जयशंकर का पोलैंड को कड़ा संदेश: आतंकवाद, भू-राजनीति और भारत की ‘रणनीतिक स्पष्टता’

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/वारसॉ, 19 जनवरी

ऐसे समय में जब वैश्विक व्यवस्था युद्ध, प्रतिबंधों और रणनीतिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रही है, भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर का पोलैंड को दिया गया संदेश केवल एक कूटनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारत की बदली हुई विदेश नीति का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है। पोलैंड के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री रादोस्वाव सिकोर्सकी से मुलाक़ात के दौरान जयशंकर द्वारा यह कहना कि “हमारे पड़ोस में किसी भी आतंकी ढांचे को मदद न दी जाए”—सीधे तौर पर उन यूरोपीय देशों के लिए चेतावनी है, जो भारत-पाक संबंधों को ‘न्यूट्रल फ्रेम’ में देखने की कोशिश करते रहे हैं।

आतंकवाद पर भारत की ‘नो एम्बिग्यूटी पॉलिसी

’राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जयशंकर का यह बयान पाकिस्तान को अप्रत्यक्ष लेकिन स्पष्ट संदेश है। वरिष्ठ विदेश नीति विशेषज्ञ प्रो. हर्ष वी. पंत के अनुसार,“भारत अब आतंकवाद पर दोहरे मापदंड स्वीकार नहीं करेगा। अगर कोई देश पाकिस्तान के साथ संबंध बनाता है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वह भारत विरोधी आतंकी ढांचों से दूरी बनाए।”पोलैंड की पाकिस्तान के साथ बढ़ती नज़दीकियां—चाहे वह ऊर्जा निवेश हो या कश्मीर पर ‘संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क’ की भाषा—भारत के लिए लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं।

कानूनविदों की राय:

अंतरराष्ट्रीय क़ानून की याद दिलानासंवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकार वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन का कहना है,“जयशंकर ने पोलैंड को संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी संधियों की याद दिलाई है। किसी देश द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से आतंकी ढांचे को सहयोग देना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है।”कानूनविद यह भी मानते हैं कि भारत अब आतंकवाद को राजनयिक शिष्टाचार के बजाय कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाना चाहता है।

रक्षा विशेषज्ञों का आकलन:

पाकिस्तान को यूरोप में वैधता देने की कोशिश रक्षा मामलों के विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल (रि.) डीएस हुड्डा का कहना है,“यूरोप के कुछ देश पाकिस्तान को एक ‘रीजनल स्टेकहोल्डर’ के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं। भारत ने पोलैंड को साफ़ कर दिया है कि पाकिस्तान का ट्रैक रिकॉर्ड आतंकवाद से जुड़ा हुआ है, न कि शांति से।”उनके अनुसार, पोलैंड द्वारा पाकिस्तान में ऊर्जा और रक्षा सहयोग भारत की सुरक्षा चिंताओं को नज़रअंदाज़ करने जैसा है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया:

सवाल भी, समर्थन भी भारत में विपक्षी दलों ने जयशंकर के बयान का स्वागत तो किया, लेकिन कुछ सवाल भी उठाए।कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने कहा,“आतंकवाद पर भारत का रुख़ बिल्कुल सही है, लेकिन सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि यूरोपीय देशों के साथ हमारे रिश्तों में ऐसी स्थिति क्यों पैदा हो रही है।”वहीं वामपंथी दलों का मानना है कि भारत को यूरोप के साथ संवाद में संतुलन बनाना चाहिए, ताकि व्यापार और रणनीति दोनों प्रभावित न हों।

व्यापार बनाम सिद्धांत: टैरिफ़ और ‘सिलेक्टिव

टार्गेटिंग’जयशंकर द्वारा “सिर्फ़ टैरिफ़ ही नहीं, बल्कि अन्य तरीकों से भी भारत को चुनकर निशाना बनाए जाने” की टिप्पणी को विशेषज्ञ अमेरिका और यूरोप की नीतियों पर परोक्ष हमला मानते हैं।अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं,“भारत यह संकेत दे रहा है कि वह वैश्विक व्यापार में बराबरी का व्यवहार चाहता है, न कि नैतिक उपदेश और आर्थिक दबाव।

निष्कर्ष:

आत्मविश्वासी भारत की नई विदेश नीति

इस पूरी मुलाक़ात का सार यही है कि भारत अब न तो आतंकवाद पर चुप रहेगा, न ही वैश्विक राजनीति में नैतिकता के नाम पर चुनिंदा दबाव स्वीकार करेगा। जयशंकर का संदेश साफ़ है—व्यापार हो, रणनीति हो या कूटनीति—

आतंकवाद के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस भारत की अपरिवर्तनीय शर्त है।यह बयान केवल पोलैंड के लिए नहीं, बल्कि पूरे यूरोप के लिए भारत की रणनीतिक स्पष्टता और आत्मविश्वासी विदेश नीति का ऐलान है।

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