के खिलाफ है

केंद्र सरकार का पक्ष: ‘एजेंसियां स्वतंत्र हैं’

वहीं केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि:ED पूरी तरह स्वतंत्र एजेंसी हैकिसी भी राजनीतिक दबाव में काम नहीं करती यदि कोई दस्तावेज़ उठाया गया है, तो वह जांच के दायरे में होगा सरकार का दावा है कि कानून से ऊपर कोई नहीं, चाहे वह कितना भी बड़ा राजनीतिक पद क्यों न रखता हो।

निष्कर्ष

: जांच से आगे सत्ता की लड़ाईकोलकाता में हुई यह घटना साफ संकेत देती है कि—मामला केवल ED रेड का नहींयह 2026 और 2029 की चुनावी राजनीति की बुनियाद से जुड़ा संघर्ष हैऔर ‘ग्रीन फाइलें’ अब एक प्रतीक बन चुकी हैं—राजनीतिक गोपनीयता बनाम जांच एजेंसियों की शक्ति काअब असली सवाल यह है कि—

क्या इन फाइलों का संबंध किसी आर्थिक अपराध से साबित होगा?या यह मामला राजनीतिक आरोप–प्रत्यारोप में ही उलझकर रह जाएगा?फिलहाल, बंगाल की सियासत में संदेश साफ है—लड़ाई अब सड़कों से निकलकर फाइलों तक पहुंच चुकी है।

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