चिकन नेक’ तक चीन की दस्तक: बांग्लादेश की नई कूटनीतिक चाल और भारत के लिए बढ़ती रणनीतिक चुनौती तीस्ता परियोजना की आड़ में भू-राजनीति, सुरक्षा और कानून का टकराव

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 20 जनवरी

भारत–बांग्लादेश संबंधों में पहले से मौजूद तनाव के बीच ढाका की अंतरिम सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसने नई दिल्ली के रणनीतिक हलकों में गहरी चिंता पैदा कर दी है। बांग्लादेश ने चीन के राजदूत याओ वेन को तीस्ता नदी परियोजना क्षेत्र के दौरे की अनुमति दी—वह क्षेत्र, जो भारत के अत्यंत संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर, यानी ‘चिकन नेक’, से बेहद नजदीक स्थित है। यह वही संकरा भू-भाग है, जो भारत की मुख्य भूमि को उसके आठ पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है और जहां किसी भी प्रकार की अस्थिरता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर सीधा प्रभाव डाल सकती है।रंगपुर जिले के कौनिया उपजिला में चीनी राजदूत का यह दौरा औपचारिक रूप से तीस्ता रिवर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट एंड रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट (TMP) के तहत चल रहे तकनीकी मूल्यांकन से जोड़ा गया है। लेकिन समय, स्थान और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए इसे केवल एक तकनीकी यात्रा मानने से इनकार किया जा रहा है।

तीस्ता परियोजना: विकास या रणनीतिक प्रवेश द्वार?

बांग्लादेश की पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन सलाहकार सैयदा रिजवाना हसन ने कहा है कि चीन तीस्ता मास्टर प्लान को जल्द लागू करना चाहता है और दोनों देश इस पर प्रतिबद्ध हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि परियोजना अभी जांच-परख के दौर में है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, तीस्ता परियोजना केवल नदी प्रबंधन का मामला नहीं रह गई है। यह अब दक्षिण एशिया में चीन की रणनीतिक पैठ का एक और उदाहरण बनती दिख रही है।दिल्ली स्थित एक वरिष्ठ रणनीतिक मामलों के शिक्षाविद के शब्दों में—“

चीन का कोई भी ‘विकास प्रोजेक्ट’ सिर्फ आर्थिक नहीं होता, वह भविष्य की भू-राजनीतिक मौजूदगी का आधार बनता है।

यूनुस सरकार और पुराना विवाद

अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस पहले भी चीन को लेकर दिए गए बयानों के कारण विवादों में रहे हैं। 2025 में चीन में दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने भारत के ‘लैंडलॉक्ड पूर्वोत्तर’ का उल्लेख करते हुए बांग्लादेश को क्षेत्र में समुद्र का एकमात्र संरक्षक” बताया था।इन टिप्पणियों की गूंज दिसंबर में ढाका और अन्य बांग्लादेशी शहरों में हुए भारत-विरोधी प्रदर्शनों तक सुनाई दी, जहां भारतीय राजनयिक ठिकानों को निशाना बनाया गया।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा घटनाक्रम उसी मानसिकता का विस्तार है, जिसमें ढाका बीजिंग को संतुलनकारी शक्ति के रूप में इस्तेमाल कर नई दिल्ली पर दबाव बनाना चाहता है।

भारत और पश्चिम बंगाल की दोहरी चिंता

तीस्ता नदी बांग्लादेश के उत्तरी जिलों के लिए जीवनरेखा है, लेकिन भारत—विशेषकर पश्चिम बंगाल—के लिए भी उतनी ही अहम है। दशकों से तीस्ता जल-बंटवारे पर बातचीत चल रही है, पर राज्य सरकार की आपत्तियों के कारण समझौता अटका हुआ है।कानूनविदों का कहना है कि जब तक भारत-बांग्लादेश के बीच जल-बंटवारे पर सहमति नहीं बनती, तब तक किसी तीसरे देश की गहरी भागीदारी अंतरराष्ट्रीय नदी कानून और द्विपक्षीय समझ की भावना के विपरीत मानी जा सकती है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर: भारत की सुरक्षा की नब्ज

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत का केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि रणनीतिक गला है। लगभग 22 किलोमीटर चौड़ा यह इलाका नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और चीन से घिरा हुआ है।किसी भी प्रकार का सैन्य, अर्धसैन्य या खुफिया हस्तक्षेप यहां पूर्वोत्तर भारत में रहने वाले करीब 5 करोड़ लोगों की सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है।हाल के महीनों में बांग्लादेश द्वारा लालमोनिरहाट के पुराने एयरबेस को सक्रिय करने और उसमें चीन की संभावित भूमिका की खबरों ने इन आशंकाओं को और मजबूत किया है।

ढाका–बीजिंग की बढ़ती नजदीकी

चीनी राजदूत याओ वेन और बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलीलुर रहमान के बीच हुई बैठक के बाद ढाका ने सार्वजनिक रूप से बांग्लादेश–चीन “दीर्घकालिक मित्रता” और विकास सहयोग की पुष्टि की। बातचीत में तीस्ता परियोजना के अलावा प्रस्तावित बांग्लादेश–चीन फ्रेंडशिप हॉस्पिटल जैसे मुद्दे भी शामिल रहे।चीन ने बांग्लादेश के “लोकतांत्रिक परिवर्तन” और आगामी चुनावों के लिए समर्थन जताकर यह संकेत भी दिया कि वह ढाका की आंतरिक राजनीति में एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में खुद को स्थापित करना चाहता है।

भारत सरकार की प्रतिक्रिया और विपक्ष की भूमिका

सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है। विदेश मंत्रालय के स्तर पर कूटनीतिक चैनलों से यह संदेश देने की तैयारी है कि भारत अपने रणनीतिक हितों और सुरक्षा चिंताओं से कोई समझौता नहीं करेगा।विपक्षी दलों ने सरकार से इस मुद्दे पर सख्त और स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की है। उनका कहना है कि “पड़ोस पहले” की नीति के तहत भारत को बांग्लादेश के साथ संवाद बनाए रखते हुए यह स्पष्ट करना चाहिए कि ‘चिकन नेक’ के आसपास किसी भी बाहरी शक्ति की सक्रियता स्वीकार्य नहीं होगी।

निष्कर्ष

तीस्ता परियोजना का यह प्रकरण महज नदी प्रबंधन या विकास सहयोग का सवाल नहीं है। यह दक्षिण एशिया में बदलते शक्ति संतुलन, चीन की बढ़ती दखलअंदाजी और भारत की सुरक्षा चुनौतियों का प्रतीक बन चुका है।बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की यह ‘हिमाकत’ आने वाले समय में भारत–बांग्लादेश संबंधों की दिशा तय कर सकती है—या तो संवाद और संतुलन की ओर, या फिर अविश्वास और रणनीतिक टकराव की ओर।अब देखना यह है कि नई दिल्ली इस चुनौती का जवाब कूटनीतिक संयम, रणनीतिक दृढ़ता और क्षेत्रीय नेतृत्व के किस मिश्रण से देती है।

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