बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 13 अक्टूबर
मिस्र के शर्म अल-शेख में जारी गाजा शांति सम्मेलन में दुनिया के तमाम शीर्ष नेता एक साथ बैठे हैं—लेकिन भारत की उपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति और भारत की ओर से केवल विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह के प्रतिनिधित्व ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व राजनयिक शशि थरूर ने इस फैसले को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा सवाल उठाया है।
थरूर बोले – “भारत की आवाज़ कमज़ोर हुई”शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर पोस्ट करते हुए लिखा –जब दुनिया के दर्जनों देशों ने अपने राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री स्तर के प्रतिनिधियों को भेजा है, तब भारत का इतना निम्न स्तर का प्रतिनिधित्व हमारी आवाज़ को कमज़ोर कर सकता है।”थरूर ने यह भी कहा कि यह किसी व्यक्ति की क्षमता पर सवाल नहीं है, बल्कि यह भारत की कूटनीतिक उपस्थिति और प्रभाव की बात है।उन्होंने लिखा –इतने बड़े सम्मेलन में जहां विश्व नेता मौजूद हैं, वहाँ भारत की भागीदारी का स्तर उसके वैश्विक प्रभाव का संकेत देता है। इस मौके पर भारत का प्रतिनिधित्व शीर्ष स्तर पर होना चाहिए था।”
सम्मेलन में शामिल विश्व नेतागाजा शांति सम्मेलन में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ता अल-सिसी, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस सहित ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, तुर्की, कतर और जॉर्डन जैसे देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हैं।इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य गाजा में युद्धविराम की रूपरेखा तैयार करना, मानवीय सहायता का समन्वय स्थापित करना, और पुनर्निर्माण की दिशा में वैश्विक रोडमैप बनाना है।
क्या भारत ने गंवा दिया बड़ा मौका?राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत, जो हाल के वर्षों में खुद को “वैश्विक दक्षिण” का नेता और “विकासशील देशों की आवाज़” बताता रहा है, उसकी इस सम्मेलन में सीमित उपस्थिति एक कूटनीतिक कमी के रूप में देखी जा रही है।भारत की विदेश नीति हमेशा “मानवता, शांति और स्थिरता” पर केंद्रित रही है। ऐसे में इस संवेदनशील मंच पर शीर्ष स्तर की भागीदारी न होना कई विश्लेषकों को रणनीतिक चूक लगता है।
थरूर का तर्क – “मौका था, संदेश देने का”शशि थरूर ने अपने बयान में कहा कि यह सम्मेलन सिर्फ कूटनीतिक चर्चा नहीं, बल्कि एक वैश्विक संदेश देने का अवसर था।उन्होंने लिखा –गाजा में चल रहे संघर्ष पर भारत हमेशा से मानवीय दृष्टिकोण रखता आया है। लेकिन इस सम्मेलन में शीर्ष प्रतिनिधि न भेजकर हमने अपनी कूटनीतिक उपस्थिति को सीमित कर लिया।”थरूर के मुताबिक, यह न सिर्फ़ भारत की प्रभावशीलता को घटाता है, बल्कि उन देशों में भी एक गलत संदेश भेजता है जो भारत को शांति और स्थिरता का दूत मानते हैं।
सरकार की चुप्पी, विपक्ष का हमलासरकार की ओर से इस मुद्दे पर फिलहाल कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन विपक्ष इसे “भारत की अंतरराष्ट्रीय साख पर असर डालने वाला कदम” बता रहा है।कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब विश्व की तमाम बड़ी ताकतें एक मंच पर गाजा संकट का समाधान खोजने में लगी हैं, तब भारत जैसे बड़े लोकतंत्र का वहां “कमज़ोर प्रतिनिधित्व” भारत की वैश्विक भूमिका को सीमित करता है।
निष्कर्ष
भारत की विदेश नीति हमेशा से “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “शांति के संदेश” पर आधारित रही है। ऐसे में गाजा जैसे संवेदनशील मसले पर भारत की मौजूदगी सिर्फ़ औपचारिकता नहीं, बल्कि उसकी वैश्विक छवि और भूमिका का प्रतिबिंब भी है।
शशि थरूर का सवाल भले ही राजनीतिक हो, लेकिन यह चर्चा ज़रूर छेड़ता है कि –क्या भारत ने वास्तव में एक बड़ा कूटनीतिक अवसर गंवा दिया?
