बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 10 जनवरी
भारत अगले सप्ताह एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संसदीय आयोजन—कॉमनवेल्थ प्रिसाइडिंग ऑफिसर्स कॉन्फ्रेंस (CSPOC)—की मेजबानी करने जा रहा है। 14 से 16 जनवरी तक संसद भवन में आयोजित होने वाला यह 28वां सम्मेलन लोकतांत्रिक संस्थाओं, विधायी प्रक्रियाओं और संसदीय सहयोग पर केंद्रित होगा।लेकिन इस बहुपक्षीय मंच पर पाकिस्तान और बांग्लादेश की संभावित अनुपस्थिति ने सम्मेलन से पहले ही कूटनीतिक हलकों में गहरी चर्चा छेड़ दी है।
कौन-कौन होंगे शामिल?
सम्मेलन में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन, मलेशिया, श्रीलंका, मालदीव समेत कई कॉमनवेल्थ देशों के स्पीकर्स और प्रिसाइडिंग ऑफिसर्स के शामिल होने की उम्मीद है। विशेष रूप से कनाडा, मलेशिया और मालदीव की भागीदारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि हाल के वर्षों में भारत के साथ इनके संबंधों में धीमी लेकिन स्पष्ट सुधार देखने को मिला है।
पाकिस्तान–बांग्लादेश क्यों दूर?
सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान और बांग्लादेश की अनुपस्थिति किसी औपचारिक प्रतिबंध का परिणाम नहीं है। CSPOC एक स्वतंत्र बहुपक्षीय मंच है और इसके नियमों के तहत किसी देश को रोका नहीं गया।बांग्लादेश: वहां संसद के निलंबन के चलते संवैधानिक रूप से ऐसे संसदीय मंचों में भागीदारी सीमित हो जाती है।पाकिस्तान: भारत के साथ उसके संबंध सीमा पार आतंकवाद, राजनीतिक संवाद के निलंबन और संसदीय संपर्कों में कटौती के कारण न्यूनतम स्तर पर हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह अनुपस्थिति औपचारिक बहिष्कार नहीं, बल्कि व्यावहारिक कूटनीतिक दूरी का संकेत है।
भारत का संदेश: मंच खुले हैं, शर्तें स्पष्ट
भारतीय कूटनीति से जुड़े जानकारों के अनुसार, भारत ने न तो इस सम्मेलन को किसी देश के खिलाफ इस्तेमाल किया है और न ही किसी को आमंत्रण से वंचित किया। सम्मेलन की जानकारी CSPOC सचिवालय और उसकी आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से सार्वजनिक की गई थी।यह रुख दर्शाता है कि भारत आज “ओपन मल्टीलेटरलिज़्म, लेकिन स्पष्ट सिद्धांतों” की नीति पर चल रहा है।
रक्षा विशेषज्ञों की दृष्टि
रक्षा और सामरिक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि संसद और कूटनीति अब केवल औपचारिक संवाद नहीं रहे। ऐसे मंचों पर भागीदारी या अनुपस्थिति, दोनों ही रणनीतिक संकेत होते हैं।पाकिस्तान की गैर-मौजूदगी को वे भारत की उस नीति का विस्तार मानते हैं, जिसमें आतंकवाद और संसदीय संवाद को अलग-अलग नहीं देखा जाता।
कानूनविद और शिक्षाविद क्या कहते हैं?
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि कॉमनवेल्थ जैसे मंचों का मूल उद्देश्य लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करना है। बांग्लादेश की अनुपस्थिति इस बात की याद दिलाती है कि संसद का निलंबन केवल घरेलू नहीं, अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी डालता है।शिक्षाविद इसे “लोकतंत्र की संस्थागत निरंतरता” का प्रश्न मानते हैं।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
भारत में विपक्षी दलों ने सरकार से यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि ऐसे मंचों का उपयोग क्षेत्रीय संवाद को जीवित रखने के लिए भी किया जाए। कुछ नेताओं ने कहा कि संवाद के दरवाज़े बंद नहीं होने चाहिए, जबकि अन्य ने सरकार के सख्त रुख को राष्ट्रीय हित में बताया।
हिंदू संगठनों और मुस्लिम समाज की प्रतिक्रिया
कुछ हिंदू संगठनों ने इसे भारत की आत्मविश्वासी वैश्विक भूमिका का प्रतीक बताया है और कहा है कि लोकतंत्र और सुरक्षा साथ-साथ चलने चाहिए।वहीं मुस्लिम समुदाय और कई मौलानाओं ने संतुलित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि संसदीय मंचों को धार्मिक या सामुदायिक चश्मे से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर देखा जाना चाहिए।
निष्कर्ष:
अनुपस्थिति भी एक संदेश दिल्ली में होने वाला CSPOC सम्मेलन भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और संसदीय कूटनीति की ताकत को दर्शाता है। पाकिस्तान और बांग्लादेश की अनुपस्थिति यह बताती है कि आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मेज पर बैठना भी उतना ही अहम है, जितना दूर रह जाना
भारत ने मंच सजाया है, नियम स्पष्ट रखे हैं—
अब यह दूसरों पर है कि वे लोकतांत्रिक संवाद की इस मेज़ पर कब और कैसे आते हैं।
